#जीवन संवाद: दुखी करने की आदत!

जीवन संवाद.
जीवन संवाद.

क्षमा तो ऐसे मांगी जाती है, जैसे खूब प्यासे होने पर किसी पानी पिलाने वाले के प्रति गहरी श्रद्धा/स्नेह हो मन में! क्षमा जब तक मन में उतरकर नहीं मांगी जाएगी, अतीत का मैल सरलता से साफ नहीं होगा!

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 18, 2020, 11:55 PM IST
  • Share this:
हम अक्सर एक-दूसरे की कमजोर कड़ी खोजते रहते हैं. कमियों/ गलतियों को मन की तिजोरी में संभाले रखते हैं. कितने निर्मम होते जा रहे हैं हम! अतीत की गली में हम एक-दूसरे को लेकर जितना जाएंगे, जीवन को उतनी ही बेचैनी मिलेगी. जीवन संवाद को देश के अलग-अलग हिस्सों से पाठकों की ईमेल और संदेश मिलते रहते हैं. इनमें हम पति-पत्नी/ दांपत्य जीवन के प्रश्नों पर विचार करने पर पाते हैं कि आज के सुख से अधिक हमारा ध्यान उन कमियों/गलतियों पर अधिक रहता है जो जाने अनजाने घटित होती रहीं.


आज से दस बरस पहले दो लोगों के बीच जो कुछ भी हुआ हो उसे हमेशा आज की नजर से देखने पर दुख ही मिलेगा. हम सभी जिस रिश्ते में भी हों समय के साथ एक-दूसरे के प्रति समझ बेहतर होती है. ऐसे में बीते समय में क्या हुआ, उस पर हमारा दृष्टिकोण कैसा रहा, केवल इन बातों को ही दोहराना जीवन के पांव को जंजीरों से बांधने जैसा है.

रांची से धर्मेंद्र झा ने लिखते हैं, 'कुछ वर्षों पहले तक उनके घर में सबसे अधिक बहस इस बात पर होती थी कि कैसे अनेक अवसरों पर कभी उनकी पत्नी का ससुराल में अपमान हुआ, तो कब-कब पत्नी के मायके में धर्मेंद्र जी को ठीक से सम्मान नहीं मिला.'
धर्मेंद्र कहते हैं कि 'जीवन संवाद' ने करुणा, प्रेम और स्नेह के प्रति जागरूक करने में मदद की. जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदला! हम उनकी ईमानदार प्रतिक्रिया का सम्मान करते हैं. सामने आकर ऐसा कहने के लिए भीतर जीवन के प्रति गहरी आस्था और समझ का होना बहुत जरूरी है!



भारत में अक्सर रिश्ते अतीत की गलियों में टहलते हुए कमजोर होते रहते हैं. हर छोटी-छोटी बात में अपने अहंकार को ले आना, हमारे स्वभाव का हिस्सा बनता जा रहा है.


कभी-कभी तो यह लगता है कि हम इस प्रतीक्षा में ही रहते हैं कि कैसे कुछ ऐसा घटे, जिससे सामने वाले के अहंकार पर चोट की जा सके. हमें उसके अहंकार की इतनी चिंता नहीं, जितनी असल में अपने अहंकार की है. हमारा अहंकार इस बात से ही खाद-पानी पाता है कि कैसे हम अपने तर्कों से सामने वाले (जो हमारा ही है. पति/पत्नी/भाई/ बहन/पड़ोसी/रिश्तेदार) को उसकी गलती का अहसास करा दें. ‌ इसे ही जीवन संवाद में हम 'दुखी करने की आदत कहते हैं'.

बीस/दस/पांच साल पहले जो भी घटा था, उसे पकड़े रहने से कुछ नहीं मिलेगा. अगर कुछ मिलेगा तो वह केवल मन/आत्मा के लिए अहितकारी ही होगा. उससे कुछ अमृत नहीं निकलने वाला.


जब शाम होने को आती है, तो हम इस बात में नहीं उलझते कि घर में कल किसने रोशनी की थी. हमारा ध्यान तो केवल इस पर रहता है कि कोई उठकर आज दीया जला दे. जिस रूप में भी उजाला उपलब्ध है, उस उजाले तक हमें पहुंचा दे. फिर छोटी मोटी बातों पर अतीत की यात्राओं के लिए मन में इतनी व्याकुलता किसलिए!

एक छोटा-सा उपाय आपसे कहता हूं . जब कभी, किसी से भी संवाद में हों, मन अतीत को जाने लगे तो केवल इतना कहिए, आज नहीं कल! इससे भी बात न बने, तो बिना उलझे केवल क्षमा मांगिए. क्षमा से मैल धुलता है, मन का! लेकिन क्षमा ऐसे मत मांगिए, जैसे कोई एहसान किया जा रहा हो. क्षमा तो ऐसे मांगी जाती है, जैसे खूब प्यासे होने पर किसी पानी पिलाने वाले के प्रति गहरी श्रद्धा /स्नेह हो मन में! क्षमा जब तक मन में उतरकर नहीं मांगी जाएगी, अतीत का मैल सरलता से साफ नहीं होगा!

आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
ईमेल: dayashankarmishra2015@gmail.com
https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54
https://twitter.com/dayashankarmi
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज