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#HumanStory: 'कश्मीरी केमिस्ट' की कहानी- 'और लोग' ताकत की दवाएं खाते हैं, 'हम' डिप्रेशन की...

News18Hindi
Updated: January 29, 2020, 10:58 AM IST
#HumanStory: 'कश्मीरी केमिस्ट' की कहानी- 'और लोग' ताकत की दवाएं खाते हैं, 'हम' डिप्रेशन की...
बम-बारूदों के बीच आसान नहीं है 'कश्मीरी केमिस्ट' होना (प्रतीकात्मक फोटो- flickr)

इंतेहाई खूबसूरत कश्मीर (Kashmir) में आंखें भले जवान हों लेकिन दिल जनमते ही बूढ़ा हो जाता है. हवाओं में केसर की जगह बारूद की महक है. पारदर्शी झीलों में शक की स्याही झिलमिलाती है. दहशतगर्मी (terrorism) के इस आलम में जब बाजार-बागीचे भांय-भांय करते हों, एक जगह हरदम गुलजार रहती है- दवा-दुकान (chemist shop).

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  • Last Updated: January 29, 2020, 10:58 AM IST
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पुलवामा के माजिद मोहम्मद 25 सालों से दवा के बिजनेस से जुड़े हैं. वे कहते हैं- यहां 5 साल के बच्चे से लेकर कब्र का इंतजार कर रहा हर शख्स जहनी मरीज है. लगभग सभी डिप्रेशन की दवाएं खा रहे हैं. ये दवाएं कश्मीरियों के लिए हवा-पानी जैसी बन चुकी हैं. मेरे लिए भी.

हमारे घर में तीन कमरे हैं. एक में मेरी बीवी और मैं रहते हैं. एक कमरा मेहमानवाजी को रक्खा है. वहां तखत को दीमक लग गई, गावतकियों पर धूल की परतें हैं और खिड़कियों पर नए-पुराने हादसों के जख्म हैं. एक और कमरा है. गुमशुदाओं का कमरा.

उस कमरे में मेरे दो छोटे भाई रहा करते थे, जो अब लापता हैं. बेजान कमरे में हमारे साथ की तस्वीरें खिलखिला रही हैं. एक-एक करके उनके गायब होने के बाद वो कमरा भुतहा लगता था. मैंने उसपर ताला लगाना चाहा तो घर के एक और सदस्य ने हाथ पकड़ लिया. मेरी अम्मी ने. वो दिनभर उसी कमरे में डोलती रहती हैं. दस्तरख्वान बिछे तो दोनों भाइयों का नाम लेकर पुकारती हैं, कभी उनके ब्याह का जोड़ा सजाने की बात करने लगती हैं.

केमिस्ट हूं. मर्ज पहचानते वक्त नहीं लगता लेकिन वो मेरी अम्मी हैं! वो अम्मी, जिसने अब्बू के इंतकाल के बाद खुद को घर का मर्द बना लिया था.



धमाकों की आवाज या गुमशुदगी जिसके लिए रुटीन का हिस्सा हो गई थी. अब मेरी वही अम्मी डिप्रेशन की दवाओं पर है. और वही क्या, कश्मीर की ज्यादातर औरतों के यही हाल हैं. फोन पर बोलते हुए माजिद की आवाज हजारों मील पार से भी आंसुओं के नमक में घुली लगती है.

कश्मीर की ज्यादातर औरतें डिप्रेशन से जूझ रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो- flickr)


साल 2018 में Doctors Without Borders ने कश्मीरियों की जहनी सेहत पर रिसर्च की. इसी स्टडी में बताया गया कि घाटी की आधी से ज्यादा आबादी डिप्रेशन से जूझ रही है. 1.8 मिलियन वयस्क इसमें शामिल हुए. नतीजे डराने वाले थे. लगभग 50 फीसदी औरतें और 37 फीसदी मर्द डिप्रेशन के अलग-अलग स्तर पर पाए गए.

रिपोर्ट में बताया गया कि बहुत से लोग पोस्ट ट्रॉमेटिक मेंटल इलनेस से भी जूझ रहे हैं. मेडिकल एथिक्स के मद्देनजर बच्चों पर ये स्टडी नहीं की गई लेकिन माजिद के तजुर्बे डरानेवाले हैं.

अपने ही घर का हवाला देते हुए वे बताते हैं- मेरी दो बेटियां हैं. घर के बाजू में ही बस स्टॉप है लेकिन मैं और मेरी बीवी रोज साथ जाते हैं. विदा कहते हुए भीतर से डरे रहते हैं कि कहीं ये आखिरी विदा न हो. बार-बार ताकीद करते हैं कि स्कूल में ठीक से रहना. दोपहर के तीन बजे उनके लौटने का वक्त होता है. बच्चों की मां पहले ही वहां पहुंच चुकी होती है. इस बीच खैरियत के लिए मैं कई दफे घर फोन कर चुका होता हूं. घर लौटते ही दरवाजा भीतर से बंद हो जाता है. अब वो तभी खुलेगा जब मैं पहुंच जाऊं.

पुलवामा जैसी जगह पर दवा की दुकान होना रोज खतरे मोल लेने से कम नहीं (प्रतीकात्मक फोटो- flickr)


उनके लौटते ही शुरू होती है 'जहर खत्म करने की कवायद'.कश्मीरी मां-बाप बच्चों के लौटने पर उनका टिफिन नहीं देखते, न होमवर्क पूछते हैं. पहला सवाल होता है- दिन कैसा रहा? अक्सर इस निहायत मासूम लगते सवाल के जवाब में खौफनाक कहानियां सामने आती हैं.

एक बार 6 साल की बेटी ने रोते हुए बताया कि उसके किसी दोस्त का चेहरा पैलेट (कश्मीरी बच्चों की इस शब्द से जान-पहचान है) से छिद गया है. किसी रोज सुनता हूं कि किसी की आंखें चली गईं तो किसी का भाई-बहन या पिता. ऐसे माहौल में बच्चों को न बाहरी जख्मों से बचाना मुमकिन है और न ही अंदरुनी जख्मों से बचाए रखना.

पुलवामा मेन टाउन में ही मेरी दवा की दुकान है. 25 सालों से इसी पेशे में हूं. मुल्कभर की दुकानें देखीं. जैसे दूसरी जगहों पर विटामिन, ताकत बढ़ाने वाली दवाएं, क्रीम- तेल जैसी चीजें डिस्प्ले में लगी होती हैं, वैसे ही कश्मीर में एंटीडिप्रेसेंट सामने रखे होते हैं. डिप्रेशन की दवाएं. इनकी खपत सबसे ज्यादा है.

झील जमा देने वाली ठंड में कश्मीरी खाल की खुश्की दूर करने के लिए क्रीम मलें न मलें, लेकिन डिप्रेशन की दवा जरूर लेते हैं. हर क्लास और उम्र के लोग इसमें मुब्तिला हैं. माजिद बताते हैं.

डिप्रेशन की दवाओं की खपत सबसे ज्यादा है (प्रतीकात्मक फोटो- flickr)


दुकान में बहुतेरे जाने-पहचाने चेहरे आते हैं जिन्हें किसी न किसी किस्म की जहनी बीमारी है. एक बच्ची आती है. मेरी ही बेटी के स्कूल की. उसके पिता क्रॉसफायर में मारे गए. अब बीते 4 सालों से वो दवाओं पर है. चार सालों में उसका चेहरा बदल गया. खाल पर झुर्रियां पड़ने लगी हैं. आंखों के नीचे गहरी स्याही पुती हुई. पहले घर के बड़े दवा लेने आया करते थे, अब वो खुद आती है. दिन में कई दवाएं. सारी घंटों के कुछ फासले पर.

एक रोज बड़े लाड़ से मैंने पूछा- इतनी दवाएं याद कैसे रखती हो? वो दन्न से बोली- 'मोबाइल पर अलार्म लगा रखा है'. कश्मीर दूसरी ही दुनिया है. यहां किसी की सालगिरह याद रखने के लिए शायद ही कोई अलार्म लगाता हो.

पुलवामा जैसी जगहों पर दवा की दुकान होना रोज खतरे मोल लेने से कम नहीं. हम आएदिन क्रॉसफायर, पैलेट अटैक देखते हैं. तब दुकान का शटर गिरा तो देते हैं लेकिन बंद करके नहीं भागते. पता नहीं, कब, कौन जख्मी हालत में हमारे पास पहुंच जाए. चाहे फायरिंग हो या बमबारी, सबको सबसे पहले दवा की जरूरत होती है. हड़ताल या बंद की 'कॉल' आए तो भी ज्यादातर मेडिकल शॉप्स खुली रहती हैं.

हम 'केमिस्ट' नहीं- 'कश्मीरी केमिस्ट' हैं. जानते हैं, नजला-बुखार में एहतियात से आराम मिल सकता है लेकिन गोलियों के घाव या जहनी जख्म में नहीं.

नोट: (सुरक्षा वजहों से नाम और चेहरा छिपाया गया है.)

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First published: January 29, 2020, 10:58 AM IST
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