जीवन संवाद: सीखना!

जीवन संवाद.

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#Jeevan Samvad: नैतिक मूल्य के बिना मूल्य उपयोगी नहीं! यह तो कुछ ऐसा हुआ जैसे नदी में पानी है, लेकिन खारा है. केवल पानी होने से बात नहीं बनेगी, उसे मीठा भी होना होता है! ऐसा ही रिश्ता नैतिक मूल्य और मूल्य का है!

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कितना कुछ होता है सीखने को, लेकिन हम कितनी जल्दी हार जाते हैं. जिंदगी पिछले कुछ दशकों में इतनी तेज होती गई है कि सीखने पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. संगीत से लेकर जीवन तक हर जगह इसका असर पड़ा. यह कुछ-कुछ ऐसा है, जैसे आधी-अधूरी तैराकी के साथ हम उफनती नदी पार करने की कोशिश करें. कोशिश करने वालों की हार नहीं होती, इसके मायने यह नहीं कि कोशिश करने से पहले तैयारी न की जाए. हम सबने जीवन के अर्थ को जाने-समझे बिना ही 'कोशिश' करने का माध्यम बना लिया. हम तैयारी और गहरे ध्यान से दूर उतावलापन की ओर बढ़ता हुआ समाज बन रहे हैं. हमारे लक्ष्य छोटे होंगे, तो हमें बड़ा कुछ हासिल कैसे होगा!


छोटी-सी कहानी आपसे कहता हूं. संभव है, इससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो सकेगी. एक जे़न गुरु के पास दस साल से एक शिष्य जे़न की शिक्षा ले रहा था. ध्यान की क्रियाएं, उनके अभ्यास, अनायास जीवनशैली से लेकर जीवन के मर्म तक सभी चीजों का उसे अभ्यास कराया गया था. शिष्य को लगाा कि जे़न का पूरा ज्ञान उसे हो चुका है. इस शिष्य ने सीख तो सबकुछ लिया था, कंठस्थ भी कर लिया था, लेकिन अभी भी वह जीवन को जानने से दूर ही था.

दूसरों के शब्दों के सहारे विचार केवल रटा जा सकता है. रटी चीजें इससे अधिक काम नहीं आतीं. उन्हें केवल दोहराया जा सकता है, वह जीवन में नहीं उतरतीं.


इस शिष्य की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी. शिष्य के मन में बार-बार विचार आ रहा था कि दस बरस बहुत हुए अब चला जाए. वह अपने गुरु से अनुमति लेने उनकी कुटिया पर पहुंचा. बरसात हो रही थी. शिष्य जाकर गुरु के सामने बैठ गया. उनको प्रणाम किया. वह बोलने को ही था कि गुरु जी ने कहा, 'अरे, बरसात हो रही है, तुम्हारा छाता कहां है?'. छाता तो मैंने बाहर रख दिया, दरवाजे पर. शिष्य ने कहा, और तुम्हारी चप्पलें? गुरु ने पूछा. वह भी वहीं दरवाजे पर छोड़ दीं, शिष्य ने कहा. तो चप्पलें छाते के दाहिने ओर रखीं कि बाईं ओर? गुरुजी ने मुस्कराकर पूछा.

आश्रम से विदा लेने आया शिष्य थोड़ी देर के लिए सहम गया. उसे तो ध्यान ही नहीं था चप्पलें किस ओर उतारी गई हैं. उसे गलती का एहसास हो गया. वह बिना कुछ कहे वहां से चला गया और अगले दस साल तक गुरुजी की देखरेख में ध्यान का अभ्यास करता रहा. आगे चलकर ज़ेन में उसका बहुत नाम हुआ.

जीवन में आजीविका का महत्व है, लेकिन इतना अधिक नहीं, जितना हमें समझ में आ गया है. इस बात को समझने की जरूरत है कि नैतिक मूल्य के बिना मूल्य उपयोगी नहीं! यह तो कुछ ऐसा हुआ जैसे नदी में पानी है, लेकिन खारा है. केवल पानी होने से बात नहीं बनेगी, उसे मीठा भी होना होता है! ऐसा ही रिश्ता नैतिक मूल्य और मूल्य का है!


हम जीवन में एकतरफा दौड़ रहे हैं, जहां आधुनिक सुख-सुविधा के विचार तो हैं, लेकिन जीवन की ओर हमारा ध्यान नहीं. ऊपर कहानी में जिस तरह के ध्यान की अपेक्षा की गई है, वहां तक भले न पहुंचें, लेकिन कम से कम वहां तक तो पहुंचें, जहां जीवन के अंश बाकी रहें. मनुष्यता के बिना मनुष्य होने से बहुत कुछ हासिल नहीं होगा, इसे हम जितनी गहराई से समझ लें, उतना ही बेहतर होगा!

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