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#HumanStory: पुलिस अफसर का तजुर्बा- '24 घंटे के लिए थाने बंद हो जाएं तो दिल्ली पहचानी नहीं जाएगी'

News18Hindi
Updated: January 8, 2020, 12:13 PM IST
#HumanStory: पुलिस अफसर का तजुर्बा- '24 घंटे के लिए थाने बंद हो जाएं तो दिल्ली पहचानी नहीं जाएगी'
एसबीएस त्यागी (retired Joint Commissioner of Delhi Police) अपने पेशे की मुश्किलें बांटते हैं

तड़के निकलता है तो आधी रात से पहले कोई पुलिसवाला (police cop ) घर नहीं लौटता. बीवी- बच्चों का चेहरा देखे अरसा गुजर जाता है. त्योहार थाने (police station) में या सड़कों पर बीतते हैं. खुद मैंने 33 साल लंबे पेशे में 2 बार छुट्टियां लीं- पिता की मौत और बेटी के ब्याह पर. तब भी लोगों की नजरों में हमारी कोई इज्जत नहीं.

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  • Last Updated: January 8, 2020, 12:13 PM IST
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चंद रोज पहले जब देश में कत्लेआम मचा था, तभी एक तस्वीर वायरल (viral picture) हुई. एक पुलिसवाले (police cop) को फूल देती लड़की. मुस्कुराती लड़की के हाथ में दहकता हुआ लाल गुलाब (red rose). इधर वर्दी के साजोसामान में लैस पुलिसवाले के चेहरे पर झेंपी हुई मुस्कान. तस्वीर के साथ पुलिसिया हिंसा (police violence) की कहानियां. मानो गुलाब न हो, खूबसूरत लानत हो. अपने पेशे की मुश्किलें बांटते हुए एसबीएस त्यागी (retired Joint Commissioner of Police, Delhi) कहते हैं- पहले दिन से अब तक नफरत ही झेल रहा हूं.

मैं साधारण किसान परिवार में जन्मा. गंगा किनारे रहता और दुनिया बदलने के ख्वाब देखता. बड़ा होते हुए समझ आया कि कद और उम्र ही नहीं, ओहदे में भी बड़ा होना होगा. बड़ी मशक्कत से पढ़ाई की और सिविल सर्विस में आया. सन् 84 की बात है.

दिल्ली पुलिस से नौकरी की शुरुआत हुई. अब जमुना मेरी नई गंगा थी. दिन से रात तक काम किया करता. ईमानदारी की हद ऐसी कि तब 10 रुपए लेते पुलिसवालों को भी डिसमिस किया था.

अब सोचता हूं तो मन को तकलीफ-सी होती है. कहां तो 10 हजार करोड़ खाकर भी लोग मजे में जिंदगी काटते हैं और कहां 10 रुपए के लिए वो लोग बर्खास्त किए गए.

पुलिसवाले को गुलाब देती वो तस्वीर जो वायरल हुई


33 साल से ज्यादा वक्त वर्दी को दे चुके इस अफसर के पास हजारों कहानियां हैं. दहशत, खोज की कहानियां, जुल्म और जुल्म करने वालों को सलाखों के पीछे ले जाने की कहानियां.

हर कहानी के साथ एक खास अहसास भी है- आम लोगों के खौफ, उनकी नफरत का. वे याद करते हैं- हमने चाहा तो कसाब जैसे आतंकवादी को भी पूरे मुल्क के गुस्से से सुरक्षित रखा वरना उसी भी मॉब लिंचिंग हो जाती. ऐसा नहीं है कि हमें उसपर गुस्सा नहीं था लेकिन हम फेयर ट्रायल चाहते थे. अब पुलिस की मौजूदगी में JNU में घमासान हो पाता है. पढ़ने वाले वे बच्चे कसाब जैसे आतंकी से तो बड़े नहीं. लेकिन कई बार ऐसा होता है. कई वजहें होती हैं. बाद में पुलिस ही बलि का बकरा बनेगी. पुलिसवाले सस्पेंड होंगे और इंसाफ मुकम्मल हो जाएगा.एक पुरानी कहावत है न, गरीब की जोरू, गांव की भौजाई. हम पुलिसवालों पर यही बात लागू होती है. हम सबसे गरीब हैं. हमारी कोई आवाज नहीं.

आएदिन लोगों की नफरत झेलते हैं. काम के दौरान कितनी ही बार सुना- दिल्ली पुलिस चोर है. सुनकर भी सफाई नहीं दी जा सकी. हमारी वर्दी पर इतने भ्रम फैले हुए हैं कि आसानी से वे दूर नहीं होंगे. लोग डरते हैं. डरेंगे. नफरत करते हैं. करेंगे. लेकिन हमसे भाग नहीं सकते. आज पुलिस कंट्रोल रूम में दिनभर में लाख से ज्यादा कॉल आते हैं.

किसी के घर बंदर घुस जाए तो भी 100 नंबर लगता है. कहीं आग लग जाए तो भी कंट्रोल रूम का फोन घनघनाता है. इस यकीन के बावजूद लोग हमसे नाराज रहते हैं.

पुलिस कंट्रोल रूम में दिनभर में लाख से ज्यादा कॉल आते हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


जैसे साल 2013-14 में कई घोटालों के खिलाफ प्रोटेस्ट हो रहे थे. कुछ लोग सड़कों पर उतरे हुए थे. ऐसे में पढ़नेवालों और नौकरीपेशा लोगों को खासी परेशानी हो रही थी. हमने फसादियों को भीड़ जमा करने से रोका तो वे हमपर ही चढ़ आए. मुझे याद है, वे अपनी ऊंगलियां मेरी नाक तक लाकर चिल्लाते थे- तुम पुलिसवाले चोर हो. सरकार के तलवे चाटते हो. उनकी भद्दी गालियों के बदले हम सिर्फ समझाते थे.

प्रोटेस्ट करने का हक सब सबको है लेकिन अस्पताल या स्कूल जाती किसी गाड़ी को रोकने की कीमत पर नहीं.

निर्भया मामले में सबको गुस्सा था. हिंदुस्तान हिला हुआ था. हम भी. हम चिड़िया बने, सर्कस किया, दौड़ लगाई, हवाई जहाज से, बस से. सिर से बल खड़ा होकर 10 दिनों में 10 हजार पन्नों की चार्जशीट दाखिल की. हमारा यही काम था. हमने जी-जान से पूरा किया. अब उन्हीं 10 दिनों के काम पर 8वां साल हो गया लेकिन इंसाफ इंतजार कर रहा है! इसपर भी लोगों को खास गुस्सा नहीं. लेकिन हमपर है.

किसी को दिल का मर्ज हो तो वो आंखों के डॉक्टर से ठीक करने की उम्मीद नहीं कर सकता. ऐसे ही हर मर्ज की दवा पुलिस नहीं. उसका भी एक अधिकार क्षेत्र है, वो जिससे बाहर दखल नहीं रखता.

निर्भया मामले में पूरा हिंदुस्तान हिला हुआ था


लगभग 40 मिनट के इंटरव्यू में जैसे खुद से ही जॉइंट कमिश्नर सवाल करते हैं- आखिर हमसे इतनी नफरत क्यों?

जिनके खिलाफ गुस्सा होना चाहिए, वहां लोग हंसकर बात करते हैं. बच्चों के स्कूल में लाखों की फीस के बदले कुछ न सिखाया जाए लेकिन पीटीएम में हंसकर मिलते हैं. घोटालेबाजों को देख हाथ जोड़कर नमस्ते करते हैं. सारा गुस्सा हमपर उड़ेला जाता है. पुलिसवाला है, झूठ ही कहेगा. पुलिसवाला है, गलत ही करेगा. पुलिसवाला है...

हम पुलिसवाले ही हैं तो दिल्ली दिल्ली रह सकी है. डॉक्टर के बिना रह सकते हैं. इंजीनियर के बगैर काम चल जाएगा लेकिन हमारे बिना 20 घंटे भी नहीं चलेगा. बस, चौबीस घंटे के लिए थाना बंद हो जाए. कोई कार्रवाई नहीं. 24 घंटों बाद आप अपनी ही दिल्ली को पहचान नहीं सकेंगे. मेरी भी मां है, बीवी है, बेटी है, उसका बेटा है. शक्ल इतनी बिगड़ जाएगी कि हम लोग भी एक-दूसरे को पहचान नहीं सकेंगे.

हां, हमारे महकमे में भी चंद खराब लोग हैं. लेकिन हमारी शक्लों में उनका चेहरा मत खोजिए. हमसे प्यार मत कीजिए, लेकिन नफरत भी मत कीजिए. बस यकीन कीजिए.

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First published: January 8, 2020, 10:55 AM IST
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