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#HumanStory: कहानी, ट्रक ड्राइवर की- 'हमें बेतहाशा पीने और अपनी औरत से दगा करने वाला माना जाता है'

News18Hindi
Updated: February 3, 2020, 10:48 AM IST
#HumanStory: कहानी, ट्रक ड्राइवर की- 'हमें बेतहाशा पीने और अपनी औरत से दगा करने वाला माना जाता है'
ट्रक चलाने वालों को लेकर तरह-तरह की कहानियां बनती रहती हैं (प्रतीकात्मक फोटो)

रात 3 बजे... हाइवे (highway) की सांवली-खाली सड़कों पर तेज रफ्तार ट्रक दौड़ रही है. स्टीयरिंग के पीछे घंटों बिता चुकी आंखें अचानक झंप जाती हैं. भारी-भरकम गाड़ी सिर से पूंछ तक थरथराती है. अब कोई चारा नहीं! ट्रक ड्राइवर (truck driver) रुकेगा और ढाबे पर 'कड़क' चाय पी, दोबारा स्टीयरिंग संभाल लेगा. शायद कई महीनों के लिए.

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  • Last Updated: February 3, 2020, 10:48 AM IST
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ट्रक ड्राइवर पियक्कड़ होते हैं, हर निवाले के साथ घूंट भरते हैं... अपनी औरत के साथ वफादार नहीं होते... हरदम गाली-चालीसा पढ़ते हैं...! हमारे बारे में कमोबेश सभी यही सोचते हैं, लेकिन आप-ही की तरह हमारी कहानियां भी एक-दूसरे से अलग हैं.

कभी चाय के ताजा घूंट की तरह खुशजायका तो कभी इतनी कड़वी कि निगली न जा सके. पढ़ें, ट्रक ड्राइवर अजय कुमार की कहानी...

बच्चे कहते हैं, बड़े होकर डॉक्टर बनेंगे, साइंटिस्ट बनेंगे, टीचर या डांसर बनेंगे. कोई नहीं कहता कि मुझे बड़ा होकर ट्रक ड्राइवर बनना है. गरीब से गरीब घर का बच्चा कभी ट्रक चलाने का ख्वाब नहीं देखता. मैंने देखा. सालभर पहले तक मैं चंडीगढ़ के एक ट्रांसपोर्ट ऑफिस में काम करता था. ऑफिस असिस्टेंट का काम करते हुए आते-जाते ट्रक ड्राइवरों को देखता.

चेहरे पर कितनी ही बेचारगी हो, ट्रक पर सवार होकर स्टीयरिंग थामते हुए ड्राइवर के चेहरे पर गजब का रुतबा आ जाता. जैसे ट्रक न हो, अरबी घोड़े की लगाम संभाली हो.



बस, मैंने काम छोड़-छोड़ दिया और प्रैक्टिस शुरू कर दी. ट्रक के कल-पुर्जों से शुरुआत की और बढ़ते-बढ़ते अब मैं लाइसेंस-याफ्ता ट्रक ड्राइवर हो चुका हूं. चंडीगढ़ से ट्रक लेकर निकलता हूं तो हरियाणा, राजस्थान, गुजरात पार करते हुए मुंबई पहुंचता हूं. हजारों-हजार मील. चलते-चलते कभी एकदम से खेत ही खेत आ जाते हैं तो कभी मौसमी फूल-पत्तों से भरे जंगल. ऐसे में ट्रक रोककर दो-चार मिनट सुस्ता लेता हूं, फिर ट्रक में बैठ जाता हूं. कुछ मीलों के फासले पर सूखी-सूनी सड़कें इंतजार कर रही होती हैं.

ट्रक ड्राइवर अजय कुमार की कहानी


एक ही सफर में कितने ही नजारे और कितने ही मौसम देख लेता हूं. पंजाब-हरियाणा से मोटे कपड़े पहनकर निकलता हूं और महाराष्ट्र पहुंचते तक कपड़े आधे हो चुके होते हैं.

ट्रक ड्राइवरों के सफर का ऐसा रंगारंग बखान करते अजय की जिंदगी हालांकि उतनी आसान भी नहीं. पूरे रास्ते कभी पुलिस का डर रहता है तो कभी लुटेरों का. वे बताते हैं- हमें पुलिसवाले आदमी नहीं समझते. बुरी तरह से बात करते हैं. हम चाहे कितने ही कागज-पत्तर लेकर चलें, वे कोई न कोई ऐब निकाल ही लेते हैं. खासकर दूसरे स्टेट जाओ तो 'बाहर का आदमी' मानकर टूट पड़ते हैं. हम सफाइयां भी देते हैं, जुर्माना भी भरते हैं और गालियां भी खाते हैं.

पुलिस ही क्यों, लगभग सभी हमें लेकर कहानियां बनाते हैं. वे कहानियां, जिनमें एक ट्रक ड्राइवर ने राहगीरों को लूट लिया. वे कहानियां, जिनमें हम औरतों को पीटते हैं. इन कहानियों में एक मवाली-सा शख्स ट्रक चलाता है जो शायद ही कभी नहाता हो. 

उन कहानियों में हम आप लोगों की तरह मामूली इंसान नहीं, खूंखार अपराधी होते हैं. हम दिनभर पीते हैं. गाली-गुफ्तार करते हैं. और अपनी औरत को छोड़ सबके साथ रहते हैं. एक बार तो मैंने ये भी सुना कि ट्रक ड्राइवर ही हैं, जो HIV/AIDS फैला रहे हैं! हंसते हुए अजय कहते हैं- हम बच्चों की कहानियों के राक्षस नहीं. एकदम आम लोग हैं. लंबे सफर में जहां-जैसा बन पड़े, रोज नहाते हैं. वही बोली बोलते हैं जो बाकी लोग समझते हैं. और जिससे शादी करते हैं, उसी के साथ निबाहते हैं.

सफर की थकान में कई बार कुछ ट्रक ड्राइवर गलतियां भी कर जाते हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


हां, कई बार कुछ ट्रक ड्राइवर गलतियां भी कर जाते हैं. सफर लंबा होता है. ऐसे में कई ड्राइवर जिस्मानी जरूरतें पूरी करने को दूसरी औरतों से ताल्लुक बना लेते हैं.

हाइवे के पास ऐसे कई ठिकाने होते हैं, जहां वे जाते हैं. अजय लाल बत्ती इलाकों का हल्का-सा खाका खींचते हुए बताते हैं- ऐसे इलाके अक्सर बिना बारिशों के भी गंदे पानी से बजबजाते होते हैं. हर उम्र की औरतें, हर तरह के कपड़ों में आने-जाने वालों को लुभाने की कोशिश करती होती हैं. जैसे ही डील ठीक होती हैं, लड़की अपने क्लाइंट को अपने 'ठिकाने' पर ले जाती हैं. ये ठिकाना कच्चा-पक्का मकान भी हो सकता है या फिर कोई ट्रक भी हो सकती है. फटी-मैली चादरें ही बिस्तर होती हैं. ऐसे ताल्लुक अपने साथ बीमारियां लाते हैं, जो ड्राइवरों से होते हुए उनकी बीवियों तक चली जाती हैं.

कुछ वक्त पहले तो ऐसा भी हुआ कि हिमाचल के एक खास कस्बे (वे नाम नहीं बताते हैं) के लड़कों को लोग लड़कियां ब्याहने से डरने लगे थे, वहां एड्स का डर इतना ज्यादा था.

ट्रक ड्राइवरी एक अलग मुल्क है, और हाइवे के ढाबे उस मुल्क के खूबसूरत शहर. अजय बताते हैं- लोग मां की रसोई का बखान करते हैं और हम ढाबे के खाने का. ढाबों में खाते-खाते आदत इतनी पक्की हो जाती हैं कि पता होता है कि किस स्टेट में कौन से ढाबे में क्या सबसे बढ़िया मिलता है. घंटों गाड़ी चलाकर थक जाते हैं तो सुस्ताने के लिए ढाबे पर ही रुकते हैं. वहीं दूसरे ड्राइवरों से सुख-दुख बांटते हैं. ढाबों पर रोटियां तोड़ते हुए ही हमने कितने दुख-दर्द बांटे.

ट्रक ड्राइवरी एक अलग मुल्क है, और हाइवे के ढाबे उस मुल्क की राजधानी (प्रतीकात्मक फोटो)


लगभग 27 साल के अजय जब कहते हैं कि ढाबे हमारा दूसरा घर हैं तो उनकी आवाज में उम्र का खिलंदड़पन है. वे खुद मानते हैं कि सड़कों का ये सफर खतरों से भरा हुआ है.

वे याद करते हैं- आएदिन लिफ्ट लेने के बहाने लोग हमें लूट लेते हैं. जैसे बीते दिनों ही मेरा एक दोस्त राजस्थान से गुजर रहा था. रास्ते में एक लड़के ने लिफ्ट मांगी. नई उम्र का डरा हुआ-सा छोकरा. मेरे दोस्त ने उसे लिफ्ट दे दी. बैठने के बाद वो अपने मोबाइल में कुछ खिटिर-पिटिर करने लगा. थोड़ी ही देर बाद रास्ते में कुछ और लड़के मिले. ये उसी बेचारे-से दिखने वाले लड़के के साथी थे. लूट के बाद उसे सिर पर बोतल मारकर बुरी तरह से घायल कर दिया.

सड़कों पर लूटमारी के खतरे इतने ज्यादा हैं कि रात में अक्सर हम ड्राइविंग सीट पर ही सो जाते हैं.

हाइवे के होटलों में भी लूटपाट हो जाती है. ऐसे में चाहे कितनी ही नींद आए, चाहे हाथ-पैर पसारकर सोने का जितना भी दिल हो, हम सिकुड़कर अपनी सीट पर ही सोते हैं. सोने का ये खास तरीका अब मेरा पसंदीदा बन चुका है- हंसते हुए अजय कहते हैं.

 

अक्सर ट्रक के पीछे मजेदार स्लोगन्स लिखे होते हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


ट्रक ड्राइवरों की जिंदगी जितनी रहस्यमयी मानी जाती हैं, ट्रक में लिखे स्लोगन्स उतने ही दिलचस्प होते हैं. हंस मत पगली, प्यार हो जाएगा...से लेकर बड़े-से-बड़ा दर्शन ट्रक के पीछे डोलता चलता हैं.

मस्तमौला अजय अपनी ट्रक पर बदल-बदलकर स्लोगन लिखवाते रहते हैं. वे कहते हैं- हम हफ्तों-महीनों सड़कों पर फिरते हैं. घर से निकलते हैं तो लौटने की कोई तारीख नहीं होती. लौट भी सकेंगे या नहीं, ये भी नहीं पता होता. ऐसे में कोशिश होती है कि जिंदगी में कुछ रंग आ जाए. और कुछ नहीं तो स्लोगन्स के जरिए. बहुत से ट्रक ड्राइवर अपनी गाड़ी को घर की तरह सजाते हैं. घरवालों की तस्वीरें लगाते हैं ताकि सड़क पर भी घर भूलने न पाए.

महीनों सड़कों पर बिताने के बाद लौटना कैसा लगता है?

लगता है जैसे फिर कभी घर से न निकलें. अजय कहते हैं. पहली बार घर लौटा था तो दोस्तों से मिलने, शाम की सैर या सब्जी-तरकारी लाने जैसे कामों के लिए भी घर से नहीं निकला था. बस घर के लोग, घर का खाना और घर का बिछौना. एक वक्त के बाद हसीन से हसीन सड़क थका देती है.

(Interview Coordination: Ved Prakash Sharma)

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First published: February 3, 2020, 10:37 AM IST
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