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#HumanStory: बहुमंजिला इमारतें बनाने वाले बेघर मजदूर की आपबीती, '7वीं मंजिल से गिरने को था'

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Updated: December 2, 2019, 10:24 AM IST
#HumanStory: बहुमंजिला इमारतें बनाने वाले बेघर मजदूर की आपबीती, '7वीं मंजिल से गिरने को था'
पश्चिम बंगाल के मालदा के ममिरुद्दीन दिल्ली में कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं

ये तबका लिली के फूल या छिटकती चांदनी पर कविता नहीं करता. क्रांति की आग भी इनमें नहीं दिखती. दिखता है तो दिन से रात तक सुलगते-भीगते मौसमों में काम का जज़्बा. छूते मैली पड़ें, ऐसी चमकदार इमारतें बनाते ये मजदूर भी ख्वाब देखते हैं- भरपेट खाने का. और कर्ज उतारकर गांव लौटने का.

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  • Last Updated: December 2, 2019, 10:24 AM IST
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ममिरुद्दीन (35) और अजिनूर (30) की कहानी. पश्चिम बंगाल के मालदा का ये जोड़ा एक बहुमंजिला इमारत में काम करता है. वे उस तबके का चेहरा हैं, जो दिनभर मौसमों की मार झेलते हैं ताकि रातें टीन की टपरियों में बीत सकें. बिस्तर के नाम पर उधड़ी चटाई होती है, टॉयलेट की जगह बजबजाता कमरा, जहां कतार कभी खत्म ही नहीं होती. ये सारी तकलीफें इसलिए ताकि एक रोज अपने घर लौट सकें.

पहली बार दिल्ली आया तो भौंचक था. चारों ओर आवाज़ें ही आवाज़ें. चेहरे ही चेहरे. गाड़ियां. सब भाग रहे थे मानो तुरंत के तुरंत कहीं पहुंचना हो. गांव से दिल्ली आए नाते-रिश्तेदारों ने दिल्ली का कुछ खाका तो खींचा था लेकिन तब पता नहीं कि दिल्ली में खोना इतना आसान है. अपने गांव, अपने बीवी-बच्चों की बेतरह याद आ रही थी. वहां पगडंडी, बीहड़ों और पोखरों के बीच घर था. यहां शुरु के कुछ दिन स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बिताए.

जल्द ही काम मिल गया. एक बहुमंजिला इमारत में मैं मिस्त्री का काम करता. गांव से यही सीखकर आया था. सुबह के 8 से काम शुरू होता तो तभी खाने की छुट्टी मिलती, जब सूरज सिर पर नाचने लगता. शुरुआत में दिक्कत होती थी. भाषा की दिक्कत थी. गांव में बांग्ला बोलता, यहां के मजदूर बिहारी या हरियाणवी में बात करते. मैं अलग-थलग पड़ा रहता. कोई बात नहीं करता था. तब घर की और शिद्दत से याद आती.

ममिरुद्दीन (दाएं)और अजिनूर (बाएं) कर्ज चुकाने के लिए काम कर रहे हैं


गांव में घर के पास किराने की एक दुकान हुआ करती. वहां लैंडलाइन पर फोन करता. कोशिश करता कि रोज बात हो सके. कई बार बात इतनी लंबी हो जाती कि उस दिन की दिहाड़ी पूरी की पूरी खत्म हो जाती.
'लेकिन ऐसा कितने वक्त चलता?', ममिरुद्दीन कहते हैं. फिर मैं गांव गया और अजिनूर (इनकी पत्नी) से बात की. बाकी घरवालों से सलाह-मशविरा किया और उसके साथ शहर आ गया. हमारे तीनों बच्चे अपनी नानी के पास रहते हैं. पत्नी के साथ से अनजान शहर में भी गांव की दूरी कम लगने लगी.

पति की बात सुनते हुए पास खड़ी अजिनूर मुस्कुराने लगती हैं. थोड़ा कुरेदने पर वे भी खुल जाती हैं.गांव में बीड़ी बनाया करती. ऐसे ही एक रोज 'इसने' मुझे देखा. किसी काम से आया था. मैं भी उसे देखती रही, फिर काम में जुट गई. थोड़ी देर बाद नजरें उठीं तो देखा वो तब भी मुझे देख रहा था. होते-होते कई दिन बीते. हम बात नहीं करते थे लेकिन एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे. शादी की बात की तो घरवाले माने नहीं.

ममिरुद्दीन याद करते हैं- मैंने भी कह दिया, या तो इससे शादी करूंगा या अकेला मर जाऊंगा. 5 महीने लगे. हर दिन हम पर भारी था. फिर सब मान गए.

हर मौसम में हाड़तोड़ काम करना होता है (प्रतीकात्मक फोटो)


शादी के बाद मैंने बीड़ी बनाना छोड़ दिया और इसके साथ घर बनाने के काम में मदद करने लगी. इसी बहाने हम ज्यादा से ज्यादा वक्त साथ रहते थे. गांव-घर में पर्देदारी के कारण नई बहुएं अपने घरवाले से कम ही मिलती हैं, मेरी जिंदगी उनसे अलग थी. इसी बीच हमारे बच्चे हुए. पैसों की तंगी होने लगी. फिर ये शहर आया और इसके पीछे मैं भी.

बच्चे नानी के पास रहते हैं. उनकी बड़ी याद आती है. खासकर जब पता चले कि किसी को बुखार है या वे किसी बात पर रो रहे हैं. दिन में दो-तीन बार बच्चों को फोन करते हैं. फिर हर दो महीने बाद कुछ दिनों के लिए गांव जाते हैं. जाने से पहले उनके लिए खिलौने-कपड़े लेते हैं. जाने वाले दिन सुबह की पहली गाड़ी लेते हैं और वापसी में रात की सबसे आखिरी गाड़ी पकड़ते हैं. आंसू ढलकाते बच्चों को छोड़कर आने को जी नहीं चाहता.

बस इस बात की तसल्ली है कि बच्चों को वहां खाने-पीने की तकलीफ नहीं. फोन पर पूछो तो बताते हैं कि आज माछ खाई, कल मटन खाया या आज अंडा खाने जा रहे हैं. उन्हें साथ ले आते तो साथ के अलावा कोई सुख नहीं दे पाते. यहां ठेकेदार ही तरफ से खाना मिलता है. भात और झोलदार सब्जी. हफ्ते में दो दिन अंडा या मटन मिलता है लेकिन उसमें कोई स्वाद नहीं होता.

इस जोड़े ने घर के सामने छोटा सा चूल्हा बना रखा है (प्रतीकात्मक फोटो)


दूसरे मजदूरों से अलग इस जोड़े ने घर के सामने छोटा सा चूल्हा बना रखा है. जब रूखा-सूखा खाते मन ऊब जाए तो इसी पर मछली पकाते हैं. आसपास के सारे मजदूर महक से ही खिंचे चले आते हैं. सब जान जाते हैं कि आज बंगाली चूल्हा चढ़ा है- हंसते हुए ममिरुद्दीन कहते हैं.

पत्नी को अपने साथ काम पर लगाया तो मन कलपता था. ये धूप में काम करती. चूना-सीमेंट मिलाती तो हाथ कट जाया करते. लेकिन कभी शिकायत नहीं की. जो भी जैसा है, इसकी तसल्ली है कि वो लड़की मेरे साथ है, जिससे शादी के लिए मैं बागी हो गया था. कई बार काम करते हुए बड़े हादसे हो जाते हैं, जैसे एक बार सातवीं मंजिल से मैं गिरने को था. सिर पर पतला सा हेलमेट होता है और हाथों में कुछ भी नहीं. कितने ही लोगों को अपने सामने अधमरा होते, कितनों को जान गंवाते भी देखा है. रातों की नींद चली जाती है. जहां हमारे हाथ चलते होते हैं, उस जगह पर कितने घायल मजदूरों का खून बहा होता है.

चमचमाती इमारतें खड़ी करता ये जोड़ा गांव में अपने लिए घर जुटा रहा है. कहते हैं- थोड़ा-थोड़ा जोड़कर पैसे जमा कर रहे हैं ताकि गांव के कच्चे घर को पक्का कर सकें. पैसे आएंगे तो घर को घिरवा भी देंगे. फिर वहीं साग-सब्जियां भी लगाएंगे.

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First published: December 2, 2019, 10:24 AM IST
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