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#HumanStory: 'बेटी की नुची हुई लाश देखने के बाद भी जिंदा हूं', आपबीती- गैंग रेप विक्टिम के पिता की

News18Hindi
Updated: January 16, 2020, 11:29 AM IST
#HumanStory: 'बेटी की नुची हुई लाश देखने के बाद भी जिंदा हूं', आपबीती- गैंग रेप विक्टिम के पिता की
आपबीती- गैंग रेप की शिकार लड़की के पिता की (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)

'आखिरी बार बेटी का फोन आया- 'पापा, रास्ते में हूं. 10 मिनट में घर पहुंच जाऊंगी'. फिर उसकी सहेली का फोन. मेरी बेटी अगवा हो चुकी थी. चार दिनों बाद लाश मिली. नुची-टूटी. खून के पोखर में डूबी. उसके उसके साथ बीती वहशियत को इस फरवरी में 8 साल हो जाएंगे. कभी कोर्ट जाता हूं, कभी एनजीओ. ऊपरवाले ने एक बाप को जीते-जी नरक दिखा दिया.'

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  • Last Updated: January 16, 2020, 11:29 AM IST
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(Interview coordination: PARI (People Against Rapes in India) campaign, Delhi)

मैं मुनिया के गीले पोतड़े सुखाया करता, तो पड़ोस के मर्द हंसते. मैं उन पर हंस दिया करता था. हथेली में समा जाने वाली बिटिया जब नींद में कुनमुनाती या फिक्क से पोपली हंसी दिखाती तो थकान मिट जाती. कोई भी उसे झिड़के तो मैं तनकर खड़ा हो जाता. फिर एक रोज कुछ अनाम लोग उसे उठाते हैं, नोंचते-काटते हैं और फेंक देते हैं. कभी सोचा नहीं था कि उसे खोकर जी सकूंगा. आपबीती- एक पिता की, जो अपनी मुनिया के गैंग रेप और हत्या (gang rape and murder) के दर्द को लिए जिंदा है ताकि 'किसी रोज तो' दोषियों को सजा मिले. पढ़ें, नरेंद्र को.

'जवान है, किसी के साथ भाग गई होगी.' थाने में रिपोर्ट लिखाने पहुंचा तो पुलिसवालों ने यही कहा. मैं रो रहा था और थाने में लड़कियों के चरित्र पर चर्चा हो रही थी.

मैं लौट आया. दोबारा गया. इस बार कुछ भाई-बांधवों के साथ. दोबारा वही छीछालेदर. इस बार लौटा तो आस-पड़ोस की भीड़ साथ थी. हमने थाने को घेर लिया. आखिरकार रिपोर्ट लिखी गई. बयान दर्ज हुए. पुलिसवाले झुंझलाते हुए उसकी तस्वीर मांग रहे थे. चार दिन बाद, 9 फरवरी 2012 को एक नाले किनारे उसकी लाश मिली.

आधी पानी, आधी मिट्टी में सनी. बासी लाश की तेज गंध

ऊपरवाले ने हमें जीते-जी नरक दिखा दिया (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)


पुलिसवालों ने नाक पर रूमाल रख रखा था. मैं खड़ा था. सपाट आंखों से देखता हुआ. एकबारगी लगा, कोई सपना है, आंखें खोलते ही बुझ जाएगा. इधर पुलिसवाले कंधे हिलाते हुए लाश के मेरी बेटी होने की तस्दीक करना चाह रहे थे. उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे. तब भी मैं आंखें नहीं फेर पा रहा था. जैसे बेटी न हो, लकड़ी का कोई ठूंठ पड़ा हो.अचानक गरम-गरम लावा-सा आंखों में भरने लगा था. नसें तन गईं. सिर घूम रहा था. आंखें धुंधला गई थीं.

बेटी! ये मेरी बेटी है! उसके फुर्तीले हाथ, जो पापा के लिए दुनिया की सबसे अच्छी चाय चट से बना लाते. उसकी आंखें, जो तपाक से दर्द टोह लेतीं. उसका माथा, जिस पर न जाने कितनी बार मैंने लाड़ किया था. अब वो एक लाश थी. पोस्टमार्टम हुआ. बेटी के साथ गैंग रेप हुआ था. विरोध पर उसे मारा-पीटा गया. शरीर पर ब्लेड और सिगरेट दागी गई. और आखिर में पत्थर से उसका सिर कुचल दिया गया. रिवाड़ी (हरियाणा) अस्पताल में पोस्टमार्टम के वक्त जो महिला असिस्टेंट थी, वो कोर्ट में दोषियों की दरिंदगी का जिक्र करते हुए बेहोश हो गई.

बाद के कई महीनों तक मुझे सपने आते कि बेटी मदद के लिए पुकार रही है और मैं सोया पड़ा हूं. चौंककर जागता और फिर सो नहीं पाता था.

सपने आते कि बेटी मदद के लिए पुकार रही है और मैं सोया पड़ा हूं (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)


इसके बाद शुरू हुई इंसाफ की लड़ाई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट और तमाम सबूतों के बाद भी मुजरिम बाहर थे. मैंने खूब परेड की. पुलिस थाने की. कोर्ट की. नेताओं के दरबारों की. फिर बेटी की तस्वीर और संदेश लेकर जंतर-मंतर गया. वहां रोज सुबह से शाम बैठा रहता. पहले अकेला था. धीरे-धीरे लोग आने लगे. पढ़ते और साथ बैठ जाते. फिर कुछ एनजीओ के लोग आए. उन्होंने तसल्ली दी. मदद का भरोसा दिया. तब तक 2 साल बीत चुके थे. घर का बित्ता-बित्ता कर्ज में डूबा हुआ था. जैसे-तैसे काम शुरू किया.

पेशे से चौकीदार नरेंद्र कहते हैं- गरीब बाप के लिए भी बेटी तो बेटी होती है. उनके यूं जाने के गम में उनका भी कलेजा फटता है. गरीब हैं इसलिए क्या इंसाफ रुक जाएगा!

उस हादसे ने इस परिवार का सब कुछ बदल दिया. एक बेटी 'बाकी' है. स्कूल पास करने को है लेकिन हम उसे अकेले बाहर नहीं भेजते. किताब या रजिस्टर भी लेने जाए तो साथ में भाई को लगा देते हैं. या मैं खुद चला जाता हूं. पहले ऐसा नहीं था. मेरी मुनिया चिड़िया की तरह फुदकती फिरती थी. अकेले जाती. सारे काम अकेले निबटा लेती थी. अब छोटी पर पाबंदी है. गुस्सा करती है कि उसकी सहेलियां भी तो अकेली जाती हैं.

गरीब बाप के लिए भी बेटी तो बेटी होती है (सभी तस्वीरें- प्रतीकात्मक)


नरेंद्र धीरे से जोड़ते हैं- लेकिन उसकी सहेलियों के परिवारों ने वो नहीं देखा, जो हमने देखा है. निचुड़ी, नुची हुई वो लाश.

8 सालों में बहुत दुख देखा. कोर्ट में दिन-दिन निकल जाता और शाम को नई तारीख निकल आती. पहले तारीखों के लिए कैलेंडर पर 'दागी' बनाया करता. फिर देखा कि पूरा कैलेंडर ही लाल-लाल गोलों से भर गया है. बच्चे देखते होंगे तो शायद डरते होंगे. फिर 'दागी' लगाना बंद कर दिया और कॉपी में लिखने लगा. पूरे दो साल सिर्फ थाना और कोर्ट किया. लोअर के बाद हाईकोर्ट से भी फैसला आ गया. तीनों मुजरिमों को फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट में जा अटका है.

लोगों के लिए दिन बदलते हैं, हमारे लिए तारीखें बदल रही हैं.

थकी हुई शिकायत के लहजे में नरेंद्र कह उठते हैं- दिल्ली शहर अजीब है. बड़ा ही जालिम. यहां के लोग तभी जिंदा होते हैं, जब किसी की लाश उठानी हो. बेटी के वक्त हुई भीड़-भाड़ भी वक्त के साथ छंट गई. कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे इंसाफ के इंतजार में जिंदगी बीत जाएगी.

(पहचान छिपाने के लिए पिता* का नाम और चेहरा बदला गया है.)

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First published: January 16, 2020, 10:52 AM IST
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