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#HumanStory: शानदार सरकारी नौकरी छोड़ गांवों में काम कर रही है ये IITian

News18Hindi
Updated: November 27, 2019, 5:27 PM IST
#HumanStory: शानदार सरकारी नौकरी छोड़ गांवों में काम कर रही है ये IITian
IITian पूजा भारती की कहानी

मेरे इस्तीफा देने के बाद की बात है. नोटिस पर थी, तभी एक मीटिंग रखी गई. तमाम अफसरों के साथ डायरेक्टर भी थे. बड़े ही नर्म लहजे में मुझसे इस्तीफे की वजह पूछी. मैंने बताया- खेती-बाड़ी करनी है. मुझे राजी करने की थोड़ी-बहुत कोशिश के बाद उन्होंने पूछा- सरकारी नौकरी के राजसी ठाठ के बाद मिट्टी-पानी झेल पाओगी! बाद के काफी दिनों तक ये सवाल मेरे साथ चला.

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  • Last Updated: November 27, 2019, 5:27 PM IST
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IIT (Indian Institutes of Technology) के कितने ही साथी विदेश चले गए. करोड़ों का पैकेज. अमरीका-लंदन के पॉश इलाकों में घर. पेज-3 लाइफस्टाइल. तमाम ठाठबाट के बावजूद छुट्टियों में घर आते तो मुंह मुरझाया होता. आंखों के नीचे रातें का निशान. मिलते तो देर तक सिसकते. उन्हें देखती और सोचती- मुझे 'कुछ और' करना चाहिए. आखिरकार मैंने गेल (GAIL) की नौकरी छोड़ी और किसानी शुरू कर दी. पढ़ें, IITian पूजा भारती की कहानी.

बिहार के नालंदा के छोटे से गांव कंचनपुर की पैदाइश है मेरी. परवरिश और शुरुआती पढ़ाई वहीं हुई. गांव का सरकारी स्कूल, जहां टाट-पट्टी पर झूल-झूलकर हम सारे बच्चे सबक दोहराते. स्कूल में टीचर इक्का-दुक्का ही थे, ऐसे में बड़ी-छोटी सारी क्लास के बच्चे एक कमरे में बैठकर पढ़ते. अंग्रेजी का कोई टीचर नहीं था. सिर्फ हिंदी, विज्ञान और गणित. कभी-कभी अंग्रेजी न पढ़ सकने का मलाल होता था लेकिन फिर गणित के सबक में सब भूल-भाल जाती.

मौसमों का स्कूल से सीधा कनेक्शन था. बारिश में छत टपकती- स्कूल की छुट्टी हो जाती. खेती का मौसम आता- स्कूल बंद हो जाता. बस सर्दियों का मौसम मजेदार रहता था. तब स्कूल की छत पर बैठकर पढ़ाई होती. धूप सेंकते बच्चे बीच-बीच में ऊंघ भी लेते.

दसवीं के बाद पढ़ाई के लिए पापा ने थोड़े बढ़िया स्कूल में एडमिशन दिला दिया. गांव से ही 8 किलोमीटर दूर. यहां पढ़ाई तो होती थी लेकिन माहौल अलग था. जिस मोहल्ले में हम रह रहे थे, वहां बगल के घर से लोग बाहर जाते तो अपनी तीन बेटियों को बंद करके जाते थे. लड़कियों का बाहर निकलना या ज्यादा पढ़ना मना था.

पूरे गांव या आसपास के कई गांवों में हमारे घर की लड़कियां यानी मेरी दीदियां सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी थीं. दसवीं के बाद लड़की को अपने घर भेज देना ही सबसे सुरक्षित माना जाता था. मेरे घर में भी पढ़ाई की छूट तो थी लेकिन कौन सी पढ़ाई, ये कोई बता नहीं पाता था. बड़ी बहनों ने ग्रेजुएशन किया. आगे उन्हें नहीं पता था कि क्या करना है. उनकी शादियां हो गईं. न पता होने पर ब्याह दिए जाने के डर ने मुझे IIT की तरफ मोड़ा. मुझे डर था कि कुछ नहीं करूंगी तो शादी कर दी जाएगी. बस, मैंने तैयारी शुरू कर दी.

दो साल डटकर पढ़ाई की. दोस्त, रिश्तेदारी में शादी-ब्याह, हंसी-ठिठोली सब छोड़कर सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई. दिल में बस यही था कि IIT निकालनी है.

स्कूल, जहां टाट-पट्टी पर झूल-झूलकर हम सारे बच्चे सबक दोहराते (प्रतीकात्मक फोटो)
IIT खड़गपुर पहुंचने पर जिंदगी ने अलग ही मोड़ ले लिया. बड़ा आलीशान कैंपस. किसी बंगले से बड़ी लाइब्रेरी. लाखों-लाख किताबें. पढ़ने का कोई वक्त नहीं. बस एक ही मुश्किल थी. सारे लैक्चर्स अंग्रेजी में होते.

क्लास में गणित में हमेशा अव्वल रहने वाली लड़की बुत बनी सुनती रहती. क्लास खत्म हो जाती लेकिन लैक्चर का कोई हिस्सा भी समझ नहीं आता था. धीरे-धीरे कान उस भाषा के आदी होने लगे. दूसरे सेमेस्टर तक मैं समझने लगी और फिर सवाल-जवाब भी करने लगी थी. क्लास में आगे बढ़ी तो खेल-कूद में भी आगे आई. बिहार में लड़कियां लंगड़ी-दौड़ या बिल्लस जैसे घरेलू खेलों तक रहती थीं, यहां आकर मैंने बास्केटबॉल खेलनी शुरू की. अपने कॉलेज को रिप्रेजेंट भी किया.

कॉलेज में इंटर्नशिप के लिए मुझे अमेरिका की वर्जिनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी भेजा गया. वहां की दुनिया अलग ही थी. बाहर बसने, वहीं से पीएचडी करने का मौका हाथ पसारे बैठा था. लेकिन मैंने लौटकर नौकरी को चुना. तमाम पढ़ाई के दौरान 7 भाई-बहन और उनकी पढ़ाई-शादी के लिए घर के बिकते खेत याद रहे थे. गेल में नौकरी मिली. बढ़िया पैकज. शानदार जिंदगी. ट्रेनिंग में जाती तो फाइव स्टार में ठहराते. हालात सुधर रहे थे लेकिन भीतर कहीं कुछ मिसिंग था. मेरा गांव कनेक्शन लगातार जोर मार रहा था.

बचपन में खाने-पीने के मामले में खूब संपन्नता देखी. संपन्नता यानी अनाज से भरपूर खेत. खुशबूदार धान और उम्दा किस्म की दालें उगतीं. फल-सब्जियों के लिए अलग बाग था. कभी कुछ भी बाहर से नहीं खरीदना पड़ा.

घर के पास ही मिट्टी की कई कोठियां थीं, जिनमें अनाज स्टोर करके रखा जाता. बाढ़-अकाल आ जाए तो भी भूखों मरने की नौबत नहीं आए. धीरे-धीरे बहनों की शादियां होने लगीं और एक -एक करके खेत बिकने लगे. दुकानों से ऊंची कीमत पर अनाज-फल खरीदा जाने लगा. मां-बाबूजी की सेहत गिरने लगी.

मैं खेती के बारे में सोचने लगी थी लेकिन नौकरी छोड़ने का इरादा पक्का तब भी नहीं था. इरादा परखने के लिए मैंने एक तरीका निकाला. मैं छोटी-छोटी छुट्टियां लेकर रिसर्च करने लगी. खूब पढ़ती. खूब घूमती. देश के कई हिस्सों, कई गांवों को देखा. उन तमाम जगहों पर गई, जहां अच्छी खेती पर काम होता था. 4 महीने एकदम दूर-दराज असम में जाकर रही.

मैं खेती वाले परिवार से तो थी लेकिन खेती आती नहीं थी


मैं खेती वाले परिवार से तो थी लेकिन खेती आती नहीं थी. वहां पर मैंने सारे काम सीखे. पौधे रोपा, गुड़ाई, मिंचाई सबकुछ करती. वहां से मध्यप्रदेश के हरदा पहुंची, जैविक कृषि विशेषज्ञ दीपक सचदे से मुलाकात के लिए (इसी साल अक्टूबर में उनका निधन हुआ है). वहां पर खेती का असल हुनर सीखा. उन्होंने बताया कि जंगल में तो कोई खाद-पानी नहीं होता, फिर वहां की हरियाली कैसे बनी रहती है. हरदा से निकलने के बाद पहला काम किया दफ्तर जाकर इस्तीफा देने का.

बिहार या झारखंड जैसी जानी-पहचानी जगह से काम क्यों नहीं शुरू किया?
पूजा कहती हैं- नौकरी छोड़कर खेती की बात बताई तो पूरा घर खिलाफ हो गया. भाई-बहनों ने मोर्चाबंदी कर ली. मां-बाबूजी चुप हो गए. सबने यही कहा कि मैं गलती कर रही हूं. पछताऊंगी. मैं अड़ी रही तो घरवालों ने बात बंद कर दी. ऐसे में अलग अपने घर-गांव की तरफ काम शुरू करती तो नातेदार और टोकते. यही सोचकर मैंने पास का स्टेट उड़ीसा चुना. एक और वजह भी थी. खेती-किसानी का काम आजादी मांगता है. खुलकर काम करना होता है. बिहार या झारखंड में लड़की का खेतों में अपने मुताबिक काम आसान नहीं. उसके हिस्से कुछेक काम ही होते हैं. उड़ीसा अनजान जगह थी, यहां वो मुश्किल नहीं थी.

दिसंबर 2015 में मैंने और मेरे बिजनेस पार्टनर मनीष कुमार ने उड़ीसा के मयूरभंज जिले में डेरा डाला. छोटे-छोटे कमरे तलाशे और काम शुरू कर दिया. ‘बैक टू विलेज’ नाम से प्रोजेक्ट शुरू किया.

5 गांव चुने और रोज वहां जाने लगे. इतने दिनों में जो जैविक खेती पर जो कुछ भी सीखा था, सब उन किसानों को बताने लगे. कोई सुनता, कोई बिना सुने दुत्कार देता. कोई-कोई सुनने के बाद चला जाता. हम अगले दिन फिर जाते और फिर से उन्हीं चेहरों से टकराते. महीनेभर में हमने कामचलाऊ उड़िया सीख ली थी. गांववाले कामचलाऊ हिंदी जानते थे. धीरे-धीरे काम बन निकला. वे हमपर यकीन करने लगे और जैविक खेती के हमारे तरीके अपनाने लगे. फायदा दिखने पर दूसरे किसान भी हमारी सुनने लगे.

बीते चार सालों में क्या सरकारी नौकरी छोड़ने की कोई कसक नहीं हुई? पूजा तपाक से कहती हैं- कभी नहीं. शुरुआत में घरवालों की नाराजगी ने थोड़ा डराया था लेकिन जब खेतों में काम शुरू किया तो मिट्टी ने सब दर्द सोख लिया.

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First published: November 27, 2019, 2:28 PM IST
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