#HumanStory: उससे शादी के लिए मैं 'इब्राहिम' से 'आर्यन' हो गया, लगा जिहादी का कलंक

इब्राहिम उर्फ आर्यन और अंजली जैन का रिश्ता मुश्किलों से भरा हुआ है

जिस लड़की के लिए मैंने मजहब बदला, शादी के महीनों बाद भी उसे मेरे साथ रहने की इजाजत नहीं. वो एक तरह से नजरबंद है. जबर्दस्ती खिलाई गई दवाओं से बदहवास. अपने ही घरवालों की मारपीट से सहमी. हम उन्हें कैसे समझाएं कि हर प्यार लव-जिहाद नहीं.

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साल 2009 में पहली बार लव जिहाद शब्द सुना गया. अंग्रेजी के निहायत मासूम शब्द के अरबी के एक शब्द से मिलते ही खौफनाक परिभाषा उपजी, जिसने जाने कितने ही प्यार निगल लिए. इसी का ताजा शिकार है इब्राहिम उर्फ आर्यन और अंजली का रिश्ता. पढ़ें, इब्राहिम को.

साल 2014 की जनवरी. कॉलेजों में कल्चरल फेस्टिवल का माहौल था. मैं इवेंट मैनेजमेंट संभाल रहा था. सुबह जाता तो देर शाम तक माइक, टेंट, स्टेज देखता. तभी वो मिली. अंजली- फर्स्ट ईयर स्टूडेंट. जिंदगी से भरपूर. बड़ी-बड़ी बिल्लौरी आंखों में सपने ही सपने.

पहली नजर के प्यार पर मुझे यकीन नहीं. लेकिन उसे देखकर पहली बार दिल में कोई खलिश सी हुई. लगा कि जिंदगी इसके साथ होती तो बेहतर होती.

वो बढ़-चढ़कर इवेंट्स में हिस्सा लिया करती. कॉलेज कैंपस में हो रही मुलाकातें धीरे से कॉफी हाउस तक पहुंची और फिर ऐसा अक्सर होने लगा. इब्राहिम याद करते हैं-मैं तब शादीशुदा था. पहली पत्नी की उम्मीदें अलग थीं. वो मायके चली गई. बहुतेरा समझाया, रोका लेकिन वो नहीं रुकी. अंजली से मुलाकात की वो शाम अलग थी. मैं गुमसुम था. उसके कुरेदते ही लफ्ज-दर-लफ्ज सब बता दिया. पहली बार मैं रो रहा था. उसके बाद से हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं.

साल खत्म होते न होते हम रिश्ते में थे. अब हमें कई पड़ाव पार करने थे. मजहब तो एक रोड़ा था ही, मेरा शादीशुदा होना भी.

कैंपस में हो रही मुलाकातें धीरे से कॉफी हाउस तक पहुंची और फिर ऐसा अक्सर होने लगा


पत्नी से मिला. वो तलाक के लिए राजी थी. साल 2016 में समाज की बैठक हुई और शरीयत कानून के हिसाब से तलाक हो गया. अब हमें आगे का रास्ता सोचना था.

फोन पर इब्राहिम की आवाज एकदम संभली हुई है. सवाल पूछते हुए पता चलता है कि ये संभलापन लंबे वक्त जूझने के बाद ही आता होगा. वे कहते हैं- अंजली और मैं अक्सर अपने-अपने घरों की बात बताते. मेरा घर मजहब को लेकर खुला हुआ था. वहीं अंजली के साथ कई बंदिशें थीं. उसके पापा व्हास्टएप पर अक्सर लव जिहाद के संदेश भेजा करते. इससे हमें थोड़ा-बहुत अंदाजा था कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा.

अंदाजा लगाने में थोड़ी चूक हो गई. आगे का रास्ता काफी उबड़-खाबड़ होने वाला था.

इब्राहिम उर्फ आर्यन याद करते हैं. हमने वकील से बात की. आर्य समाज मंदिर में शादी के लिए आवेदन दिया. 25 फरवरी 2018 को मैं इब्राहिम से आर्यन आर्य हुआ. उसी रोज अंजली और मेरी शादी हो गई. इसके कुछ वक्त बाद ईद आ रही थी. मिलकर तय किया कि अभी थोड़ा इंतजार करेंगे.

वे याद करते हैं साल 2015 की जुलाई के दंगों को, जब छोटा सा कस्बा मजहब के नाम पर थर्रा उठा था. वो बवाल भी गैर महजबी शादी के नाम पर हुआ था. हम नहीं चाहते थे कि हमारा रिश्ता भी किसी दंगे की वजह बने. लेकिन बात उलट पड़ गई. अंजली के पिता को हमारी शादी की भनक लग गई. इसके बाद शुरू हुआ तकलीफों का सिलसिला अब तक चला आ रहा है.

हमें थोड़ा-बहुत अंदाजा था कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा


अंजली के पिता ने उसे रायपुर के एक मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया. एक बार, दो बार नहीं, इन कुल महीनों में 3 बार.

हर बार अंजली की 'मानसिक हालत' सुधारने के लिए उसे दवाएं दी जातीं. दवा खाने से मना करे तो इंजेक्शन के जरिए घुसेड़ी जातीं. ऐसी दवाएं कि शरीर अकड़ जाता, पल्स धीमी पड़ जाती, दांत जम जाते. ऐसे ही दौरों के बीच एक रोज अंजली का एक दांत भी टूट गया.

जितनी बार उसका टूटा दांत दिखता है, उतनी ही बार मुझे अस्पताल में छटपटाती अंजली याद आती है.

मैंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की. मैं अपनी पत्नी को वापस लौटाना चाहता था. कोर्ट में पहली पेशी में आई अंजली ने साफ कहा कि वो मेरे साथ रहना चाहती है. तब कोर्ट ने उसे सरकारी हॉस्टल (सखी सेंटर) भेज दिया. कोर्ट का कहना था कि दोनों ही पक्षों को सोचने का वक्त मिलना चाहिए. मामला काफी गरमा चुका था.

सीधा-सादा एक जोड़ा अब कोर्ट, पुलिस और गुस्साए हिंदू-मुस्लिम संगठनों के बीच फंसा हुआ था.

फोन पर अंजली से भी बात हुई. आवाज में ठेठ लहजे वाली महज 24 साल की लड़की. अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है कि कैसे इस उम्र की लड़की ने इतनी खींचतान सही होगी! वो कहती हैं- साढ़े सात महीनों से मैं सखी सेंटर में हूं. यहां वही औरतें आती हैं, जिनका घर-परिवार नहीं या जो घर नहीं लौट सकतीं. यहां सिर्फ 5 दिनों के लिए रहने की इजाजत है.

कोर्ट में पहली पेशी में आई अंजली ने साफ कहा कि वो मेरे साथ रहना चाहती है


इन साढ़े सात महीनों में कितनी ही औरतें आईं-गईं. मैं अपने कमरे में बंद रहती हूं. बाहर जाने की इजाजत नहीं. न पढ़ाई के लिए और न ही किसी काम से. पहले हफ्ते में तीन दिन इब्राहिम आता. अब उसके आने पर भी रोक लग गई है.

दवाओं के जिक्र पर अंजली तपाक से कहती हैं - आपसे बात कर रही हूं. आपको लगता है, मुझे किसी दवा की जरूरत है!

मेरा मजहब से कोई जुड़ाव नहीं. 10 दोस्तों में एकाध मुस्लिम होगा. छुटपन से नवरात्रि पर मां बमलेश्वरी मंदिर जाते. घर-परिवार में दावत हो तो ही गोश्त खाता हूं. अलग से खाने का कोई चाव नहीं. अंजली भी एकदम मुझ-सी है. उसे भी वही सारे काम अच्छे लगते हैं, जिनका उसके मजहब से वास्ता नहीं. अब 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में पेशी है. बताते हुए इब्राहिम की आवाज भरभराई हुई है.

'हमारा प्यार अब इन्हीं तारीखों पर टिक गया है. क्या पता, आने वाली तारीख क्या मोड़ लाए!'

(ये कहानी अंजली और इब्राहिम उर्फ आर्यन से टेलीफोनिक इंटरव्यू के आधार पर लिखी गई है, फिलहाल कोर्ट में मामला चल रहा है.)

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