#BreakingSilence: फटे हुए कपड़ों और बहते खून के साथ मैं आधी रात सड़क किनारे बैठी थी

#BreakingSilence: फटे हुए कपड़ों और बहते खून के साथ मैं आधी रात सड़क किनारे बैठी थी
तब पुलिस ने मुझे गाड़ी में बैठाया और घर छोड़ आई

हाथों से होते हुए वो दबाव जांघों तक (sexual abuse) पहुंच चुका था. मेरा गुस्सा अब डर में बदल गया था. तेज रफ्तार गाड़ी. सूनी सड़कें. इससे बच भी जाऊं तो क्या घर पहुंच पाऊंगी! हाथ यहां-वहां थिरक रहे थे. मैंने उसका हाथ पकड़ा, आंखों में देखा और नाम लेते हुए पूरे जोर से कहा- ... मुझे यहीं उतार दो.

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  • Last Updated: December 23, 2019, 11:33 AM IST
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यौन हिंसा पर देशभर की औरतों की कहानियां

तब मैं नौकरी के लिए नई-नई इंदौर पहुंची थी. साथ में अपनी उम्मीदों जितना ही नामालूम-सा बैग उठाए. एक दोस्त का दोस्त स्टेशन लेने आया. उसके पास मोबाइल था. जैसा तय हुआ था, मैंने स्टेशन से ही उसे फोन किया, तब जाकर हम मिल सके. दिसंबर बीत रहा था. मैंने हल्का सा कुरता और जींस पहनी हुई थी. बाइक पर बैठी तो तीखी ठंड ने माथे को चूम लिया.

ये नए शहर में मेरा इस्तकबाल था. मुझे अंदाजा भी नहीं था कि इसके बाद का तमाम वक्त ऐसे ही थपेड़ों के बीच गुजरेगा.



काम के शुरुआती दिन रंगीनियत से भरे थे. पत्रकारिता की नौकरी. शुरू-शुरू में कोई बीट (खास फील्ड जैसे राजनीति, खेल, विज्ञान या स्वास्थ्य) नहीं थी. छुट्टा बैल की तरह शहरभर में डोलती. गली-गली घूम डाली. कहां आर्ट गैलरी है, कौन से बड़े अस्पताल हैं, से लेकर कहां पोहे अच्छे मिलते हैं, तक तमाम बातें मैं किसी इंदौरी की तरह बता सकती थी. काम शुरू किया. एडिटर ने तारीफों के साथ-साथ एक हिदायत दे डाली- छोटी हो. बेटी मानकर सलाह लो. न किसी से उलझना, न किसी में उलझना. मैंने जोरों से मुंडी हिलाई. वो टुकुर-टुकुर देखते शायद ये समझने की कोशिश करता रहा कि मैं बात समझ चुकी हूं, तब तक मैं केबिन से बाहर निकल आई.



सफेद बालों और झुर्रीदार हाथों वालों मेरे एडिटर को उस रोज शायद इल्हाम (अंदाजा) हो गया था कि जल्द ही मेरे 'किसी से' उलझने का आगाज (शुरुआत) होने वाला है.

वो वाजपेयी सरकार (स्व अटल बिहारी वाजपेयी) का वक्त था. वाजपेयी जी 3 दिनों के लिए इंदौर पहुंचने वाले थे. मुझे प्रेस कार्ड मिल चुका था. तैनाती की भी प्लानिंग हो चुकी थी. उन दिनों शाम को पूरे प्रेस कॉम्प्लेक्स का माहौल ऐसा होता, मानो कोई जलजला आने वाला हो. तब आज की तरह दफ्तरों में चाय-कॉफी की मशीन नहीं थी. चायवाला चाय लेकर आता. चाय-पोहे के बीच प्लानिंग, री-प्लानिंग और री-री-प्लानिंग बदलती रहती. अखबार का जमाना था. छप चुकने पर एडिटिंग की गुंजाइश नहीं रहती इसलिए पक्का होने पर ही काम होता था.

कुल जमा 22 बरस की लड़की सारी कवायद को ध्यान से देखती. उजाला टूटने से लेकर देर शाम तक दफ्तर ही दुनिया थी.

दो रोज बाद काम पर लौटी तो 'बेवजह' छुट्टी पर एडिटर झल्लाया हुआ था (प्रतीकात्मक फोटो)


इस सारी भागदौड़ के बीच पता नहीं कब मैं उसकी नजरों में आ गई. प्रेस कॉम्पलेक्स में काम करता था वो. चाय की टपरी पर दिन में दसियों बार टकराते. शुरुआत में शहर के कायदे सीख रही थी, तब भी वो उतनी ही गर्मजोशी से मिलता. शाम को पसीने में नहाई दफ्तर पहुंचती तो बड़े ही तपाक से उसका हाथ बढ़ता. सर्द (तब लगने वाले) मिजाज शहर में मैंने उसकी दोस्ती का हाथ थामने में देर नहीं की.

आमतौर पर रिपोर्टिंग के दौरान ही बोलने वाली लड़की कभी-कभार चाय के उसके बुलावे पर जाने लगी. ये मुलाकातें चाय की टपरी से आगे नहीं बढ़ी थीं. अब उसका वक्त आ चुका था.

उस रात काम ज्यादा था. नया शहर, पहली नौकरी, खुद को साबित करने का दबाव. एक इवेंट कवर कर लौटते हुए रात हो गई. दफ्तर के ही लैंडलाइन पर उसका फोन आया. 'अभी तक यहीं हो? काम खत्म करो, मैं घर ड्रॉप कर दूंगा.' मैंने मना कर दिया. दफ्तर से निकली तो उसकी कार इंतजार कर रही थी. पहली बार मुझे खीझ हुई. मैंने नजरअंदाज कर आगे बढ़ना चाहा तो उसने कंधे पर हाथ रख दिया.

आसपास दसियों जानी-पहचानी आंखें देख रही थीं. डर गई. लगा, थोड़ा भी तमाशा हो तो काम में मेरी इमेज का क्या होगा. मैं चुपचाप बैठ गई.

गाड़ी शहर के सूने रास्तों पर उड़ रही थी. मैं जबड़े भींचे बैठी थी. मन में गुन-बुन रही थी कि कल से इससे बात बिल्कुल बंद. तभी अपने हाथों पर हल्का दबाव महसूस हुआ. मैं गुस्से में खिड़की से बाहर देखती रही. हाथों से होते हुए वो दबाव जांघों तक पहुंच चुका था. मेरा गुस्सा अब डर में बदल गया था. तेज रफ्तार गाड़ी. सूनी सड़कें. इससे बच भी जाऊं तो क्या घर पहुंच पाऊंगी! हाथ यहां-वहां थिरक रहे थे.

मैंने पूरे जोर से हाथों को पकड़ा, आंखों में देखा और नाम लेते हुए कहा- ... मुझे यहीं उतार दो. धड़ाक से जैसे पानी की झपास पड़ी हो, उसने देखा और कार धीमी कर मुझे धक्का दे दिया.

उसने देखा और कार धीमी कर मुझे धक्का दे दिया


बारह-एक बजे होंगे. सड़क पर गिरी पड़ी थी. न हाथ में मोबाइल, न दिमाग में ताकत. पैर मनों भारी हो गए थे. जैसे-तैसे सड़क किनारे पहुंची और बैठ गई. तभी पेट्रोलिंग करती हुई पुलिस वहां पहुंची. फटी जींस, पैरों से बहता खून और सख्त आंखों की तोड़ पर मेरा प्रेस कार्ड काम आया. कोई खास सवाल नहीं हुआ. मुझे गाड़ी में बैठाया और वापस घर छोड़ आई.

दो रोज बाद काम पर लौटी तो 'बेवजह' छुट्टी पर एडिटर झल्लाया हुआ था. केबिन में बुलाया और कहा- आते ही बड़े शहर का रंग चढ़ गया. मैंने न विरोध किया, न रोई, न वजह ही पूछी.

खूब अच्छे से याद है, उस दिन हनुमान जयंती थी. दफ्तर में मिठाई बंटी. मिठाई बांटने वाला मेरे बाजू में आकर ठिठक गया. तभी एडिटर की आवाज आई- 'उसे मत दो. ये हनुमान जयंती का प्रसाद है.' मेरे छिले हुए घुटने टीस रहे थे. गहराते अंधेरे के साथ 2 रोज पहले की रात डरा रही थी लेकिन मैं काम करती रही.

वो फिर दिखा. बेशर्म मुस्कुराहट चेहरे पर लिए, लेकिन कभी पास नहीं फटका.

घुटनों पर आज भी उस जख्म के निशान हैं. नौकरियां बदलीं, शहर बदले. कितने ही चांद बीते. हाल ही में एक डॉक्टर से मुलाकातों के बीच ऐसे दो-चार निशान दिखाते हुए मैंने पूछा- ये कैसे मिटेंगे? डॉक्टर ने थोड़ी ठोक-पीट के बाद कहा- आपका शरीर ट्रॉमा-सेंसिटिव है. ये अब नहीं जाएंगे.

(मुझे घूरा गया. जबरन छुआ गया. मनचाहे की कोशिश में उठाया-पटका गया. दुनिया देखी, तब जाना कि मैं अकेली नहीं. ज्यादातर औरतें हमेशा चुपचाप सहती रहीं. News18 Hindi इसी चुप्पी की आवाज बनना चाहता है. #BreakingSilence सीरीज के तहत हम यौन हिंसा पर अलग-अलग तबकों और इलाकों की औरतों की कहानियां ला रहे हैं.आप भी अपनी कहानी शेयर कर सकते हैं.आपकी पहचान गुप्त रखी जाएगी. हमें इस पते पर email करें-   Breakingsilence@nw18.com )

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