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#HumanStory: 'उस समुदाय से हूं जहां शादी की रात खून के धब्बों से चरित्र तय होता है'

लड़की को शरीर की 'पूरी जांच' के बाद लॉज में ठहराया जाता है, जहां बिस्तर की सफेद चादर एक ही रात में उसकी किस्मत तय कर देती है.

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(मैं उस समुदाय से हूं, जहां सफेद चादर पर खून के धब्बों से दुल्हन की आगे की ज़िंदगी तय होती है. बचपन यही 'कार्यक्रम' देखते बीता. विरोध शुरू किया तो जान से मारने की धमिकयां मिलने लगीं. समाज-निकाला हुआ. मेरा हासिल इतनाभर है कि मेरी बीवी को वर्जिनिटी टेस्ट से नहीं गुज़रना पड़ा. मिलिए, विवेक तमाइचिकर से जो कौमार्य परीक्षण के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं.)

कंजर की औलाद
मैं महाराष्ट्र के कंजरभाट समुदाय से हूं. ये वही तबका है, जिसे बॉलीवुड में गाली की तरह देखा जाता है. कंजर की औलाद यानी एकदम गयाबीता आदमी. मैं उन्हीं में से हूं. बचपन तंग गलियों में बीता. घर शराब की दुकानों से घिरा हुआ था, बल्कि हर घर में ही शराब बना करती. एक और खासियत थी, जो हमें दूसरों से अलग दिखाती. कौमार्य परीक्षण. शादी की रात दूल्हा-दुल्हन के बीच जो घटता, वो उस कमरे से बाहर निकलता. सफेद चादर के साथ.

ऐसे होती शुरुआत 
शादी की रात दुल्हन को घर न ले जाकर लॉज में रुकाया जाता. पहले लॉज के कमरे को चेक किया जाता कि वहां कोई नुकीली चीज तो नहीं. इसके बाद नववधू के कपड़े उतारकर उसे पूरा जांचते कि कहीं कुछ खोट तो नहीं. नई शादीशुदा की चूड़ियां कपड़े से कसकर बांधी जातीं ताकि कहीं चूड़ी तोड़कर वो खून न निकाल सके. इसके बाद लड़के को कमरे में भेजा जाता है. उन्हें तयशुदा वक्त में 'सारा कार्यक्रम' करना होता है. लड़की और लड़के का परिवार बाहर खड़ा रहता है. बीच-बीच में दरवाजा खटखटाकर पूछते हैं कि सब ठीक तो चल रहा है! किसी मदद की जरूरत तो नहीं!



पॉर्नोग्राफी बताते हैं
अगर दरवाजे के बाहर कोई जवान जोड़ा जैसे भैया-भाभी हैं तो वे अंदर जाते हैं. जाकर डेमो देते हैं कि ऐसे काम करना है. हम जैसा कर रहे हैं, वैसा करो. अगर लड़का नर्वस लगे तो उसे शराब पिलाकर उकसाते हैं. ये सारी कवायद इसलिए कि चादर पर खून के धब्बे आएं. धब्बा आए तो लड़की पवित्र है. नहीं आए तो लड़की की आगे की किस्मत तय हो जाती है.

कैसा था तेरा माल
दोनों परिवार वही चादर लेकर पंचायत जाते हैं. यहां लड़के से पूछा जाता है- क्या तेरा 'माल' सच्चा था. लड़के को 3 बार ये एलान करना होता है कि हां मेरा माल सच्चा निकला. अगर चादर पर खून के धब्बे न हों तो लड़के से पूछते हैं- क्या तेरा माल झूठा था. लड़का 3 बार बताएगा- हां, मेरा माल झूठा निकला. इसके बाद लड़की को मारा-पीटा जाता है और तकलीफों का दौर सालों बाद जाकर ही कुछ कम होता है.

देखते हुए बड़ा हुआ
मुझे अब भी याद है मेरे बचपन पर इस सच्चे-झूठे माल का कितना असर रहा. तब प्राइमरी स्कूल में था. अपनी एक कजिन की शादी में गया. शादी की अगली सुबह कजिन को मारा-पीटा जा रहा था. पूछा जा रहा था कि किसने उसे 'गंदा' किया. मैं देखता रहा. वापस लौटा तो टीचर ने यूं ही पूछ लिया- शादी कैसी रही. छूटते ही मेरा जवाब था- लड़की खराब निकली! टीचर सकते में थी. बाद में मां को पता चलने पर उसने मुझे मारा-पीटा. बच्चा था.



रिजल्ट का सबको इंतज़ार
समझ नहीं सका कि खराब बोलकर कजिन को पीटा जा रहा था और मेरे भी वही कहने पर मुझे मार क्यों पड़ी. बात याद रह गई. इसके बाद तो हर शादी में ये तयशुदा कार्यक्रम देखा करता. क्या रिजल्ट आएगा, इसपर घराती-बराती, यहां तक कि खुद लड़के को उत्सुकता रहती. एक बार एक शादी में लड़का परफॉर्म नहीं कर पा रहा था तो पूरी की पूरी बारात, जिसमें मैं भी शामिल था, ठहरी रही. जब तक लड़की सच्ची-झूठी साबित नहीं हो जाती, कोई नहीं हिलेगा.

की शुरुआत
वक्त के साथ समझ बढ़ी. वजाइना लड़की की पहचान नहीं. धब्बों के होने- न होने के पीछे वैज्ञानिक वजहें भी समझीं. तब लोगों की समझ पर पड़े धब्बों को साफ करने की सोची. मैं बोलने लगा. हालांकि नई मूंछों वाले लड़के की बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता था. साल 2015. मेरी सगाई हुई. अपनी मंगेतर से बात की. उसकी हां ने मेरा आधा डर दूर कर दिया. बिना लड़े आधी लड़ाई जीत गया.

धमकियों का दौर चल पड़ा
तब वर्जिनिटी टेस्ट के विरोध ने किसी मुहिम का आकार नहीं लिया था. फेसबुक पर right to privacy (निजता का अधिकार) को लेकर लिखने लगा. कौमार्य परीक्षण पर लिखा. वहां से लोगों का एक ग्रुप बनने लगा. इसमें देशभर के कंजर, सांसी, पारधी, छारा युवा जुड़ने लगे. एक ओर हमारी मुहिम चेहरा ले रही थी, दूसरी तरफ मुझे धमकियां मिलने लगीं. जान से मारने की, उठा लेने की. शादी तोड़ देने की. मेरे अपने घरवालों ने दबाव में आकर मुझे घर से निकालने की धमकी दे दी. बस नहीं चला तो रजिस्टर्ड मैरिज को कहने लगे ताकि उनका झंझट टले. मैं अड़ा रहा.



ये तो अच्छी प्रथा है
शादी के बाद हमारा बाकायदा बहिष्कार हो गया. मेरी पत्नी को सामाजिक उत्सवों से बाहर रखा जाने लगा. यहां तक कि पुणे में कलेक्टर ऑफिस के सामने लोगों ने मोर्चा निकाला. उनका कहना था कि हम पति-पत्नी समाज कंटक हैं. बिरादरी की औरतों की इज्जत उछाल रहे हैं. कौमार्य परीक्षण प्रथा के पक्ष में एक बेहद उम्दा तर्क उनके पास है. ये तो समाज की लड़कियों को कंट्रोल में रखने वाली प्रथा है.

बचपन में टीचर को 'लड़की खराब निकली' बताने वाला बच्चा अब काफी आगे निकल आया है. हां, मैं सफेद चादर पर खून के धब्बे ढूंढने वाले कंजर समुदाय से हूं. लेकिन मेरी कोशिश है कि हमपर से ये धब्बा मिट जाए. परिवार, दोस्त बोलचाल छोड़ चुके. ससुराल वाले डरते हैं कि उनकी बेटी की पूरी जिंदगी बहिष्कार में बीतने वाली है. पत्नी साथ है.

(इसी साल बुधवार, 6 फरवरी को महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि राज्य के कई समुदायों में चली आ रही कौमार्य जांच की प्रथा को जल्द ही यौन उत्पीड़न की श्रेणी में रखा जाएगा और इसे दंडनीय अपराध बनाया जाएगा.)

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.)

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