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#HumanStory: जिस मकान में रहता हूं, वहां अबतक करीब 15 हज़ार मौतें हो चुकी हैं

उस मकान का ख़ौफ़ कुछ ऐसा रहा कि घर आना तो दूर, कॉलेज के मेरे साथी मुझसे बात करते हिचकिचाते थे.

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(वाराणसी पहुंचते ही रेलमपेल और बनारसी चाट-पकौड़ों के बीच एक और गंध आपका पीछा करती है. ये है काशी में मुक्ति की तलाश में आए लोगों की गंध. ये लालसा, ये गंध अकुलाती नहीं, बल्कि मौत के इंतजार में जिंदगी के साथ कदमताल सिखाती है. यूं ही नहीं कहा गया- 'काश्यां मरणां मुक्ति' यानी काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है. इसी तलाश में लोग यहां आते हैं, जिनका ठौर है 'काशी लाभ मुक्ति भवन'. अनुराग हरि शुक्ल वाराणसी के उस भवन को संभालते हैं, जहां लोग मोक्ष के लिए आते हैं.) 

मैंने हजारों मौतें देखी हैं. बहुतों को रात-रातभर दर्द से बिलखता देखा है, कइयों को शांति से देह त्यागते भी देखा है. बहुत सी मौतें जैसे इस परिसर में पहुंचते का इंतजार करतीं. जहां मैं रहता हूं, उस भवन के 10 कमरों में अब तक 14792 लोग मौत के इंतजार में आ चुके हैं.

मोक्ष का लेखाजोखा
अनुराग बताते हैं. बचपन में देखता कि लोग ऑटो से, एंबुलेंस से, गाड़ी से आते. अक्सर वे पूरे दल-बल के साथ होते. मेला-सा लग जाता. कुछ ऐसे भी होते, जो मौत की मुर्दनी साथ लिए आते. मुख्य दरवाजा खुलते ही पिताजी हरकत में आ जाते. रजिस्टर खुलता, लेखाजोखा दर्ज होता और वो अनजान लोग हमारे परिसर के किसी एक कमरे में दाखिल हो जाते. कुछ दिनों बाद वो लोग एकाएक कमरे से गायब हो जाते. छोटा था. कौतुक से देखता. हर बार चेहरे बदलते रहते लेकिन बाकी सबकुछ वही रहता.

प्रतीकात्मक तस्वीर


वक्त के साथ समझ सका कि लोग मुक्ति के लिए काशी आते हैं. हमारा भवन उनके आखिरी दिनों का ठौर है. पिताजी मुक्ति के मार्ग में उनके सहायक. और हम बच्चे इसके साक्षी.

काशी के बारे मान्यता है कि यहां आखिरी समय गुजारने पर मोक्ष मिलता है. यानी जीवन-मरण से मुक्ति. गंगा के शहर इस काशी में आने वाले तब होटल में क्यों रहना चाहेंगे! रहना भी चाहें तो कोई होटल किसी को मरने के लिए अपना कमरा क्यों देगा. वे मुक्ति भवन आया करते. 29 साल का हूं. अपनी याददाश्त में रोज कुछ नया देखा.

मुक्ति का इंतजार
एक बार एक मोक्षार्थी आया. देखकर लगा कि सांस अब छूटी- तब छूटी. नियम के अनुसार पहले 15 दिन के लिए कमरा दिया. परिजन पूजा-पाठ करते. पिताजी रामनाम जप करवाते. 15 दिन बीते. दिन की मियाद बढ़ाई गई. सांस उखड़ती, फिर ठीक-ठिकाने लौट जाती. दिन बढ़ते गए और लगभग डेढ़ महीने बाद वे एकदम स्वस्थ होकर अपने घर लौट गए. वहीं कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि गाड़ी मोक्षार्थी को लेकर भवन के कंपाउंड में घुसती ही होती है कि मौत हो जाती है. मानो मौत ठिठकी ही रही हो इस दहलीज तक पहुंचने के लिए.

काशी लाभ मुक्ति भवन


साल 1915 में बने भवन का पुरानापन एकदम नया लगता है. मानो ये मकान बना ही पुरानेपन से हो. मौत के अटल होने को याद दिलाता हुआ. पुराने जमाने का लोहे का दरवाजा. मकान में वक्त-वक्त पर होती सफेदी भी धूसरपन लिए रहती है. मोक्षार्थी की तरह कमरे में दाखिल हों तो सफेद दीवारें जैसे आपका लेखा-जोखा मांगती हों.

इन सबके साथ इस जगह का असर ऐसा है कि यहां आते ही मोह धुंधलाने लगता है.

मैंने खुद हजारों मौतें देखीं. हालांकि पढ़ता था तो साथी मुझसे घबराते. बात साल 2006 की है. इंटर पास करके कॉलेज पहुंचा था. मेल-मुलाकात के लिए एक-दूसरे के ठौर-ठिकानों की बात होती तो मैं भी बताता. काशी लाभ मुक्ति भवन. वाराणसी में बड़े से तख्ते वाले इस भवन को लगभग सभी जानते हैं लेकिन कॉलेज पढ़ने वाले लड़के को कोई उससे जोड़ नहीं पाता था. साथी डरते. बात करने से हिचकिचाते. फिर समझने लगे. आना-जाना होने लगा.

मोक्ष का कमरा
भवन के कई कायदे हैं. जैसे यहां उन्हीं को कमरा मिलता है जिसे डॉक्टर ने जवाब दे दिया हो. या जिसने उम्र के साथ खाना-पीना एकदम बंद कर दिया हो. पहले 15 दिनों के लिए कमरा ले सकते हैं. 15 दिन बाद भी अगर मोक्षार्थी की हालत खराब ही रहे तो रहने की मियाद बढ़ा दी जाती है. कई लोग एक रोज, कई कुछ रोज और कई महीनों रहते हैं. कई मामले ऐसे भी हैं, जहां मौत के इंतजार में आने वाला व्यक्ति एकदम स्वस्थ होकर घर लौट जाता है. कमरे का कोई शुल्क नहीं है, बस 20 रुपए रोज के हिसाब से देना होता है वो भी उन्हें जो दे सकें. बहुत से ऐसे लोग भी आते हैं जो अपनी अंत्येष्टि करवाने में भी सक्षम नहीं होते. ऐसे में भवन उनके सारे इंतजाम करता है.

काशी लाभ मुक्ति भवन


रामधुन की मरहम
विदेशी इस घर को डेथ हाउस की तरह जानते हैं. कौतुक से देखते, ये कैसा घर है जहां लोग मरने आते हैं. घर के भीतर एक मंदिर है जहां पुजारी तीन वक्त पूजा-पाठ करते हैं. हर दो-दो घंटे में दसों कमरों में जाते हैं और गंगाजल-तुलसी देते हैं. घर में चौबीसों घंटे रामधुन बजती रहती है. ये सारे इंतजाम इसलिए कि मोक्ष की तलाश में आए लोगों को सारी भटकन से मुक्ति मिले. मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है कि शरीर अथाह कष्ट में होता है लेकिन प्राण नहीं निकल पाते. आस्था ऐसे लोगों की मदद करती है. रामधुन से दर्द में राहत पाते मैंने खुद बहुतों को देखा है.

मुक्ति की खटखटाहट
आज की पीढ़ी का हूं. बीएड किया. लॉ किया. क्रिमिनल लॉयर के बतौर प्रैक्टिस शुरू की. बड़े भाई की तरह जज बनने की सोचता. नींव रखी जा चुकी थी. मुक्ति भवन पिताजी के साथ 50 से ज्यादा साल देख चुका था. हम रोज साझे में मौत देखते लेकिन कभी उनके जाने का खयाल नहीं आया था. पिछले साल सितंबर की एकादशी थी. पिताजी व्रत पर थे. खुद का तुलादान कराया. गौदान किया. अपनी पत्नी यानी मां से हाथ जोड़कर अपनी भूलचूक के लिए माफी मांगी.

प्रतीकात्मक तस्वीर


अनजानी गलतियों के लिए पिता के चेहरे पर प्राश्यचित्त था. इन बातों के अलावा उनकी सेहत एकदम ठीक थी. रात में अचानक उन्होंने देह छोड़ दी. अब सोचता हूं तो समझ पाता हूं.

14 हजार से ज्यादा मौतें देख चुके पिता भला अपनी मौत की तिथि कैसे नहीं चीन्हते! उनके देहांत के बाद क्रिमिनल लॉयर ने काला कोट खूंटी पर टांग दिया.

पहले कुछ-कुछ विराम के साथ देखता लेकिन अब रोज मौतों का साक्षी बनता हूं. यहां मौत शोक नहीं, उत्सव की चीज है. शहर की जद में आते ही आप मौत की आंखों में आंखें डालने लायक हो जाते हैं. और जैसे-जैसे वक्त गुजरता है, आप खुद को मौत के बगल में ऐसे पाते हैं, मानो किसी आत्मीय के साथ हों.

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(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.)

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