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#HumanStory: शहीद की बहन का फूटा ग़ुस्सा, कहा- 'भारत ने मिसाइलें क्या सजाने के लिए बना रखी हैं'

'शहीद के घर आने वाले लोग शहादत पर ऐसे पूछते हैं जैसे बारात की बात पूछ रहे हों. कल यही लोग सब भूल जाएंगे.'

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(राजस्थान के राजसमंद जिले का बिनोल गांव. बमुश्किल 400 घरों के इस गांव के बीचोंबीच खड़े एक घर में सन्नाटा है. बाहर तना शामियाना इस सूनेपन को बढ़ाता ही है. घर की पीली दीवारें और भी ज़र्द पड़ गई हैं. दीवार पर एक तस्वीर पर ताज़ा फूल हैं. ये तस्वीर है नारायण लाल गुर्जर की. पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद 40 जवानों में ये भी एक चेहरा है. शहीद की मौसेरी बहन रेखा गुर्जर कहती हैं, शहादत पर बातें करने वाले असल में जानते ही नहीं कि शहीद होना क्या है.)

आए-दिन सुनती थी, ये शहीद हुआ, वो शहीद हुआ... तब लगता था, कितनी अच्छी बात है शहीद होना. कितनी बड़ी बात है शहादत. सच में बड़ी बात है. जाने वाला खुद पर गर्व करने की वजह तो देता है लेकिन इससे उसकी नामौजूदगी खत्म नहीं होती. बहुत तकलीफ होती है जब सोचती हूं कि भैया अब कभी छुट्टी पर नहीं लौटेंगे.



6 महीने के थे, जब पिता नहीं रहे. तीन साल के हुए, तब अकेलेपन और बीमारी से मां चल बसी. भैया ननिहाल में बड़े हुए. अक्सर ऐसे बच्चे अनाथ कहलाते हैं लेकिन भैया के चेहरे या व्यवहार से कभी बेचारगी नहीं झलकी. उन्होंने पूरे गांव को अपना मान लिया. और पूरे गांव ने उन्हें. गांवभर के लाड़ले थे वो. पढ़ाई-लिखाई में खूब होशियार. गणित में हमेशा पूरे मार्क्स पाते. तब गांव के स्कूल में गणित पढ़ानेवाला कोई नहीं था. भैया ने पढ़ाना शुरू कर दिया. पहले खुद पढ़ते, फिर साथियों को पढ़ाते. पढ़ने-पढ़ाने की ये आदत आखिर तक रही. जब भी घर आते, गांव के बच्चों को इकट्ठाकर उनसे गणित और विज्ञान की बातें किया करते.

जनवरी के आखिरी हफ्ते में 15 दिन की छुट्टी पर आए थे. सुबह ही सुबह पूरे गांव के बच्चों की टोली लेकर निकला करते. उन्हें कई किलोमीटर तक दौड़ाते. दौड़ खत्म करने के बाद इसपर बाकायदा एक छोटी-मोटी क्लास ले लेते कि हमें क्यों सेना में जाना चाहिए. भैया का बस चलता तो वो पूरे देश को सेना में भर्ती करवा देते. भर्रायी आवाज के साथ रेखा याद करती हैं. सेना में भर्ती के फॉर्म निकलते तो फोन करके गांव के हर उस लड़के से बात करते जो जवान हो चुका है. कहते थे- देशसेवा से शानदार काम कोई नहीं.



छुट्टी खत्म होने पर निकले तो जम्मू पहुंचकर सलामती की खबर देने को फोन किया. गुरुवार सुबह की बात है. तब CRPF की गाड़ी नहीं आई थी. भैया ने कहा कि गाड़ी आएगी तो चला जाऊंगा, वरना रुकना होगा. गाड़ी आ गई. भैया चले गए. इसके बाद हमने टीवी पर खबर सुनी. शहीदों में एक नाम एनएल गुर्जर भी था. याद आया कि भैया की वर्दी पर भी यही लिखा होता था. फिर लगा, अभी ही तो पहुंचे हैं, क्या पता भैया गाड़ी में न बैठे हों.

बार-बार देखा. वही नाम था- एनएल गुर्जर. गांववाले घर आने लगे थे. हममें से एक भाई बाहर खड़ा हो गया और आने वालों को घर के भीतर आने से मना करने लगा. जब तक खबर पक्की न हो जाए, भाभी को कुछ भी नहीं बताना था.

शहीदों का घर देखा है कभी आपने! बात करते हुए बहन ने एकाएक पूछ लिया. शहीद के यहां रोने की भी मोहलत नहीं होती. भैया के जाने की खबर सुनकर भाभी बेहोश हो गईं. बच्चों का हाल बेहाल था. हम एक तरफ उन्हें संभाल रहे थे तो दूसरी तरफ आने-जाने वालों की खिदमत में लगे थे. घर के सामने एक शामियाना तनवाया ताकि लोग आराम से बैठें.



सेना के साथी आए. मीडिया आ रही थी. दूसरे गांवों से मुलाकाती आ रहे थे. पूरा घर खचाखच भरा था. कैमरा लगातार चमक रहा था ताकि हमारे आंसुओं को कैद कर सकें. मौत पर तो फिर भी माहौल अलग रहता है लेकिन शहीद के घर आकर बात करने वाले लोग शहादत पर ऐसे पूछते हैं जैसे बारात की बात पूछ रहे हों. आज सब बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं लेकिन कल कोई शहीद के घरवालों का हाल जानने भी नहीं फटकता.

रेखा के गुस्से में एक हद तक सच्चाई भी है, जिसकी झलक घर के सूनेपन में दिखती है. हफ्ताभर भी नहीं हुआ, शामियाना एकदम खाली है. वे कहती हैं, अभी जख्म ताजा है. लोग भड़के हुए हैं. भरोसा दिया जा रहा है लेकिन ये तो हमेशा से दिया जा रहा है. किसी मां का बेटा गया. किसी पत्नी का साथी. कोई बच्चा अब कभी पापा नहीं कह सकेगा. आज जोश है. हमले से जुड़े लोग पकड़े जाएंगे, थोड़े दिन जेल में रहेंगे और फिर भाग निकलेंगे. फिर देश के जवान मारे जाएंगे. कोई कुछ करता क्यों नहीं. देश ने इतनी मिसाइलें बना रखी हैं तो क्या सजाने के लिए बना रखी हैं!



तमाम गुस्से के बावजूद बिनोल गांव के इस घर में देश के लिए जज्बा अब भी वही है. "भाभी बार-बार होश खो रही हैं. होश आते ही कहती हैं- मेरा बेटा अपने पिता की जगह जाएगा." रेखा बताती हैं. भैया हमेशा कहते कि मेरा बेटा भी सेना से जुड़ेगा. आज इन हालातों में जब भाभी की पूरी जिंदगी तहस-नहस हो गई है, तब भी वे यही कह रही हैं. सातवीं में पढ़ रहा उनका बेटा ऐसे वक्त में भी दौड़ की अपनी रुटीन नहीं तोड़ रहा ताकि पापा खुश रहें."

भैया, जब जाते, यही बोलते थे कि जिंदा रहा तो लौटकर आऊंगा. आखिरी बार भी यही कहकर निकले थे.

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