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#HumanStory: आपबीती- एक 'डायन' की...'सालों तक इतनी बार ये सुना कि अपना नाम भूल गई'

News18Hindi
Updated: February 4, 2020, 10:59 AM IST
#HumanStory: आपबीती- एक 'डायन' की...'सालों तक इतनी बार ये सुना कि अपना नाम भूल गई'
उस औरत की कहानी, जो अंधविश्वास का शिकार बनी (प्रतीकात्मक फोटो)

डायन! वो औरत, जो जिंदा को मुर्दा और मुर्दे को जिंदा कर दे. जो रातें श्मशान में बिताए. जो देख ले तो बच्चे बिस्तर पकड़े लें, गृहस्थी ख्वाब की तरह टूट जाए और खेत रातोंरात सूख जाएं. फिल्मों में डायन की ऐसी तस्वीर देख सिहरते हुए चिप्स चटखारने वालों को अंदाजा भी नहीं कि 'डायन होकर' जीना असल में क्या है.

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  • Last Updated: February 4, 2020, 10:59 AM IST
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(Interview Coordination: Tara Ahluwalia, Social Activist- Bhilwara)

'पूरे चांद की रात थी. सोने जा रही थी कि तभी किसी ने कुंडी खड़खड़ाई. जानी-पहचानी आवाज. दरवाजा खोला तो दनदनाते हुए कई लोग भीतर घुस आए. जो लड़के मुझे मौसी, काकी बुलाते बड़े हुए, वही अभी डायन पुकार रहे थे. बालों से खींचते हुए पेड़ से बांधा गया.

पड़ोस गांव का ओझा कुछ गुनगुनाते हुए मुझपर फूल-पत्तियां फेंक रहा था. साथ-साथ मेरा सिर मूंडा जा रहा था. अब मैं 'शुद्ध' होने जा रही थी. 12 सालों में इतनी बार डायन सुना कि अपना नाम तक भूल चुकी हूं- रामरतनी (नाम बदला हुआ) कहती हैं.

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का एक गांव. देश की राजनीति में उस गांव की पहचान महज इतनी है कि वहां 'इतने' वोटर हैं. इसी गांव की रहनेवाली हैं रामरतनी. शादीशुदा. रामरतनी एक रोज सोकर उठीं तो पति 'छोड़कर' जा चुका था. रोते हुए मदद मांगने निकली तो गांववालों ने कहा- 'अच्छा हुआ जो घर से चला गया. डायन के साथ रहता तो जान से जाता.'

पति की तलाश छोड़ रामरतनी घर लौट आई.

कमउम्र में रामरतनी का ब्याह हो गया (प्रतीकात्मक फोटो)


कमउम्र में ब्याह हुआ. बेमेल ब्याह. मंडप में बैठी तो देखा कि बींद के आधे बाल सफेद हैं. बहुत दिनों तक मैं उसे काका बुलाती रही. धीरे-धीरे आदत छूटी- हंसती हुई रामरतनी याद करती हैं. महीना आने लगा, तब गौना हुआ. पुरानी पड़ी, तब पड़ोस की बहुओं ने राज खोला. मैं उसकी तीसरी लुगाई थी. पहली जाने कैसे मर-खप गई. दूसरी बीवी मलेरिया से मरी. एक बहू ने खुसपुस कहा- 'तुझे इस घर को टाबर देने लाए हैं.' मैं सिटपिटा गई.

घर में सिर्फ सास और पति थे. खूब बड़ा घर. कई कमरे खाली थे. सुबह झाड़ू-फटके के लिए खोलती और फिर ताला डाल देती. इतना बड़ा आंगन कि हाथी बांध लें. घर के पीछे एक बाड़ी भी थी. वहां मौसम की सब्जियां उगाई जातीं. ऊपर काम के लिए लोग आते. मुझे घर की सफाई, रसोई ही करनी पड़ती. एक बड़ा काम था बींद की देखभाल.

उसकी बड़ी-बड़ी मूंछों से इतना रुआब झड़ता कि हर कोई सहमता था. मुझे याद नहीं कि शादी के सालों में भी कभी उन्हें हंसते देखा हो. या हंसते भी होंगे तो मूंछों में ही हंसी खो जाती होगी- कुछ सोचते हुए रामरतनी बताती हैं.

धीरे-धीरे मुझे लेकर बातें होने लगीं. तीन साल हुए और मैं बेऔलाद ही रही. लोग पहले हंसी-हंसी में बोलते, फिर ताने लगे और फिर मुझे कहीं भी बुलाना बंद हो गया. बांझ की छाया लगे तो काम बिगड़ जाते हैं- किसी ने बताया. मैं रोती. रोज रात बींद से बात करने की सोचती लेकिन उसका बाहर रहना बढ़ने लगा था. सास ने समझाया- पहन-ओढ़कर रहा कर. थोड़े दिनों बाद कहा- झाड़फूंक करवा देते है तेरी.

वे कभी सवाल नहीं कर सकीं कि औलाद न होना अकेले उनकी गलती कैसे (प्रतीकात्मक फोटो)


दुनिया जहां रिप्रोडक्टिव राइट पर बहस कर रही है, वहां अपने ही मुल्क के कई हिस्सों में बच्चा न होने से लेकर लड़की के जन्म तक- सारा जिम्मा औरत का है. रामरतनी इसी मुल्क का हिस्सा हैं. वे कभी सवाल नहीं कर सकीं कि औलाद न होना अकेले उनकी गलती कैसे! या फिर पिछली दो बीवियों के साथ क्या हुआ था. क्यों वे भी बेऔलाद मरीं.

पहली बार पूछा तो पति पूरी रात घर से बाहर रहा. दूसरी बार पूछा तो हमेशा के लिए छोड़कर चला गया- रामरतनी धीरे-धीरे याद करती हैं जैसे पिछले जनम की कोई बात हो.

वे बताती हैं- उसके घर से जाने के बाद थाने में रिपोर्ट कराने भी मैं और मेरी सास ही गए. गांव का कोई मर्द हमारे साथ नहीं गया. धीरे-धीरे गांव की औरतें बोलने-बताने से बचने लगीं. मैं जाती तो एकदम से बतियाती औरतें चुप हो जातीं. एक रोज की बात है, मैंने कथा रखी. घर पर औरतें आईं तो लेकिन मेरे हाथ से प्रसाद लेने से मना कर दिया. सास ने सबको प्रसाद बांटा. उसी रात मुझे पता चला कि मैं गांववालों के बीच मैं डायन बन चुकी हूं.

फिर एक रोज हमें बिरादरी बाहर कर दिया गया. मुनादी हुई कि कोई मेरे हाथ का छुआ खाएगा-पिएगा नहीं. लोगों ने मुझे घर बुलाना बंद कर दिया. यहां तक कि पीहरवाले भी मुझसे कटने लगे.

पीहरवालों ने भी बुलाना बंद कर दिया (प्रतीकात्मक फोटो)


रामरतनी बताती हैं- छोटी बहन की शादी पक्की हुई. मैं न्योते का इंतजार करती रही. बुलावा आया लेकिन इतनी देर से कि मैं शादी में मेहमान जैसे ही पहुंच सकूं. पहुंची तो एक लुगाई मुझपर निगरानी के लिए तैनात हुई. उसे ध्यान रखना था कि मैं चौके में न घुसूं वरना रसोई भ्रष्ट हो जाएगी.

मैं जिस बर्तन में खाती, उसे धोकर अलग रखा जाता था. अपने ही मायके में मैं बेगानों की तरह पड़ी रही और जैसे ही बिदाई हुई, तुरंत लौट आई, उस गांव में जहां मैं डायन थी.

रामरतनी को यूं ही डायन करार नहीं दिया गया. बाकायदा जांच-परख हुई.

वे हंसते हुए बताती हैं- मेरे नाम पर चावल की एक पुड़िया बनाई गई और उसे चींटियों के घर के पास रख दिया. अगले दिन पुड़िया के चावल बिखरे हुए थे और चींटियां उनमें मुंह मार रही थीं. बस, पक्का हो गया कि मैं डायन हूं. जो औरत डायन नहीं होती है, उसके चावल चींटियां नहीं खाती हैं.

मेरा डायन होना पक्का हुआ कि गांवभर की तमाम मुसीबतों को जैसे ठिकाना मिल गया.

पड़ोसी के मवेशी बीमार हुए तो मेरी गलती. किसी की बहू घर से भागी तो मेरी गलती, फसल कम आई तो भी मेरी गलती. कभी किसी के शरीर में मैं पिशाच घुसा देती, कभी किसी का पेट खराब कर देती.

डायन का कलंक उतारने को पूरे गांव को दाल-बाटी-चूरमा का भोज कराया (प्रतीकात्मक फोटो)


सास ने पंचों के हाथ-पांव जोड़े तो उन्होंने इलाज सुझाया. हमें पूरे गांव को दाल-बाटी-चूरमा का भोज कराना था. मैंने कर्ज लेकर देसी घी में पकवान बनवाए और गांवभर का भोज किया.

मेरे हाथ का छुआ खाने पर बीमार पड़ने वाले न्योते में औंधा होकर खाते रहे.

खा-पीकर पंचों ने कहा- ये तो औरतों का मामला है, औरतें ही आपस में सुलझाएं. अगर गांव की बूढ़ी-बाढ़ियां रामरतनी के हाथ से प्रसाद ले लें तो हमें कोई एतराज नहीं. ऊंगलियां चाट-चाटकर खाना खा चुकी औरतों ने साफ मना कर दिया. ऐसा एक नहीं, तीन बार हुआ. मैं कर्जों में डूब गई लेकिन कलंक नहीं मिटा.

फिर उस रात सिर मूंडकर शुद्धिकरण किया गया. उतरे हुए बालों के साथ एक बार फिर से दाल-बाटी-चूरमा कराया. इंतजाम के लिए घर के पीछे का बाड़ा बेचना पड़ा. अब मैं रामरतनी हूं लेकिन बिरादरी में कोई शुभ काम हो तो अब भी मुझे सबसे आखिर में बुलौआ आता है.

(इंटरव्यू देते हुए रामरतनी ने कहा- मेरा नाम मत दीजिएगा. 2014 में एक अखबार ने फोटो समेत मेरा इंटरव्यू दे दिया था. उस खबर के बाद जो लोग नहीं जानते थे, वे भी  मुझे डायन पुकारने लगे. तब से कहीं आना-जाना लगभग बंद ही कर रखा है. उनके अनुरोध पर नाम और पहचान छिपाई गई है. *)

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First published: February 4, 2020, 10:43 AM IST
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