#जीवनसंवाद: दूसरे की गलती!

‘किसी ने हमारे साथ बुरा, खराब व्‍यवहार किया. हमें धोखा दिया. छल किया. उसके बाद वह तो आजाद हो गया. आगे बढ़ गया, लेकिन हम उसके दिए दुख से चिपके रहें, यह अन्याय है, अपने प्रति!’

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:31 AM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 11:31 AM IST
हमारे लिए सबसे आसान है, अपनी गलती को छोटा मानना. उतना ही सरल है, दूसरे की गलती को बड़ा कहना. हम अक्‍सर ही सुनते रहते हैं, मैं उसे इस बात के लिए माफ नहीं करूंगा. हो सकता है, उसका अपराध ही कुछ ऐसा हो कि माफ करना संभव न हो. लेकिन अगर ऐसा ही कुछ आपसे हुआ है, तो! ऐसे में संभव है, आपको लगे कि यह तो जरा सी बात है. हम अपने प्रति कुछ ज्‍यादा ही उदार होते हैं. स्‍वयं को क्षमा करते रहना अच्‍छा है, इससे हम भीतर से रिक्‍त होते रहते हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि दूसरे की गलती को भी वैसे ही स्‍वीकार करें, जैसे हम अपनी गलती को.

अपने ही कहे को सुनते रहने की आदत धीरे-धीरे हमें आत्‍ममुग्‍ध बना देती है. एकतरफा. हम अपनी ही बात, सोच की फिरनी में उलझे रहते हैं. हम दूसरे पक्ष को समझना तो दूर, उसे सुनने को भी तैयार नहीं होते. मुझे लगता है कि दूसरे की गलती भले ही कितनी भी बड़ी क्‍यों न हो, लेकिन उसके प्रति हमारी भावना में कटुता कम से कम होनी चाहिए. उसे भूल जाइए. उसकी यादों को गंगा के तट पर, मनाली की ऊंची पहाड़ी, चेन्‍नई के मरीना बीच, जहां कहीं ले जाना चाहते हैं, वहां ले जाकर छोड़ आइए.

#जीवनसंवाद

इसे सरलता से ऐसे समझिए कि दूसरे के किए का बोझ हम कब तक लादे फिरें. क्‍यों फि‍रें. किसी ने हमारे साथ बुरा, खराब व्‍यवहार किया. हमें धोखा दिया. छल किया. उसके बाद वह तो आजाद हो गया. आगे बढ़ गया, लेकिन हम उसके दिए दुख से चिपके रहें, यह कहां का न्‍याय है, अपने प्रति. यह तो स्‍वयं के प्रति अन्‍याय है.

#जीवनसंवाद: सब कुछ तुरंत! यह हमारी जीवनशैली बन गई है

बुधवार को हमने ‘दुख का कारखाना’ में स्‍वयं के दुख से लिपटे रहने की आदतों के बारे में विस्‍तार से संवाद किया था. इसका सूत्र वाक्‍य यही तो था, ‘किसी को अपनी अनुमति के बिना स्वयं को दुखी करने की इजाज़त मत दीजिए. यह ऐसा नियम है, जिससे आपकी जिंदगी में कोई चाहकर भी दुख का कारखाना नहीं लगा सकता.’

दूसरे की गलती से चिपके रहने, खुद को चिपकाए रखने की लत इससे एकदम जुडी हुई है. एक छोटी सी कहानी इससे जुडी हुई है. संभव है, इस बात को और सरलता से समझा जा सके.
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मेरे बहुत प्रिय मित्र ने किसी वजह से हमसे बिना बताए धीरे-धीरे संवाद समाप्‍त कर लिया. हमें यह समझने में लगभग एक साल का समय लगा. ऐसा इसलिए हुआ, क्‍योंकि हमारे बीच प्रेम का पुल इतना गहरा था कि बाढ़ का पानी उसके ऊपर से गुजरने के बाद भी रिश्‍तों पर असर नहीं होता था.

जब मुझे इस बात का पता चला, उनसे पूछा तो उनने कारण बताने में असमर्थता जताई. बस इतना ही कहा कि कुछ निजी, पारिवारिक कारण के चलते वह ऐसा कर रहे हैं. संबंध इतने प्रिय थे कि स्‍वयं को संभालने में कुछ समय लगा.

लेकिन जल्‍द ही तय किया, उनके फैसले का असर मैं अपने जीवन की गुणवत्‍ता पर कैसे पड़ने देता. क्‍योंकि मेरे जीवन पर अनेक लोगों का अधिकार है. मैं दूसरों के फैसले, निर्णय से अपने जीवन को अनजाने दुख, तनाव की ओर नहीं धकेल सकता, क्‍योंकि इससे अनेक जीवन जुड़े हुए हैं. ऐसा करना कभी सरल नहीं होता. इसके लिए जरूरी है, जीवन के प्रति गहरी आस्‍था. जीवन दृष्टि. अपनी स्‍वतंत्र जीवनशैली.

आज हमने दो चीजों पर संवाद किया. पहला दूसरे की गलती को वैसे ही देखने की दृष्टि विकसित करना, जैसी अपनी गलती के प्रति होती है. दूसरा दूसरी की गलती का अपने जीवन पर यथासंभव कम असर पड़ने देना.

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First published: July 3, 2019, 7:31 PM IST
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