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#HumanStory: गाय पालने के लिए इस कसाई ने छोड़ दिया खानदानी पेशा

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Updated: November 19, 2019, 10:18 AM IST
#HumanStory: गाय पालने के लिए इस कसाई ने छोड़ दिया खानदानी पेशा
कसाई का काम छोड़ शब्बीर के पिता गाय पालने लगे थे (प्रतीकात्मक फोटो)

आंखें खुलते ही जानवरों को कटते देखा. अब्बू भारी-भरकम छुरा लेकर जिंदा जानवर को गोश्त (animal slaughter) और फिर टुकड़ों में बदल देते. विरासत संभालने की समझ के लिए वो मुझे भी साथ रखते. हर बार जब कोई जानवर गोश्त में तब्दील होता, दिल मसोस उठता था.

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  • Last Updated: November 19, 2019, 10:18 AM IST
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दरारें पड़ी जमीन, सूखे नलके, हड्डियों का ढांचा बनते पशु और गिनकर घूंट पीते चेहरे. ये तस्वीर है महाराष्ट्र के बीड जिले की. सालों से गरीब की तिजोरी की तरह सूखे पड़े बीड में सबकी एक कहानी है. लेकिन सबसे अलग है एक खानदानी जल्लाद की कहानी. वो जल्लाद जिसने बगैर पानी मरती गायों के लिए अपना पेशा छोड़ दिया और गाय पालने लगा. पढ़ें, शब्बीर सैय्यद को, जिन्हें पूरा जिला गौ-सेवक मामू बुलाता है.

आज से कई-कई चांद पहले की बात है. अब्बू बूचड़खाना चलाते थे. ये काम उन्हें बाप-दादे से मिला था. वैसे ही जैसे नई बहू को विरासत में कंगन मिलते हैं, या किसी को आंतें फाड़ने वाली गरीबी. एक रोज एक गाय मर गई. बिना छुरा लगाए ही. उसकी मरती हुई आंखें अब्बू को उम्मीद से ताक रही थीं. उस रोज अब्बू ने छुरा छोड़ दिया. 2 गायों से शुरुआत हुई. आज 170 से ज्यादा गायें हैं. 

आंखें खुलते ही मैंने जानवरों को कटते देखा. अब्बू भारी-भरकम छुरा लेकर जानवर को गोश्त और फिर टुकड़ों में बदल देते. विरासत संभालने की समझ के लिए वो मुझे भी साथ रखते. हर बार जब कोई जानवर गोश्त में तब्दील होता, दिल मसोस उठता था. फिर एक रोज अब्बू में खुद ही काम छोड़ दिया. ये 70 के दशक की बात होगी.

शब्बीर को आज भी वो वक्त अच्छी तरह से याद है जब बूचड़खाना छोड़ उनके पिता गाय पालने लगे थे. वे याद करते हैं- एक कसाई दोस्त से हमने 2 गायें खरीदीं. सब हंस रहे थे. तरह-तरह की बातें बना रहे थे लेकिन अब्बू ने ठान ली थी.

कत्लखाना चलाना आता था लेकिन देखभाल नहीं आती थी. अब्बू ने सब सीखा.

शब्बीर सैय्यद को पूरा जिला गौ-सेवक मामू बुलाता है


वे दिन से देर शाम तक गौशाला में काम करते. गोबर साफ करने से लेकर दूध दुहने और बीमार गायों को मरहम लगाने का भी काम ऐसे करते जैसे अपने बच्चों की देखभाल कर रहे हों. ऐसे ही गायों का परिवार बढ़ता चला गया. शुरुआत में ज्यादातर गाएं ऐसी थीं जो बूढ़ी-बीमार या दूध न देने की हालत में होतीं. बीमार बछड़ों को भी लोग सड़क पर मरने के लिए छोड़कर चले जाते. अब्बू को उन्हें छोड़कर आते नहीं बनता था. वे उन्हें अपने साथ ले आते और चंगा करके ही छोड़ते थे.लोगों ने अब मजाक बनाना कम कर दिया था. हमारा बूचड़खाना गौशाला में बदलने लगा था.

औसत कद-काठी वाले शब्बीर को सफेद कुरता-पायजामा पहनने का शौक है. इन्हीं कपड़ों में वे दिनभर गायों की सानी-पानी करते हैं. 2 गायों से गौ-सेवा की शुरुआत करने वाले अब्बू की विरासत संभालते हुए आज शब्बीर के पास 170 से ज्यादा गायें और बैल हैं. वे बताते हैं- बीड में पशु पालना किसी बच्चे की देखभाल से ज्यादा मेहनत मांगता है. यहां आखिरी बार कब अच्छी बारिश हुई थी, किसी को याद नहीं. गांव के बुजुर्ग बारिश और लहलहाते खेतों की कहानियां सुनाते हैं. अब आलम बदले हुए हैं. फसलें हैं नहीं, चारा महंगा है और जानवरों की हौद सूखी पड़ी रहती है. न खाने को चारा है, न पीने को पानी. ऐसे में लोगों के पास अपने पशुओं को बेचने या उन्हें बूचड़खाने में देने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता.

गाय-बैलों की निकली हड्डियां कलेजे में चुभती हैं लेकिन कोई कर भी क्या सकता है!

शब्बीर को याद है जब गायें बेचने से रोकने पर किसी ने कहा था- यहां इंसानों के लिए कौर नहीं है, चौपायों के लिए पानी कहां से आए! शब्बीर ने तब उस शख्स से गायें खरीद लीं और उन्हें घर ले आए. गायों को बचाने की धुन में शब्बीर और उनका परिवार दिन से रात तक काम करता है. गाय-बछड़ों की देखभाल, सानी-पानी, दूध दुहने के साथ वे गोबर से खाद तैयार करते हैं और आसपास के गांवों में बेचने हैं. सूखाग्रस्त इलाके में खाद बेचना ही इस परिवार की कमाई का अकेला जरिया है.

महाराष्ट्र का बीड जिला सालों से सूखे से जूझ रहा है


कितनी कमाई होती है. शब्बीर गोबर-मिट्टी में सनी अपनी बूढ़ी अंगुलियों पर जोड़ते हुए कहते हैं- साल के लगभग 70 हजार रुपए.

इतने पैसों में 13 लोगों का परिवार भी पलता है और गायें भी. खुद शब्बीर मानते हैं कि ये आसान नहीं. कई बार लोग मदद के लिए मदद करते हैं. कई बार लोग इसलिए मदद करते हैं कि मैं एक खास समुदाय से हूं. कई बार लोग हैरत में मदद करते हैं. मुझे वजहों से कोई मतलब नहीं, गायों से मतलब है. सूखे में गायें पालना खेती करने जितना मुश्किल है. बीते कई सालों से लगातार सूखा पड़ रहा है. साल 2010 में तो भयंकर सूखा पड़ा. तब 12 गायें एक के बाद एक बिना पानी मर गईं.

मैं भरसक कोशिश करता था कि उन्हें पानी और चारा मिल सके लेकिन वो पूरा नहीं पड़ सका. तब दिनों तक सदमे में रहा. जैसे घर के बच्चे चले गए हों. उसके बाद से अपनी ही जमीन पर चारा उगाने लगा.

गाय पालन की मेरी ख्वाहिश पूरे परिवार का पेशा बन चुकी है. छोटे-बड़े तमाम सदस्य गाय-बैल की देखभाल में जुटे रहते हैं. तंगी या किसी जरूरत में अगर कोई बैल बेचना ही पड़ जाए तो हम खरीददार से लिखवा लेते हैं कि बैल बीमार हो जाए तो उन्हें वापस लौट दिया जाए. बूढ़े-बीमार बैल की भी अच्छी-खासी कीमत दी जाती है ताकि वो सुरक्षित रहे.

बीड जिले के शिरूर कासार तालुका के रहने वाले 57 साल के शब्बीर को इसी साल पद्मश्री पुरस्कार मिला है. उन्हें सामाजिक कार्य और पशु कल्याण के लिए इस पुरस्कार से नवाजा गया. वे कहते हैं- पुरस्कार के बारे में ज्यादा नहीं जानता, बस ये पता है कि ये देश की बड़ी उपाधि है. इससे सूखे से दम तोड़ती गायों को चारा-पानी-मिल सके तो और बढ़िया है.

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First published: November 19, 2019, 10:18 AM IST
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