#जीवनसंवाद: मैं तुम्हें जानता हूं!

#जीवनसंवाद: मैं तुम्हें जानता हूं!
#जीवन संवाद

#JeevanSamvad: पीपल उगने के बाद धीरे-धीरे अधिक जगह घेरेगा ही. वह नीम नहीं है. वह पीपल है. सबका अपना स्वभाव है. इतने सारे देशज पेड़-पौधों से घिरा रहने वाला समाज भी मनुष्यों के बारे में एकदम प्रकृति-विरोधी तरीके से विचार करता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 1, 2020, 2:47 PM IST
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छोटी-सी कहानी से संवाद आरंभ करते हैं. महात्मा बुद्ध का बहुत सुंदर प्रसंग है. संन्यास के कई वर्ष बाद बुद्ध पिता से मिलने राजमहल गए. तब तक दुनिया बुद्ध के ज्ञान से परिचित हो चुकी थी. लाखों लोग उनके उपदेशों से प्रभावित थे. अहिंसा, करुणा, दया पर हर कोई उनकी बात सुनने को तत्पर था. पिता ने उनको गले लगाते हुए कहा, 'मुझे पता था तुम जरूर लौट आओगे. तुमने हमें बहुत परेशान किया, फिर भी मुझे खुशी है कि तुम लौट आए.' महात्मा बुद्ध के पिता राजा थे. जब वह संन्यासी बुद्ध से बात कर रहे थे, तब भी वह राजा ही बने रहे. वह पिता नहीं बन पाए.

बुद्ध ने उन्हें समझाने की कोशिश करते हुए कहा, 'मैं अब महल से बहुत दूर चला गया हूं. मैं आपकी इस दुनिया के योग्य नहीं हूं.' पिता ने नाराज होते हुए कहा, 'मैं तुम्हें बचपन से जानता हूं. तुम हमेशा से ही जिद्दी हो. मैं तुम्हारी बातों और यहां से जाने को लेकर सारे अपराध क्षमा कर सकता हूं. तुम इधर-उधर की बात मत करो, बस लौट आओ. मैं तुम्हारा पिता हूं. तुमसे बहुत अच्छी तरह परिचित हूं.'


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बुद्ध ने उनसे बहस नहीं की. अनुमति लेकर हमेशा के लिए महल से दूर अपने मार्ग पर आगे बढ़ गए. दूसरी ओर हम कितना अधिक एक-दूसरे को जानने का दावा करते हैं! जबकि अभी तक तय नहीं है कि हम स्वयं को भी जानते हैं कि नहीं! दूसरे को जानने का अहंकार हमारे अंदर बहुत गहरे उतर गया है. इसकी पहचान से ही हम भीतर की ओर आगे बढ़ पाएंगे! यह केवल बुद्ध की बात नहीं. हम एक-दूसरे को जीवनभर नहीं समझ पाते. यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि समझने की कोशिश नहीं करते. हां, अभिमान जरूर करते हैं सबको समझने का.



इसके साथ ही एक दूसरी यात्रा पर मैं आपको ले जाना चाहता हूं. जहां इसे न समझने का कारण है. यह कारण है- बीज और फूल का.
जब किसी व्यक्ति को हम एकदम जन्म से देख रहे होते हैं, तो हमेशा ही उसके बारे में पूर्वानुमान से भर जाते हैं. जैसे ही वह हमारे अनुमानों की उल्टी दिशा में जाना शुरू करता है, हम घबराने लगते हैं, क्योंकि हमने उसे बीज रूप से (बचपन से/बहुत पहले से) देखा हुआ है. अगर वह हमारे अनुमान की दिशा में जा रहा है, तो वह ठीक दिशा में जा रहा है. अगर उससे जरा भी दाएं-बाएं होता है, तो हम घोषणा करने लगते हैं कि वह गलत दिशा में दौड़ रहा है.
जबकि ऐसा होने की उम्मीद कहीं अधिक होती है, अगर उस बीज में विराट वृक्ष होने की संभावना हो. पीपल उगने के बाद धीरे धीरे अधिक जगह घेरेगा ही. वह नीम नहीं है. वह पीपल है. सबका अपना स्वभाव है. इतने सारे देशज पेड़-पौधों से घिरा रहने वाला समाज भी मनुष्यों के बारे में एकदम प्रकृति-विरोधी तरीके से विचार करता है.

बुद्ध के पिता ने जो उनसे कहा, हम सबके पिता/परिवार और शिक्षक यही तो दोहराते रहते हैं. हम तुम्हें जानते हैं, तुम यह काम नहीं कर पाओगे. संसार में जो भी नवीन काम हुए, जो भी लोग अपने जीवन के असली अर्थ को उपलब्ध हुए, इन विचारों से दूर रहकर ही हुए. अपने निर्णय पर डिगे रहने के कारण हुए. इसलिए जब लोग यह कहकर रास्ता रोकने लगें कि यह तुम्हारे बस में नहीं, तो बहुत जरूरी है कि उस पर दो बार और सोचा जाए!

स्थितियों का विवेकपूर्ण आंकलन जरूरी काम है, लेकिन इससे भी जरूरी है हमेशा यह याद रखना कि अगर हमारा रास्ता आसान है, तो मुश्किल भी छोटी होगी. अगर मुश्किलें बड़ी हैं, तो ही लक्ष्य के बड़ा होने की संभावना है!
इसलिए जब भी कोई नया रास्ता चुनने का समय आए, तो ऐसे लोगों के पास अपने प्रश्न लेकर जाइए, जो आपसे सचमुच में परिचित हों. केवल आपके जन्म और बड़े होने की प्रक्रिया से नहीं!

शुभकामना सहित...

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