#जीवनसंवाद: अभय और तनाव!

#जीवनसंवाद: अभय और तनाव!
#जीवन संवाद: अभय और तनाव!

jeevan Samvad: बड़ा विचित्र मनोविज्ञान है हमारा. संभव है कुछ लोगों को यह समझ ना आए. क्योंकि हमारा बरसों का अभ्यास है. हमने बच्चे को माता-पिता से पिटते देखा है. उसके बाद बूढ़े और लाचार माता-पिता को बच्चों के सामने असहाय देखा है. दोनों में गहरा अंतर्संबंध है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 19, 2020, 10:17 PM IST
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मन के डर और जीवन में तनाव का सरल, सहज रिश्ता है. अभय बहुत शक्तिशाली शब्द है. इसके मायने केवल यह नहीं हैं कि डर नहीं है. बल्कि यह है कि मन सब प्रकार से भय से मुक्त है. अभय अनुरागी, शक्तिशाली, सुंदर और नया जीवन देने वाला शब्द है. हम अभय को प्राप्त हुए होते तो जीवन कुछ और होता! हम तो हर क्षण भयभीत हैं. डरे लोग डरा हुआ समाज बनाते हैं. जो भयभीत हैं, वह दूसरों को डर के सिवा कुछ नहीं दे सकते. डर से कुछ हासिल नहीं होता, पाना केवल प्यार से संभव है!

इन दिनों जिस तेजी से तनाव बढ़ रहा है. उसके पीछे सबसे बड़ा कारण हमारे बीच अभय का न होना है! डरना नहीं और अभय को प्राप्त होना. दोनों अलग-अलग बातें हैं.  संभव है, इस समय आप किसी चीज़ से से ना डर रहे हों. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अभय को प्राप्त हुए.

अभय का अर्थ है कि हमारा चित्त स्थितप्रज्ञ है. घटनाएं चाहे जैसी घटती रहती हों, बाहरी तल पर तो हलचल हो सकती है लेकिन भीतर नहीं. जो अभय को प्राप्त हुए हैं उनके भीतर बेचैनी नहीं है. वही स्थितप्रज्ञ है जो घटना के प्रति निर्विकार बना रहता है. इसका अर्थ लापरवाह होने से मत लगाइए. आलसी होने से तो एकदम ही नहीं. हाथ पर हाथ धरे बैठने वाले से भी नहीं!




अभय का अर्थ केवल इतना है कि आप किसी चीज़ से नहीं डरते. अभय का अर्थ है, आपका मन पूरी तरह भय रहित है. आप पिता से नहीं डरते. बॉस से भी नहीं डरते. पति/पत्नी से नहीं डरते. डरना है ही नहीं. जीवन में जब डर अधिक हो जाता है तो प्रेम धीरे-धीरे कम होता जाता है. मैंने बड़ी संख्या में ऐसे पुत्रों को देखा है, जो पिता से बहुत डरते थे. उनके पिता इसे सम्मान समझते रहे. लेकिन जैसे ही वह बड़े हुए, उनका डर दूर हो गया. आर्थिक रूप से सक्षम होते ही पिता उनसे डरने लगे! अगर यह प्रेम होता तो उसमें चक्रवर्ती ब्याज (कंपाउंड इंटरेस्ट) जोड़कर मूलधन कई गुना हो जाता. लेकिन यह डर था इसलिए पिता को बदले में और अधिक पीड़ा और डर मिला.



हमें वही मिलना है जो हम देते हैं. कभी मत सोचिए कि आप के डर से पलने वाला बच्चा गहरे अनुशासन में है. अरे! वह तो विवश है. आप उससे मारपीट और हिंसा करते हैं. वह तुरंत समझ लेता है, आपसे जीत नहीं सकता. इसलिए आत्मसमर्पण (सरेंडर) कर देता है. लेकिन जैसे ही वह बड़ा होता है फिर आपकी हिम्मत नहीं होती उस पर हाथ उठाने की. हम बड़े बच्चे को इसलिए नहीं मारना बंद कर देते क्योंकि वह बड़ा हो रहा है बल्कि इसलिए बंद कर देते हैं ताकि पलट कर हमें न मार दे!


बड़ा विचित्र मनोविज्ञान है, हमारा. संभव है कुछ लोगों को यह समझ ना आए. क्योंकि हमारा बरसों का अभ्यास है. हमने बच्चे को माता-पिता से पिटते देखा है. उसके बाद बूढ़े और लाचार माता पिता को बच्चों के सामने असहाय देखा है. दोनों में गहरा अंतर्संबंध है. जब तक डर रहेगा, रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते. हम बचपन में जिनसे डरते हैं, बड़े होकर कभी उनसे प्रेम नहीं कर सकते जबकि इसके उलट बचपन में जिनसे प्रेम करते हैं, पूरी जिंदगी कुछ न कुछ करते रहते हैं.

तनाव तभी मिटेगा जब हम भीतर से अपने डर को खत्म कर देंगे. इस समय कोरोना का संकट हमारे सामने है. आपका प्रश्न हो सकता है इस समय अभय को कैसे प्राप्त हुआ जाए. उत्तर उतना ही सहज है. जितने प्रयास आप इससे बचने के लिए कर सकते हैं, करिए. बस डरिए मत.

दुनिया के बड़े डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक सभी इस बात को दोहराते हैं जब हम तनाव/डर में होते हैं तो हमारे शरीर से कुछ ऐसे हारमोंस निकलते हैं, जिसका लीवर समेत शरीर के सभी अंगों पर अच्छा असर नहीं पड़ता. इसलिए तनाव के मुकाबले जो घट रहा है, पूरी उर्जा से उसका सामना करना चाहिए. यह भी गुजर जाएगा! हम मनुष्य हैं और मनुष्यता का इतिहास बहुत लंबा है. उसको केवल अपने जीवन से जोड़ कर मत देखिए. ऐसे संकट सौ- दो सौ बरस में आते रहते हैं. स्पेनिश फ्लू लगभग सौ बरस पहले ही तो आया था.

इसलिए मन को भीतर से प्रबल कीजिए. उसे डर से मुक्त कीजिए. हमेशा याद रहे अभय का अर्थ बाहरी चुनौतियों के सामने लापरवाही नहीं है. साहस का नमूना भी नहीं. अभय का अर्थ यह नहीं कि बिना तैयारी के कोरोना संकट में आप बाहर निकल कर भ्रमण करने लगें.

अभय का अर्थ जंगल में शेर के सामने जाकर खड़े हो जाना नहीं है. अभय का अर्थ है, मानसिक रूप से किसी भी डर से दूर रहना. डर से मुक्ति मन को अभय की ओर ले जाती है. शारीरिक और मानसिक तल पर अभय के अंतर को समझना जरूरी है. दोनों में गहरा अंतर है.


कठिनाई और खतरनाक स्थिति से शरीर को सजग रखना सामान्य बुद्धि है. मन के अभय का अर्थ है, उसे हर प्रकार के डर से दूर रखना. जब मन स्थितप्रज्ञ हो जाएगा. घटनाओं के प्रति निर्विकार, निराकार हो जाएगा. वह अभय के निकट पहुंचता जाएगा. एक बार मन अभय को प्राप्त हो जाए उसके बाद वह हर तरह के तनाव से दूर होता जाएगा. डिप्रेशन, निराशा और आत्महत्या डरे हुए मन और तनाव के मिश्रण से बनती है. इसलिए मन को तनाव से दूर रखने के लिए अभय की ओर ले जाना सबसे सरल रास्ता है. इसके बारे में हम अगले अंकों में विस्तार से चर्चा करेंगे.

शुभकामना सहित....

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