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#जीवनसंवाद : बड़ों को प्रेम कौन करेगा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 3, 2020, 3:28 PM IST
#जीवनसंवाद : बड़ों को प्रेम कौन करेगा!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हम सब के लिए बहुत जरूरी है कि अपनों के मन और जीवन में ऐसी कोई खरपतवार न उगे, जो उनके अंतर्मन को नुकसान पहुंचाने वाली हो. इसलिए छोटों को तो प्रेम कीजिए लेकिन उतना ही जरूरी है कि बड़ों को स्नेह किया जाए.

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  • Last Updated: January 3, 2020, 3:28 PM IST
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हममें से अधिकतर लोग अकेले रहने और अकेले होने के अंतर को ठीक से नहीं पढ़ रहे हैं. जिस चीज को हम अच्छे से नहीं पढ़ते, उसे सही तरह से समझना भी मुश्किल होता है. जीवन के साथ भी यही हो रहा है. हमें समझना होगा कि हमारे बीच में कौन से हमारे अपने लोग हैं, जो किसी न किसी वजह से अकेले पड़ गए हैं. अकेले रहने और अकेले होने के बीच बहुत कुछ ऐसा है जिसमें मानसिक बीमारी का डर है.

हम सबके साथ रहते हुए भी कई बार अकेले होते जाते हैं. लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता.

हमारा ध्यान अक्सर उस व्यक्ति की ओर ध्यान देते हैं जो किसी कारणवश अकेला रह रहा है. हम अक्सर ही अकेले रहने वाले व्यक्ति के प्रति अपने सरोकार जताते रहते हैं. उनकी चिंता करते रहते हैं. इस प्रक्रिया में उन्हें भूल जाते हैं जो सबके साथ रहते हुए अकेले हो रहे हैं.


भोपाल में ऐसा ही कुछ घटा है. पूनम चौहान ने संघर्ष से हार मान ली. जीवन के संघर्ष के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. पूनम को मैं लगभग तीस वर्ष से जानता हूं. उस समय से जब मैं स्वयं छात्र था, अपने खर्चों की पूर्ति के लिए बच्चों को पढ़ाया करता था. पूनम मेरे छात्र थे. उस समय वह गांव से अपने तीन भाइयों की जिम्मेदारी के साथ शहर आए. जिंदादिल किशोर, जिसके मन में खूब सारे सपने थे. अपने लिए. अपने भाई के लिए. उन सभी के लिए जो पूनम के आसपास थे वह चौबीस घंटे तैयार रहने वाला लड़का था. लगभग दस बरस हुए जबसे पूनम से बात नहीं हुई थी. वह वकालत करने लगे और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे थे. उनके भाई जिंदगी के सफर में सही तरीके से आगे बढ़ गए. एक भाई तो सेना में भर्ती होने के बाद वहां से सेवा मुक्त होकर शिक्षण के कार्य में भी लग गए. लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि पूनम की जिंदगी पटरी से धीरे-धीरे उतर रही थी. ऐसा कई बार होता है जब परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला व्यक्ति अकेला पड़ने लगता है. क्योंकि जिन लोगों को उसने तैयार किया, वह अपनी-अपनी दिशाओं में निकल जाते हैं.

उनके मन में बड़े के प्रति सम्मान तो रहता है, लेकिन स्नेह का खयाल नहीं रहता. हमें लगता ही नहीं कि बड़ों को भी स्नेह अनुराग की जरूरत है. ध्यान रहे मैं यहां बड़ों के प्रति स्नेह की बात कर रहा हूं. उनके लिए दुलार की बात कर रहा हूं. हमारे समाज में बड़ों के लिए सम्मान तो है, लेकिन दुलार और स्नेह की भारी कमी है. हम हमेशा यह मानकर चलते हैं कि बड़े तो अपना खयाल रख ही लेते हैं.


पूनम की जिंदगी में भी तनाव आए. तनाव की खरपतवार मन के आंगन में इतने धीमे उगती है कि कई बार हमें भी पता नहीं चलता. बाहर से आनंद में दिखने वाले मन पर दुख की छाया ऐसे ही पड़ती है. पूनम के सखा प्रज्ञेश विजय नंदनवार ने उनके नहीं रहने पर लिखा, 'काश हम उनके अकेले होने को पकड़ पाते. बाहर से वह इतने खुश दिखते थे कि हम समझ ही नहीं पाए कि वह दुखों का सामना करने में अकेले पड़ते जा रहे हैं.'
हम सब के लिए बहुत जरूरी है कि अपनों के मन और जीवन में ऐसी कोई खरपतवार न उगे, जो उनके अंतर्मन को नुकसान पहुंचाने वाली हो. इसलिए छोटों को तो प्रेम कीजिए लेकिन उतना ही जरूरी है कि बड़ों को स्नेह किया जाए. उनके भीतर क्या चल रहाा है, इसका खयाल रखा जाए
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पूनम बाहर से इतने खुश दिखते थे कि उनके भीतर का किसी को खयाल ही रहा. आपसे अनुरोध कि अगर आपके पास ऐसा कोई भी है, जो किसी भी वजह से अकेला है. सबके साथ में रहकर भी उदास है/हो सकता है. उसके मन को टटोलते रहिए. प्यार पर केवल छोटों का हक नहीं है. बड़ों को भी उसकी उतनी ही जरूरत है.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 25, 2019, 11:20 AM IST
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