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#HumanStory: वो 'बैंक' जहां मुफ्त मिलती हैं किताबें, इस वजह से हुई शुरुआत

News18Hindi
Updated: February 12, 2020, 10:29 AM IST
#HumanStory: वो 'बैंक' जहां मुफ्त मिलती हैं किताबें, इस वजह से हुई शुरुआत
मकसद है कि कोई बच्चा किताबें न होने के कारण पढ़ाई न छोड़े (प्रतीकात्मक फोटो)

हाईस्कूल की बात होगी. क्लास की सबसे तेजतर्रार लड़की ने आना बंद कर दिया. वो मेरी दोस्त भी थी. घर गई तो पता चला कि किताबें न खरीद पाने की वजह से उसे पढ़ने से रोक दिया गया. एक के बाद कई लड़कियां पढ़ाई छोड़ती गईं. तभी से दिल में एक इरादा उगने लगा.

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  • Last Updated: February 12, 2020, 10:29 AM IST
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अमिता शर्मा की कहानी, जिन्होंने किताबों की तंगी में पढ़ाई छोड़ते बच्चों के लिए शुरू कर दिया फ्री बुक बैंक...

गाजियाबाद के पास बसा एक छोटा-सा गांव. कुछ सैकड़े की आबादी वाले उस गांव में सबकुछ वैसा ही था, जैसी गांव की तस्वीर खींची जाती है. दूर-दूर तक फैले खेत-खलिहानों के बीच पक्के-कच्चे घर. घरों के बीच सब्जियों और गपशप का लेन-देन. इसी गांव में एक लड़की बड़ी हो रही थी. हाईस्कूल पहुंची तो घर में चर्चा हुई. बच्ची को आगे तो पढ़ाना है लेकिन भेजा कहां जाए!

खूब बहस-मुबाहिसे के बाद पक्का हुआ कि पढ़ना तो होगा. लड़की का एडमिशन गांव से बाहर एक स्कूल में हुआ. तब गांव की कई साथिनें वहीं रह गईं. वजह! रोज गांव से बाहर आना-जाना होगा. लड़की की जात कैसे ये करेगी. जिन लड़कियों के साथ ये बंदिश नहीं थी, वे साथ जाने लगीं. लेकिन हर बढ़ती क्लास के साथ लड़कियां कम होती गईं.

अमिता याद करती हैं- क्लास की सबसे तेज लड़की ने जब पढ़ाई छोड़ी, तब मुझे खटका हुआ. वजह पूछने पर बताया गया कि घरवाले या तो फीस दे सकते हैं या किताबों के पैसे. दोनों खर्च एकसाथ मुमकिन नहीं. वो भी लड़की की पढ़ाई पर.

प्रेरणा बुक बैंक की संचालक अमिता शर्मा खुद मेरठ के एक बुक बैंक में बैठती हैं


मैं भीतर जाकर अपनी उस दोस्त से मिली. वो चुपचाप चावल बीन रही थी. सिर झुका हुआ. गले में जैसे कुछ अटका हुआ-सा लगा. मैं बिना कुछ पूछे-कहे, बगैर कोई आंसू टपकाए लौट आई.

सोचती हूं तो लगता है कि पढ़ने का मौका मिलता तो शायद वो दोस्त दुनिया को कुछ नया देती. कोई नया ग्रह, कोई कल-पुर्जा या कोई ऐसी कविता, जो इंसानियत पर यकीन बढ़ा दे.वक्त सरकता रहा. क्लास-दर-क्लास आगे बढ़ती रही लेकिन चावल बीनती उन उदास आंखों को कभी नहीं भूल सकी. शादी के बाद पति से ये वाकया कह सुनाया. हमारी बातचीत कुछ ऐसी रही-

मैं- कोई किताबों की वजह से पढ़ाई छोड़े, ये ठीक नहीं.
वे- बिल्कुल ठीक नहीं. तब!

मैं- हमें ऐसे बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए.
वे- बताओ क्या? तुम ऐसे बच्चों को कैसे पहचानोगी और उनतक मदद कैसे ले जाओगी?

मेरे पास कोई योजना नहीं थी. बस, एक इरादा था कि कम से कम मेरे सामने कोई बच्चा पढ़ाई न छोड़े. खुद शिक्षक के पेशे से जुड़े पति (संजय शर्मा) का कहना था कि सबकुछ सिलसिलेवार तरीके से होना चाहिए. ये साल 2016 की बात है. साथ बैठकर हमने सारी बातें कीं. बच्चों तक मुफ्त किताबें कैसे पहुंचें, इसपर प्लान बनाया. शुरुआत अपने ही शहर मेरठ से की. एक छोटा कमरा किराए पर लिया. वहां अपने ही बुक बैंक से बच्चों के स्कूल की और कुछ मोटिवेशनल किताबें रखीं. सामने एक मेज-कुर्सी रखी, जिसपर लाइब्रेरियन बैठ किताबों का हिसाब-किताब रखे.

इस बुक बैंक को कोई नाम देना भी जरूरी लगा तो नाम रखा प्रेरणा बुक बैंक. ये कमरा मेरे सपने की ओर पहला कदम था.

जरूरत के मुताबिक कई बच्चे सालभर के लिए भी किताबें ले जाते हैं


अफवाहें हवा की रफ्तार से फैलती हैं लेकिन काम की बात फैलने में वक्त लगता है.

धीरे-धीरे बच्चों को पता चलने लगा कि यहां मुफ्त किताबें मिलती हैं, वो भी लंबे वक्त के लिए. अमिता बताती हैं- हमारा मकसद कोई लंबा-चौड़ा नहीं, बल्कि सिर्फ इतना है कि कोई बच्चा किताबें न होने के कारण पढ़ाई न छोड़े. ऐसे में अगर हम दसवीं में पढ़ने वाले बच्चे को महीनेभर के लिए किताब दे रहे हैं, तो ये मदद किसी काम की नहीं. लिहाजा, हमने पक्का किया कि जरूरत के अनुसार वे खुद ही अपनी मियाद तय करें. कई बच्चे सालभर के लिए किताबें ले जाते हैं, जबकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लोग महीनेभर के लिए किताबें लेते हैं.

किताबें वापस लौटें, इसके लिए बस इतना किया कि बच्चों को आधार कार्ड की फोटोकॉपी देनी होती है. पांच साल हुए, अबतक किसी भी बच्चे ने किताबें लौटाने में कोई लापरवाही नहीं दिखाई.

अप्रैल 2016 में मेरठ में किराए के एक कमरे से हुई शुरुआत अब देश के कई हिस्सों तक पहुंच चुकी है. हरियाणा, उत्तराखंड और गाजियाबाद में प्रेरणा बुक बैंक की कुल 55 शाखाएं हैं. मेरठ का ये बुक बैंक दूरदराज तक कैसे पहुंचा, इसकी कहानी दिलचस्प है. अमिता बताती हैं- अपने ही शहर में शुरुआत आसान थी लेकिन दूसरे राज्यों तक पहुंचना न तो आसान था, और न ही हमने सोचा था. छुट्टियों में एक नातेदार के यहां रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) जाना हुआ. वहां पढ़ाई का जिक्र निकला. महंगी किताबों की बात होने लगी. तभी मैं पूछ पड़ी- आप लोग भी बुक बैंक क्यों नहीं बनाते! कहते वक्त सोचा नहीं था कि बात इतनी आगे जाएगी. रुद्रप्रयाग में किसी जाननेवाले ने एक कमरा लाइब्रेरी के लिए साफ करवा दिया. अब कमरा तो था लेकिन किताबों के बिना.

पढ़ने के लिए लोगों को जागरुक करने का काम भी अमिता करती हैं


मेरठ लौटकर सबसे पहले हमने किताबों के लिए संपर्क शुरू किया. अमिता याद करती हैं- मुश्किलों की शुरुआत हो चुकी थी. सोशल मीडिया, फोन के मार्फत हमने बुक बैंक की बात साझा की और किताबों की मदद मांगी. बहुत से फोन आने लगे. ऐसे पेरेंट्स के जो बच्चों के पढ़-लिख जाने के बाद हर साल उनकी किताबें रद्दी में निकाला करते. उन्होंने कहा- किताबें हमारे पास हैं, आप इकट्ठी कर लीजिए. मेरठ और आसपास से फोन आने लगे.

हम वीकेंड की बाट जोहते. हर शनिवार या रविवार को गाड़ी लेकर जाते और किताबें लादकर लौटते. इसके बाद किताबों को खाली कमरों तक पहुंचाना होता था. इसके लिए अगले वीकेंड का इंतजार करते.

बुक बैंक बनाने के सिलसिले में कई बार हमारा मजाक बना. लोग वीकेंड पर नया पकाते हैं, तफरीह करते हैं, मिलते-मिलाते हैं, हमने अपने 2 दिन इसी काम को दे रखे थे. गांव-गांव जाकर लोगों को पढ़ने की अहमियत समझाते. किताबों की बात समझाते. बहुत बार गांववाले मजाक बनाते कि हम शहरी लोग खाली हैं, इसलिए वक्त बिताने गांव चले आते हैं. वहीं कुछ लोग बुक बैंक का आइडिया पसंद करते. कई गांव हैं, जहां के बुजुर्ग खुद ही लाइब्रेरी में किताबें इश्यू करने बैठते हैं. बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता, सिवाय बच्चों की मुस्कान के.

अमिता मेरठ के एक बुक बैंक की कुर्सी संभालती हैं. हर नई किताब के आने पर मुड़े पन्नों को सीधा करना, उनसे पेंसिल के निशान हटाना और उनपर कवर चढ़ाना, ये सारे काम अमिता बाखुशी करती हैं. जैसे किताबें न हों, सपनों का कोई टुकड़ा हो.

वे कहती हैं- बच्चे लगातार किताबों के लिए आते रहते हैं. जब भी कोई बच्चा, खासकर लड़की किताब लेती है, मुझे सालों पहले की अपनी दोस्त याद आ जाती है.

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First published: February 12, 2020, 10:29 AM IST
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