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#HumanStory: पादरी का तजुर्बा, 'संन्यास ले चुकी उस लड़की ने महीनों यौन शोषण झेला'

News18Hindi
Updated: November 13, 2019, 10:05 AM IST
#HumanStory: पादरी का तजुर्बा, 'संन्यास ले चुकी उस लड़की ने महीनों यौन शोषण झेला'
इलाहाबाद के प्रोटेस्टेंट चर्च के पादरी पादरी मनीष गुंजन ज़ैदी अपना तजुर्बा सुनाते हैं

इतवार की प्रार्थना (Sunday prayer) खत्म हो चुकी थी. धीरे-धीरे लोग जाने लगे. मैं किताबें संभाल रहा था. तभी उसपर नजर पड़ी. चर्च (church) के कोने में बैठी हुई दुबली-सहमी सी लड़की. सफेद सलवार-कमीज में मुंडा हुआ सिर और भरी हुई आंखें. पादरी हूं. दर्द सुनने का आदी. लेकिन उसके कनफेशन (confession) ने हिलाकर रख दिया.

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  • Last Updated: November 13, 2019, 10:05 AM IST
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चर्च की कल्पना करें तो जहन में क्या आता है? लाल-सफेद ईंटों से बनी इमारत, जहां लकड़ी की लंबी-संकरी बेंच होती है. उसपर हाथ टिका आप दुआ कर सकते हैं तो सिर टिकाकर रो भी सकते हैं. चर्च में गिरते ये आंसू अकेले नहीं बहते, इनमें हिस्सेदारी होती है. उसकी जो हरेक का पाप सुनता है और माफी की दुआ करता है. पढ़ें इलाहाबाद के प्रोटेस्टेंट चर्च के पादरी मनीष गुंजन ज़ैदी का कनफेशन.

मैं भी बच्चे को स्कूल ले जाता हूं. गैस सिलेंडर लाता हूं. शाम के बाजार में भाजी-तरकारी लेता हूं. चटपटी चीजें खाते खुश होता हूं. किसी अपने को तकलीफ हो तो सिसकता हूं. पादरी हूं लेकिन आखिरकार इंसान ही हूं.

अबतक ढेरों लोग कनफेस करने आए. सबके लिए प्रार्थना करता हूं. कई बार लोग ऐसे पापों का जिक्र करते हैं कि गुस्से का उबाल-सा आता है. लेकिन फिर शांत होता हूं और उनके लिए दुआ करता हूं. कई बार किसी के चेहरे की लकीरें उसके दर्द का नक्शा बन चुकी होती हैं. ऐसा ही एक चेहरा भुलाए नहीं भूल सका.

बीतती सर्दियों का इतवार था वो. दोपहर में ऊंघता हुआ. चर्च की प्रार्थना के बाद लोग घर जा रहे थे. बस, बागीचे में माली काम कर रहा था. भीतर मैं अलमारी की किताबें सहेज रहा था. तभी वो लड़की दिखी. सहमी हुई सी कोने की बेंच पर बैठी थी. झक सफेद कपड़े. सिर ताजा-ताजा मुंडा.

मैं सामने की बेंच पर बैठ गया. लड़की मानो देख न सकती हो. न हिली-न डुली. मैंने धीरे से पूछा- बहन, क्या बात है? किसी तकलीफ में हो?

कई बार किसी के चेहरे की लकीरें उसके दर्द का नक्शा बन चुकी होती हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


मूर्ति जैसी उस बच्ची की पलकें एकदम से झपकीं और आंखें डबडबा आईं. काफी देर बाद उसने पूछा- फादर, आप मेरे लिए प्रार्थना करेंगे! मैंने तपाक से हामी भरी- हां, ये तो मेरा काम है. लड़की टक लगाकर मुझे देखती रही और फिर एकदम से पूछा- बिना मेरी तकलीफ जाने आप दुआ किस बात की करेंगे!
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22-24 बरस से ज्यादा की नहीं होगी लेकिन आंखें उम्रदराज हो चुकी थीं. इतनी शांत आवाज मैंने फिर कभी नहीं सुनी. मनीष याद करते हैं.

कुछ वक्त पहले वो बच्ची प्यार में थी. घरवालों को बताया तो उन्होंने रास्ता दिया- या तो मां-बाप को चुनो या प्यार को. लंबी कशमकश के बाद उसने खुद को दोनों से अलग कर लिया. घरबार छोड़ सन्यासी बन गई. यहां-वहां टोलियों में घूमने लगी. इसी दौरान उसे यौन शोषण सहना पड़ा. एक बार- दो बार के बाद हादसे रुटीन में बदल गए. एक वक्त पर मां-बाप और प्यार से इतर कोई दुनिया नहीं जानने वाली वो बच्ची अब सही-गलत सारे काम करने लगी थी.

तभी एक रोज दल में उसी की तरह एक लड़की आई. उसे देखना खुद को याद करना था. लड़की भाग निकली. सबसे पहले एक मंदिर गई. सिर मुंडाया और हर जाने-अनजाने पाप की माफी मांगी. उसके बाद से वो हर मंदिर, दरगाह, गुरुद्वारे घूमने लगी. घूमते हुए ही मेरे यहां आ निकली. उसे सुनने के बाद पहली बार दुआ मांगते हुए मैं उसके हिस्से का भी रो रहा था.

ऐसे ही एक बार एक मां-बाप पहुंचे. गोद में चारेक साल की बच्ची. बच्ची और मां की आंखों में गहरे-स्याह धब्बे. बेटी को ब्लड कैंसर था.

वे इलाज के लिए शहर आए थे और तभी चर्च आए. तब से हर इतवार हम उस बच्ची के लिए दुआ करते हैं. वो अब 6 साल की है. कभी कोई ड्रग एडिक्ट आया. तो कभी कोई अपने टूटते परिवार को बचाने की दुआ को. जितने चेहरे, उतने दर्द.

पादरी मनीष गुंजन ज़ैदी अपनी कहानी सुनाते हैं


कई बार दिलचस्प बातें भी होती हैं. जैसे पिछले दिनों रोज एक शख्स आया करता. वो अपनी बीवी के साथ आता. बीच की मांग पर सिंदूर भरे कमउम्र की एक औरत. उस शख्स को यकीन था कि उन दोनों पर जादू-टोना हो रहा है. वे खुश नहीं हैं. वैसे मुझे वो काफी खुश और करीब लगते. पास-पास सिर सटाए घंटों बात करते बैठे रहते. मैं उनके लिए प्रार्थना करता. ऐसा लगातार हफ्तों हुआ.

बाद में पता चला कि वे पति-पत्नी थे ही नहीं. और दोनों ही शादीशुदा थे. प्यार में थे और शायद बाग-बागीचे में एकाध दफे पकड़ा चुके थे. लिहाजा चर्च को 'सेफ' मान यहां मिलने-मिलाने आते.

बात पकड़ी गई तो आना भी बंद हो गया. हंसते हुए फादर मनीष बताते हैं- चर्च में अक्सर छोटा-मोटा पार्क बन जाता है. बच्चे आते हैं और बैठकर जाते हैं. एक बार एक बच्ची आई. स्कूल ड्रेस में थी. मुझे देखते ही हिलककर रो पड़ी. शांत होकर धीरे-धीरे कहा- फादर, आप मेरे फादर को समझाएं. मुझे पेंटिग करनी है और वो मुझे कंपीटिशन में बैठाना चाहते हैं. मैं ये नहीं कर सकती. स्कूल की वो बच्ची गुस्से से तमतमा रही थी. मुझे जोरों की हंसी आ रही थी लेकिन पादरी हूं, हंसी छिपाकर रखनी पड़ी.

प्रोटेस्टेंट हूं. मेरे चर्च में कनफेशन बॉक्स नहीं. जो कनफेस करने आते हैं, वे इंतजार करते हैं. चर्च के खाली होने का.

कई बार ऐसा हुआ कि गहराती शाम और झमकती बारिश में किसी ने अपना राज खोला. या फिर गर्मी की लपटों और पंखों की आवाज के बीच मैंने किसी को सुना. वो चले जाते हैं. उनके साथ ही उनका राज भी भीतर गुम हो जाता है.

मजबूत कद-काठी के मनीष छुट्टी वाले रोज जींस- टी-शर्ट में होते हैं. पत्नी-बच्चों के साथ घूमना और किताबें पढ़ना पसंद है. खूब अंग्रेजीदां लहजे में चुभलाते हुए कहते हैं- हमारा ड्रेसकोड है सफेद गाउन, सफेद स्टोल और काला कमरबंद. पूजा के वक्त ही ये पहनता हूं वरना बाकी वक्त मैं मामूली इंसान हूं जो अच्छे कपड़ों का शौकीन है. बस, हम वक्त के साथ कुछ बातों में पक्के हो जाते हैं. मिसाल के तौर पर- मौत.

मनीष कहते हैं- मेरे पापा भी पादरी थे. बचपन से इतना कुछ देखा कि ताबूत से डर खत्म हो गया. जब तक मेरे घर पर मौत नहीं हुई थी, मैं तकलीफ कम समझ पाता था. रोते लोगों से कहता- वक्त हो रहा है. चलो, जल्दी करो. पापा गए, तब दिनों तक हिला रहा. वक्त जम गया हो मानो.

उसके बाद कहीं कुछ बदला. अब कितनी ही देर हो, मैं जल्दी नहीं करता.

जो कनफेस करने आते हैं, वे इंतजार करते हैं. चर्च के खाली होने का (प्रतीकात्मक फोटो)


रात-बेरात किसी मौत की खबर आए तो गिरिजाघर के घंटे बजवाता हूं. एक...10 सेकंड बाद फिर एक... एक के बाद एक देर तक घड़ियाल बजता है. मैं फोन के पास खड़ा रहता हूं. घंटी घनघनाती है. लोग पूछते हैं. मैं बताता हूं. जल्द ही मदद पहुंचने लगती है. WhatsApp पर भी डालता हूं. लेकिन घंटे बजने का रिवाज अब भी जिंदा है.

47 बरस के मनीष साल 2003 से पादरी हैं. पेशे के बारे में कहते हैं- ये और कामों से थोड़ा अलग है. मैं काम छोड़ दूं तो भी काम मुझे पकड़े रखेगा. नाम के आगे पादरी लग चुका है, वो अब हटाया नहीं जा सकता. बस एक ही परेशानी है. लोग उम्मीद करते हैं कि हम 24*7 उन्हें सुन-समझ सकें.

हमारा कोई इतवार नहीं होता. छुट्टी लेनी हो तो अपना विकल्प देना होता है. चाहे कुछ हो जाए, चर्च में कभी ताला नहीं पड़ना चाहिए.

कोई और मुश्किल!
ठहरते हुए फादर मनीष कहते हैं- लोग दुआ पढ़वाने आते हैं तो जैसे सब ठीक होने की गारंटी मांगते हैं.

हम पादरी हैं, जादूगर नहीं. हमारी दुआओं में असर है लेकिन वो सारी शादियां नहीं बचा सकती. न सारे कैंसर ठीक कर सकती है.

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First published: November 13, 2019, 10:05 AM IST
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