#जीवनसंवाद: सबसे अच्छा कौन!

#जीवनसंवाद: सबसे अच्छा कौन!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: प्रेम, क्षमा, करुणा और स्नेह को दुर्लभ मत बनाइए. इनका अधिकतम उपयोग कीजिए, यह उस सुख की नींव हैं, जिसकी तमन्ना में हम जिए जा रहे हैं!

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 14, 2020, 2:54 PM IST
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अक्सर हम यह सवाल करते रहते हैं, सबसे अच्छा कौन है! किसका व्यवहार, आचरण सबसे अच्छा है. कबीर का इस बारे में सुंदर प्रसंग है. कबीर से एक बार किसी ने पूछा, इस गांव में सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति कौन है. उत्तर मिला, वही जो तेरे पड़ोस में रहता है. पूछने वाले ने कहा, उस पर तो कभी मेरा ध्यान ही नहीं गया. वह बड़ा सीधा-सादा आदमी है. चुपचाप अपनी मस्ती में रहता है.

उसने गलत नहीं कहा था, हम सब सीधे-सच्चे लोगों पर कहां ध्यान देते हैं. हमारा ध्यान ही उन लोगों पर होता है, जो कोई न कोई गड़बड़ करते रहते हैं. पूछने वाले का पड़ोसी भी अपनी दुनिया में मग्न रहने वाला था. अगले दिन वह पड़ोसी से मिले, तो देखा उसके चेहरे पर एक अलग तरह की चमक है. उन्होंने कबीर से कहा, 'मैं हमेशा इस आदमी की पूजा करूंगा. आज से वह मेरा गुरु हुआ'!

फिर उन्होंने कबीर से कहा, 'बस एक और सवाल है, इस गांव का सबसे बुरा आदमी कौन है, जिससे मैं बचने की कोशिश करूं'. कबीर का जवाब पुराना वाला ही था- वही तेरा पड़ोसी! पूछने वाले का माथा चकरा गया. उसने कहा, 'यह तो उलझन हो गई. थोड़ी रोशनी डालिए'. कबीर ने कहा, 'मैं क्या करूं. कल जब तुमने पूछा था, तुम्हारा पड़ोसी उस समय अच्छे भाव में था. उसके भीतर प्रेम उमड़ रहा था. मनुष्यता की लहर बड़ी ऊंची थी. आज जब तुमने पूछा, तो वह एकदम उल्टे विचार में था. मैं कुछ नहीं कर सकता. यह हर पल, हर क्षण बदलता मन है. कल सुबह मैं नहीं कह सकता कि क्या हालत होगी, संभव है, तुम्हारा पड़ोसी फिर अच्छे भाव में आ जाए'!



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कबीर समझाते हैं, 'हम वही होते हैं, जो इस समय होते हैं. हमारा मन हर पल बदलता है. इसलिए अच्छे-बुरे का फैसला लंबे हिसाब-किताब से नहीं किया जा सकता. जो है ,सो अभी है. जैसे हवा जो बह रही है अगले क्षण वह नहीं होगी. नदी जो बह रही है अगले ही पल में बदल जाती है. ठीक ऐसे ही हमारे विचार हमें प्रतिपल बदलते रहते हैं! अच्छे-बुरे के फेर में हम सबसे अधिक नुकसान अपना करते हैं, क्योंकि हम अपनी धारणाएं इसके अनुसार बनाते हैं. हम भावनाओं का बोझ अपने मन पर डालते हैं. किसी को अच्छा मानने से मन को उतनी प्रसन्नता नहीं मिलती, जितना किसी को बुरा मानने से निंदा का रस आता है. इसलिए लोगों की छोड़ो, अपने मन पर ध्यान केंद्रित करो. स्वयं को देखो'.

इसीलिए कबीर कहते हैं-

'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय.'


दूसरों के लिए बहुत सारे नकारात्मक विचार मन में रखते हुए हम अपने मन को ही दूषित करते हैं. घर में कचरा जमा हो, तो उसकी गंध असहज करती है. मन भी ऐसे ही परेशान होता है, उस कचरे से जो दूसरों का है, लेकिन हम उसे अपने मन में दबाए बैठे हैं. दूसरे के शब्द/व्यवहार के लिए स्वयं को सजा देना ठीक नहीं!

इसलिए, दूसरे को सजा देने का ख्याल असल में स्वयं को सजा देने जैसा है. किसी को सुधारना अगर इतना आसान होता, तो यह दुनिया अब तक कब की बदल गई होती. हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम कम से कम स्वयं को वैसा बना सकें, जैसा हम दूसरे के बारे में बातें करते हैं. प्रेम, क्षमा, करुणा और स्नेह को दुर्लभ मत बनाइए. इनका अधिकतम उपयोग कीजिए, यह उस सुख की नींव हैं, जिसकी तमन्ना में हम जिए जा रहे हैं!

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