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#HumanStory: 'लैट्रिन' साफ करने पर 2 बासी रोटियां और महीने के 5 रुपए मिलते

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Updated: November 7, 2019, 2:57 PM IST
#HumanStory: 'लैट्रिन' साफ करने पर 2 बासी रोटियां और महीने के 5 रुपए मिलते
लाली बाई बामनिया की उम्र मैला ढोते बीती (प्रतीकात्मक फोटो)

ब्याह के बाद की वो बारिश! पानी थम ही नहीं रहा था. मैंने सिर पर प्लास्टिक का टोपा-सा बनाया और टोकरी उठाए निकल पड़ी. 'लैट्रिन' साफ कर टोकरा सिर पर रखा. संभलकर चल रही थी लेकिन लैट्रिन सिर से होते हुए पूरे शरीर में बहती रही. एक के बाद एक 10 घरों का मैला (manual scavenging) उठाया. दोपहर तक मेरा खून भी बदबू से सन गया था. बजबजाती हुई बारिश उसके बाद हर साल आई.

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  • Last Updated: November 7, 2019, 2:57 PM IST
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मैला उठाने वाली की कहानी...

गुलाबी साड़ी में चौड़े पाड़ की मांग निकाले और चटकीली बिंदी सजाए लाली बाई बामनिया की तमाम उम्र 'जागीरी' संभालते बीती. वे कहती हैं- 12 बरस की थी जब शादी करके आई. दूसरे दिन मुझे काम पर जाना था. काम यानी घरों से मैला साफ करने. मैंने मना किया तो मरद बोला- ये हमारी जागीरी है. हमारी जायदाद. ये तो करना ही होगा.

पीहर में कभी ये काम नहीं देखा था, सब मजदूरी करते और खाते. यहां के कायदे दूसरे थे.

घर की दूसरी औरतें के साथ पहले दिन 'टरेनिंग' पर गई. सबके हाथों में एक-एक टोकरी, पुरानी चादर का एक मैला कपड़ा और घर की फूस. पहले घर में पहुंचे. हमारे घुसने के लिए अलग रास्ता था, संकरा-सांवला.जैसे उससे कोई आता-जाता नहीं हो. अब टरेनिंग शुरू हुई. लैट्रिन पर राख डालनी थी. पहला दिन था इसलिए मुझे हल्का काम मिला. मैंने आंखें मूंदी, सांस रोकी और राख छिड़कने लगी. तभी सास की आवाज आई- आंखें खोलकर डाल. अब तक आंखें भी खुल चुकी थीं, सांस भी और मुंह भी.

लाली याद करती हैं- मैं आड़ी-टेढ़ी होते हुए लैट्रिन पर ही उल्टियां कर रही थी. पीठ पर सास के मुक्के सहते हुए.

उस दिन मेरी जल्दी छुट्टी हो गई. उल्टियों से बेहाल घर लौटी. सिर में तेज दर्द. मुंह खोलूं तो लैट्रिन की बदबू आए. आंखें बंद करूं तो टरेनिंग याद आए. उल्टी-बुखार की गोली खाकर पड़ रही. देर दोपहर सास-जिठानी लौटीं तो बलभर कुटाई हुई.

मैंने कहा- मैं ये काम नहीं करूंगी. वे बोले- शादी करके लाए हैं. तू नहीं करेगी तो कौन करेगा! मरद ने कहा- राजा के घर से आई है, जो इतने नखरे हैं! जो बोलें, वो कर.
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लाली बाई बामनिया, इन्होंने साल 2002 में मैला ढोना छोड़ा और दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित किया


शाम तक गुस्सा कुछ ठंडा हुआ तो सास ने एक नुस्खा बताया. बदबू कम लगने का. छोटी सी गुलाबी और भूरी गोलियां.

उस दिन से अगले 20 बरस से भी ज्यादा मैं उल्टी रोकने की दवा खाती रही. दूसरे दिन काम पर गई. उल्टी की. सफाई की. उससे अगली रोज दो गोलियां खाईं. फिर साल-दर-साल गोली की खुराक बढ़ती चली गई.

दरम्यानी उम्र की लाली मंदसौर जिले के धारियाखेड़ी गांव से हैं. गांव के 35 घर ऊंची जात के हैं. बस्ती से एकाध किलोमीटर दूर लाली की बस्ती है. वो बस्ती जहां की औरतें मैला उठातीं और मरद शादी-ब्याह में जूठे पत्तल. मालवी में पगी हिंदी बोलते हुए लाली बार-बार रुक जाती हैं. समझाने के लिए आसान शब्द खोजती हैं. फिर एकाएक रौ में बोल पड़ती हैं- 35 घरों में हर औरत के हिस्से रोज के 10 घर थे. पूरे महीने. एक घर से एक टोकरा लेने के बाद उसे फेंकने के लिए एक किलोमीटर जाते. वहां से लौटते, तब दूसरे घर में टोकरी भरते. सुबह 5 बजे से काम शुरू होता तो दोपहर 2 बजे तक चलता.

सिर पर लैट्रिनभरी टोकरी उठाए रोज बीसेक किलोमीटर चलते. टखनियां दुखतीं. सिर में चौबीसों घंटे शूल उठता. आंख-मुंह-गले में बदबू भरी रहती. गर्दन-पीठ अकड़ने लगी.

इस सबके बदले में क्या मिलता था?
हर घर से दो बासी रोटियां और महीने के 5 रुपए. रोटियों के साथ? कुछ नहीं. रोटियां देते थे, वही काफी था. लाली याद करती हैं. कई बार कुछ भली घरवालियां ताजी रोटी भी 'डालती' थीं. हाथों में ऊपर से फेंकी जातीं ताकि हाथ से हाथ न छू जाएं. वार-त्योहार पर 'परोसा' भी मिलता.

परोसा यानी खाने-पीने की बढ़िया-बढ़िया चीजें और पुराने कपड़े. उसी खाने और कपड़ों से हमारा त्योहार मनता.

सबके हाथों में एक-एक टोकरी, पुरानी चादर का एक मैला कपड़ा और घर की फूस (प्रतीकात्मक फोटो)


फिर जागीरी संभालने की आदत पड़ गई. बारिश हो, ठंड हो या लू चले- जाना तो होगा. महीना (period) आए या पेट में अठमाहा बच्चा- जाना तो होगा.

जो औरत पहली बार पेट से हो, उसको कई महीने तक समझ न आए क्योंकि उल्टी-चक्कर रोज की बात थी. कभी ऐसा हुआ कि दर्द के मारे नहीं गई तो उस बस्ती के नौकर आ जाते. हमारे घर के सामने खड़े होकर चिल्लाते कि तुम्हारी औरत काम पर नहीं आई. उसको भेजो या खुद आओ. कभी किसी ने ये नहीं पूछा कि पूरा पेट लेकर इतना झुकना-उठाना कैसे कर पाती हो. आज आराम कर लो. मरद भी शराब पीकर पड़े रहते. ससुर के छोड़कर घर का कोई आदमी जागीरी नहीं संभालता था. लैट्रिन साफ करते-करते सालभर में सिर के बाल झड़ गए. कितना ही बचाओ, गंदगी सिर पर आती ही थी. ऊपर से वज़न .

सांवली-चमकती लाली को इन सबसे ऊपर एक और तकलीफ थी. वे बताती हैं- मुझे 'चर्मरोग' (skin disease) हो गया.

रंग जरा गहरा था लेकिन खूब सुंदर थी. दर्पण-सिंगार भी अच्छा लगता. यहां आकर सारे शौक छूट गए. पहले हाथों-चेहरे और फिर पूरे शरीर में दाने हो गए. खुजाल मचती. जलन रहती. रातभर नींद नहीं आती. फिर रोटी देते हुए लोग डांटते. उनके घर साफ करने में मेरी ये हालत हुई और उन्हें लगता था कि हम खुजली की बीमारी फैला देंगे.

दम तोड़ चुके गुस्से के साथ लाली बताती हैं- पहले दर्द-उल्टी की दवा-गोली लेती, फिर खुजाल की भी लेनी पड़ी.

मैला उठाने के अलावा गांव के आसपास भी फटकने की इजाजत नहीं थी


लोग रोटी दूर से डालते. मैला उठाने के अलावा गांव के आसपास भी फटकने की इजाजत नहीं थी. बुलाना हो तो हमारे एक ही नाम थे- 'भंगन' और 'भंगी'.

यही नाम हमारे बच्चों के साथ भी चले. बड़ा बेटे को खूब चाव से स्कूल भेजा. स्कूल में उसे सबसे पीछे बिठाया गया. उसकी कोई टाटपट्टी नहीं थी. न कोई उसके साथ खेलता, न खाता. बस एक काम के लिए वो स्कूल बुलाया जाता- झाड़ू लगाने को. मना करे तो डांटते कि 'भंगन' की औलाद है, ये नहीं करेगा तो क्या करेगा! उसके बाद फिर मेरी कोई औलाद स्कूल नहीं गई.

साल 2003 में एक संस्था से लोग आए. वे समझाते- दूसरों का मैला उठाना ठीक काम नहीं. इसे छोड़ दो. मैं ऊंची आवाज में कहती- ये हमारी जागीरी है. हमारे पुरखों ने यही किया है. हम काम नहीं छोड़ेंगे. बाकी औरतें भी सुर में सुर मिलातीं. धीरे-धीरे इरादा बना. मैंने घरवाले को कहा. वो मार-पीट करने लगा.

धमकाया. काम छोड़ेगी तो तुझे छोड़ दूंगा. मैंने कहा- छोड़ दे लेकिन ये काम तो अब नहीं करूंगी.

मजदूरी खोजी. सोयाबीन काटना, खेत साफ करना, कुआं खोदना, सड़क बनाना, बारिश में गायों की छप्पर बनाना. काम करने वाले को हजार काम मिलते हैं. मुझे भी मिलने लगे. पैसे लेकर घर लौटती तो घरवालों की जागीरी भी छूटी. धीरे-धीरे पूरे गांव की औरतों ने काम छोड़ दिया.

मुझे अकेला पाकर घर में आग लगा दी


10 साल लगे. मैं औरतों को समझाती. उधर ठाकुर बस्ती के लोग मुझे धमकाते. भंगी नहीं तो बस्ती से मैला कौन हटाएगा?

खूब ढेर 'तरक' करते. भगवान ने सबको बराबर नहीं बनाया है. बनाता तो तुम 'भंगी' घर में नहीं जनमते. पहले समझाइश दी गई. नहीं मानी तो धमकियां. फिर भी नहीं रुकी तो मारपीट. एक बार घर के सारे लोग शादी में गए थे. मुझे अकेला पाकर घर में आग लगा दी. बच गई तो झूठे केस में फंसा दिया. मुझे पागल बुलाते. तब तक बस्ती के लोग मेरे हक में आ चुके थे. 2013 में सबने काम छोड़ दिया और मजदूरी करने लगे. मजदूरी में इज्जत मिले न मिले, बेइज्जती नहीं मिलती है. काम करो, पगार लो और लौट जाओ.

मैला साफ करने का काम छोड़ा, तब पहली बार चप्पल पहनी. नीले पट्टों वाली गुलाबी चप्पल. पैरों में महावर लगाया.

लाली याद करती हैं. बस्ती में मैला उठाने जाओ तो चप्पल पहनने की मनाही थी. कहते थे कि ठाकुरों के गांव में भंगी के पैर जमीन पर ही होने चाहिए. अब चप्पल पहनकर मजदूरी करने जाती हूं. शाम को घर लौटती हूं तो दर्द की दवा लेती हूं. ये वही दर्द है जो इतने सालों की जागीरी ने दिया था.

(Coordination: आसिफ शेख, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, देवास, मध्यप्रदेश)

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First published: November 7, 2019, 10:28 AM IST
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