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#जीवनसंवाद : हिंसा, टीवी और हम!

#जीवनसंवाद : हिंसा, टीवी और हम!

शब्‍द की प्रतिध्‍वनि केवल घाटियों में ही सुनाई नहीं देती. बल्कि यह तो पूरे जीवन हमारे आसपास गूंजती रहती है. जीवन हमारे शब्‍दों का बूमरैंग ( छोटा सा औजार जो अपना काम करके चलाने वाले के पास लौट आता है) है.

शब्‍द की प्रतिध्‍वनि केवल घाटियों में ही सुनाई नहीं देती. बल्कि यह तो पूरे जीवन हमारे आसपास गूंजती रहती है. जीवन हमारे शब्‍दों का बूमरैंग ( छोटा सा औजार जो अपना काम करके चलाने वाले के पास लौट आता है) है.

शब्‍द की प्रतिध्‍वनि केवल घाटियों में ही सुनाई नहीं देती. बल्कि यह तो पूरे जीवन हमारे आसपास गूंजती रहती है. जीवन हमारे शब्‍दों का बूमरैंग ( छोटा सा औजार जो अपना काम करके चलाने वाले के पास लौट आता है) है.

दि‍ल्‍ली में हिंसा हमारे गुस्‍से, नफरत से उबलते हुए दिमाग की ऐसी तस्‍वीर सामने लाई है, जिसका खुद समाज को अंदाज नहीं था. हम किसी के उकसावे पर हिंसा की लपटों में कूद पड़ें यह तो संभव है. लेकिन इतनी तेज़ी से हम इन सबके लिए तैयार हो जाएंगे, इसका अहसास नहीं था.

यह हिंसा हम सबके लिए सजग होने का अवसर लेकर आई है. आगे बहुत कुछ इससे वीभत्‍स हो सकता है. उससे बचने का तरीका केवल यही है कि दिल्‍ली में जो कुछ घट रहा है, समाज उससे मुकाबले को सीधे तौर पर तैयार हो.

समाज जब तक अपने विवेक को लेकर चौकस नहीं होगा, नेता उसे अपनी कठपुतली बनाए रखने के लिए इससे भी बदतर तरीके इस्‍तेमाल करने से पीछे नहीं छूटेंगे.

हम जिस तरह की भाषा को निरंतर महत्‍व दिए जा रहे हैं, अपने व्‍यवहार में एक-दूसरे के लिए प्रेम, उदारता और विश्‍वास को छोटा किए जा रहे हैं. उसके परिणाम देर–सबेर इसी रूप में सामने आने हैं. हम अपने शब्‍दों के महत्‍व को केवल यह कहकर अनदेखा नहीं कर सकते कि अरे! इसको कोई नहीं सुनता. हमारा हर शब्‍द ब्रह्मांड की यात्रा पर होता है. शब्‍द लौटकर आते ही हैं.

शब्‍द की प्रतिध्‍वनि केवल घाटियों में ही सुनाई नहीं देती. बल्कि यह तो पूरे जीवन हमारे आसपास गूंजती रहती है. जीवन हमारे शब्‍दों का बूमरैंग (छोटा सा औजार जो अपना काम करके चलाने वाले के पास लौट आता है) है. इसलिए हर कहे गए शब्‍द का अपना ठोस महत्‍व है.



इधर कुछ बरसों में ‘हिंदू-मुस्लिम’ भारतीय टेलीविजन (टीवी) का सबसे प्रमुख विषय बन गए हैं. हर खबर में टीवी दोनों धर्मों को तलाशने में जुटा रहता है. अधिकांश चैनल धर्म के आधार पर वक्‍ता तय करते हैं. अशिक्षित, कट्टर और पूर्वग्रह से भरे विशेषज्ञ, क्रोध में उबलते एंकर के साथ जो हिंसा समाज की ओर भेज रहे हैं. समाज की उदारता, मोहब्बत के पैगाम उसका ठीक तरह से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं. संविधान में हमारी सर्वोच्‍च आस्‍था होनी चाहिए. लेकिन टीवी में हर मिनट संविधान की मूल भावना का जैसे मखौल उड़ाया जा रहा है. हम स्‍वयं को मनुष्‍यता, उदारता, समरसता के समंदर से मेंढक का कुंआ बनाने में जुटे हुए हैं.

डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच अपने वजूद को बचाए रखने के लिए टीवी ने अपने को इस तरह बदला है कि वह समाचार से बहुत दूर निकल गया है. भारतीय टीवी के एंकर, समाचार विश्‍लेषण से बहुत दूर निकल गए हैं.


वह हमारे सिनेमा में उस किरदार की तरह दिखने लगे हैं जो नायक से खुद को अलग दिखने के फेर में ऐसे रास्‍ते पर निकल जाता है, जहां अंत में उसके पास अंधेरी दुनिया के अलावा कुछ नहीं बचता. उसे लगता है, वह लोगों को बांटकर उन पर राज कर सकता है लेकिन वह केवल अपनी खोखली दुनिया रच रहा होता है.
टीवी ने अपने को बचाए रखने के लिए समाज की एकता और समरसता को खतरे में डाल दिया है. समाज में जो हिंसा, धार्मिक उन्‍माद, गुस्‍सा दिख रहा है, उसमें टीवी एंकर की खास भूमिका है. वह रात-दिन गुस्‍सा, नफरत परोस रहे हैं. हर चीज़ में ‘हिंदू –मुसलमान’ तलाशने में जुटे टीवी की इस हिंसा में अदृश्‍य, ठोस भूमिका है.

टीवी के उबलते गुस्‍से से बच्‍चों को दूर निकालना होगा. दिल्‍ली में दंगों की तस्‍वीर में सबसे खतरनाक है, कम उम्र के बच्‍चों को गुस्‍से से उबलते देखना. जिनने अभी जिंदगी शुरू ही की है, उनका इतना घृणा से भरा होना सबसे खतरनाक है. यह कई बरस से टीवी और व्‍हाट्सएप से भेजी जा रही हिंसा का शिकार हुए हैं.


घर जलाने, हत्‍या करने को तैयार इन युवाओं के हाथ खून से कौन रंग रहा है. अगर अब तक आप यह तय नहीं कर पा रहे हैं तो देश तो दूर, आप अपने परिवार को भी नहीं बचा पाएंगे.

दयाशंकर मिश्र 
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

यह भी पढ़ें: #जीवनसंवाद: हिंसा-अहिंसा और समाज!


#जीवनसंवाद: कितना तनाव!

Tags: Daya shankar mishra, JEEVAN SAMVAD, Motivational Story

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