#HumanStory: मुझे अस्पताल छोड़ बहन को दफनाने ले गए, कहानी- आतंकी धमाके में बहन खो चुकी लड़की की

साल 2008 के जयपुर बम ब्लास्ट की चश्मदीद अलीना

जोर का धमाका (bomb blast) हुआ. आंखें खुलीं तो खुद को खून और धूल में सना पाया. मांस के जलने की गंध. आग. और गहरा धुआं. लोग दौड़ रहे थे. शायद चीखते हुए. मुझे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. खून में सनी मैं बेतहाशा दौड़ पड़ी. घरवाले मुझे लेकर अस्पताल पहुंचे. वहीं मुर्दाघर (mortuary) में बहन की लाश पड़ी थी.

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मई 2008. जयपुर बम ब्लास्ट (Jaipur bomb blast) . 70 से ज्यादा मौतें और सैकड़ों घायल हुए. खून, चीथड़ों और चीखों से दहला हुआ शहर धीरे-धीरे फिर रौनकों में डूब गया. एक रोज खून से सनी सड़कों पर अब गाड़ियां फर्राटे भरती हैं. लेकिन हादसे में अपनों को खो चुके परिवार अब भी साल 2008 की मई में अटके हैं. पढ़ें, ब्लास्ट की चश्मदीद (witness of blast) और हादसे में अपनी छोटी बहन इल्मा को खो चुकी अलीना को.

तब हम चांदपोल में रहते. घर के पास ही हनुमान मंदिर था. मंदिर के किनारे-किनारे हलवाइयों की दुकानें सजी हुईं. वहीं से हम दही-मिठाइयां लिया करते. उस रोज अम्मी ने मुझे और इल्मा को दही लाने भेजा. शाम का वक्त था. गर्मी का मौसम. हम दोनों मजे में घर से बाहर निकले. मैं दसेक साल की रही होंगी और बहन मुझसे 2 साल छोटी. लेकिन हाथ में दही खरीदने के भी पैसे आएं तो हम खुद को खूब सयाना मानने लगते थे. वो दिन भी ऐसा ही था.

क्योंकि मैं बड़ी थी तो दही के पैसे मेरी मुट्ठी में थे. दूसरे हाथ से इल्मा का हाथ थामे मैं दुकान पहुंची. वहां काफी भीड़ थी. दुकानवाला हमसे पहले आए ग्राहकों को निपटा रहा था. मैंने पंजों के बल उचककर एक-दो बार अपनी डिमांड रखी और फिर इंतजार करने लगी. पूरे दिन की गर्मी के बाद हवा में हल्की ठंडक आई थी. हम आराम से बतियाते किनारे खड़े थे. तभी जोर की आवाज आई. जैसे एक साथ बहुत सारी गैस टंकियां फट गई हों.

जयपुर बम ब्लास्ट को 11 साल बीत चुके हैं


कब इल्मा का हाथ छूटा, कब मैं जमीन पर गिरी और कब मेरी आंखें खुलीं- मुझे कुछ याद नहीं. इतना याद है कि चारों ओर गहरा-काला धुआं ही धुआं था. लोग भाग रहे थे. एक-दूसरे पर गिर रहे थे. आसपास खून और लाशें बिखरी हुई थीं.

मैंने बेतहाशा दौड़ना शुरू किया. चेहरा और पूरा शरीर खूनाखून था. दौड़ते हुए अपने पीछे खून की लकीर बनाती जा रही थी लेकिन घर पहुंचकर ही गिरी. मुझे बांहों में संभाले अम्मी चीख रही थी. तभी किसी की आवाज आई- इल्मा कहां है?... मेरे कान भन्न-भन्न कर रहे थे. लोग शायद गला फाड़कर चीख रहे होंगे क्योंकि उनके मुंह खुले हुए थे. कानों की सांय-सांय के बीच मैंने कहा- मुझे नहीं पता, वो कहां है. और मैं बेहोश हो गई.

अस्पताल में आंखें खुलीं तब इल्मा का पता चला. जहां मैं एडमिट हुई, वो उसी अस्पताल के मुर्दाघर में थी. बदहवास घरवालों ने एक बेटी का इलाज शुरू करवाया और दूसरी बेटी को दफनाने ले गए. मैं बिस्तर पर पड़े रोया करती. अपने शरीर के दर्द से. इल्मा की मौत पर. उस शाम की याद से. मेरे शरीर पर जहां-तहां छर्रे छूते हुए निकल गए थे. एक्सरे हुआ. डॉक्टर ने कहा- सर्जरी करनी होगी. फिर दूसरे डॉक्टरों से बात करने लगा. छोटी बच्ची है. सर्जरी की बजाए दूसरे तरीके भी देख सकते हैं.

घरवालों ने एक का इलाज शुरू करवाया और दूसरी बेटी को दफनाने ले गए (प्रतीकात्मक फोटो)


अलीना याद करती हैं- लड़की जात हूं, सोचकर ऑपरेशन की बजाए दवाएं देने लगे. शरीर पर अब भी छर्रों के निशान हैं.

5 दिनों बाद अस्पताल से लौटी तो सब बदला हुआ था. अम्मी हर वक्त रोती और हमलावरों को कोसती. दोनों भाई एकदम से बड़े हो गए थे. कहीं भी जाती तो मेरे साथ रहते. इन सबसे ऊपर- अब इल्मा नहीं थी. दो साल छोटी थी लेकिन मेरी जुड़वा लगती. कोई भी मौका हो, अम्मी दोनों के लिए एक जैसे कपड़े सिलवाती. दोनों एक साथ स्कूल जाया करते. साथ लौटते. साथ ही पढ़ने बैठते. वो गई तो पढ़ने का मन भी चला गया. सेहत लौटी तो अम्मी ने स्कूल जाने के लिए खूब मनाया लेकिन फिर मैं जा ही नहीं सकी. एकाध बार जाने की कोशिश की लेकिन रास्ते से रोती हुई लौट आई. फिर किसी ने जिद नहीं की.

आतंकी धमाके. किसी के लिए ये सिर्फ खबर है. किसी के लिए किसी खास मजहब से नफरत की एक वजह. लेकिन अलीना जैसे परिवारों के लिए ये एक नासूर है. बातचीत के दौरान वे कई बार कहती हैं- हमने घर का सबसे प्यारा बच्चा खो दिया. अब दोहराने का फायदा नहीं. अल्ला हमलावरों से पूरा हिसाब लेगा.

अलीना की अम्मी अब भी इल्मा की याद में डूबी रहती है


हादसे के बाद परिवार ने चांदपोल छोड़ दिया और जयपुर के एक कोने में रहने चले गए. इसके बाद लंबे वक्त तक वहां नहीं गए. अब? अलीना कहती हैं- चाचा, दादा वहीं रहते हैं. कभी-कभार मौका पड़े तो जाना होता है. जाओ तो लगता है, जल्दी लौट आओ. उस रास्ते से भी गुजरूं तो इल्मा के साथ स्कूल जाना याद आ जाता है.

'बड़ी हुई तो पता चला कि इल्मा का मतलब है उपन्यास. उस रोज बड़ा मलाल हुआ. इतनी कम उम्र में न जाती तो शायद अपने नाम के मायने जी रही होती.'

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