#जीवन संवाद : मन सहेजने की फुर्सत!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: September 12, 2019, 9:16 AM IST
#जीवन संवाद : मन सहेजने की फुर्सत!
जीवनसंवाद

Jeevan samvad: मन के ठीक नहीं होने के अनेक कारण हैं. इसकी ठोस वजह पहचानना सरल नहीं है. इसलिए विशेषज्ञ की मदद जरूरी है.

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  • Last Updated: September 12, 2019, 9:16 AM IST
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बुखार तो दूर, हल्का जुकाम होने पर भी डॉक्टर की ओर दौड़ने वाले लोग मन को लेकर सजग नहीं हैं. मन परेशान है. अच्छा नहीं लग रहा. सब कुछ ठीक होने पर भी प्रसन्नता नहीं है. कुछ घुटन सी है. उसके बाद भी हमें क्यों नहीं लगता कि किसी मन के जानकार से मिला जाए. देश में मनोचिकित्सकों से मिलने, मन की परेशानी को सरलता से साझा करने का चलन अभी शुरू नहीं हुआ है.

अगर हमसे कोई कहे कि मैं कुछ परेशान हूं तो हम उसे उसके पद, प्रतिष्ठा से जोड़ने लगते हैं. जैसे किसी का भी तन प्रतिरोधक क्षमताओं के कमजोर होने से बीमार पड़ सकता है वैसे ही हमारा मन भी बीमार पड़ सकता है.

शरीर के प्रति तो हम सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हैं, लेकिन मन के प्रति हम अभी भी खासे कठोर हैं. हमें लगता है जिसके पास करने को कुछ नहीं है, वह अक्सर मन के उदास होने की बातें करता है. इसे हम अक्सर काम की कमी, खालीपन और दोस्तों की कमी से जोड़ देते हैं. यह केवल मिथक है!


सत्य तो यह है कि सब ओर सफलता, दोस्तों से घिरा व्यक्ति भी आसानी से अवसाद की चपेट में आ सकता है. इस समय इसका सबसे सटीक उदाहरण दीपिका पादुकोण हैं. दीपिका ने खुद स्वीकार किया है, जब उन्हें सब ओर से सफलता मिल रही थी. दुनिया के लिए वह बेहद सफल, प्रसन्न और संतुष्ट थीं, उनके भीतर घुटन तेजी से बढ़ रही थी. अंततः उनकी मां ने इस बात को समझा और उन्हें तैयार किया कि मनोचिकित्सक से मिला जाए. दीपिका के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था क्योंकि वह ऐसे प्रोफेशन से आती हैं, जहां छवि का बहुत ज्यादा महत्व है.

यह खतरा उनके सामने भी रहा होगा कि उन्हें 'पागल' 'बीमार और दुखी' साबित किया जा सकता है. या उनके चमकते कैरियर के लिए समय मुश्किल भरा हो सकता था. उन्होंने सच को स्वीकार किया और अब वह ऐसे लोगों की मदद भी कर रही हैं जिनका 'मन' ठीक नहीं है.


मन के ठीक नहीं होने के अनेक कारण हैं. इसकी ठोस वजह पहचानना सरल नहीं है. इसलिए विशेषज्ञ की मदद जरूरी है. कुछ समय पहले भोपाल में जीवन संवाद के एक कार्यक्रम में सबसे सुखद बात यह रही कि कुछ युवा सामने आए और उन्होंने बड़ी संख्या में मौजूद लोगों के सामने स्वीकार किया कि वह कुछ ठीक नहीं हैं. यह सरल नहीं है, लेकिन इसके साथ ही जैसे-जैसे हम इसे सामान्य करते जाएंगे हमारी समस्याएं दूर होती जाएंगी.

जितना महत्वपूर्ण हम शरीर की समस्या को मानते हैं ठीक वैसा ही जब हम मन को मानने लगेंगे सारे संकट दूर हो जाएंगे. शरीर के ठीक ना होने पर आप उतने परेशान नहीं होते हैं जितने मनके असहज होने पर होते हैं.

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इसकी एक वजह यह भी है कि आपको लगता है, आप ऐसे अकेले हैं, बाकी संसार तो 'सुख के सागर' में विहार कर रहा है. जब आप शरीर की किसी समस्या से जूझ रहे होते हैं तो यही बात आप के पक्ष में जाती है कि मैं अकेला नहीं हूं, अनेक लोग इस समस्या से परेशान है. जब मन ठीक नहीं होता है और लंबे समय से आप उसे स्वस्थ कर पाने में सक्षम नहीं होते हैं तो मन का संकट लहराते हुए पहले उदासी और फिर अवसाद की ओर बढ़ने लगता है.

इसलिए हम खुद और जो भी हमारे अपने हैं उनके मानसिक स्वास्थ्य पर उतनी ही नजर रखिए जैसे शरीर पर रखते हैं. इससे ही हम संपूर्ण स्वस्थ जीवन की ओर बढ़ पाएंगे. इसमें उम्र, प्रोफेशन और सफलता का कोई अंतर नहीं है. इसलिए अभी मत सोचिए कि यह समस्या इसको नहीं हो सकती. प्रेरणा और हौसले की जरूरत सबको होती है. यह ना हो तो इसकी कमी की शिकायत भी सबको हो सकती है.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: September 12, 2019, 9:14 AM IST
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