#जीवनसंवाद: निष्ठा के कर्ज!

#जीवनसंवाद: निष्ठा के कर्ज!
#जीवन संवाद : निष्ठा के कर्ज!

Jeevan Samvad: स्वतंत्रता, जितनी बाहरी जरूरत है उससे कहीं अधिक यह हमारी आंतरिक विचार प्रणाली से जुड़ी हुई है. अपने निर्णय को निष्ठा के कर्ज से दूर रख कर ही हम उस स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं जिसकी हम अक्सर बातें करते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 3, 2020, 12:14 AM IST
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महाभारत की सबसे बड़ी शिक्षा में से एक है, निष्ठा के प्रति सतर्कता. महाभारत की पूरी कहानी में निष्ठा एक ऐसा किरदार है, जिसके आसपास पूरी कथा रची गई है. निष्ठा पर विचार करते समय इसमें से मनुष्यता, नैतिकता और न्याय का दृष्टिकोण भुला देने के कारण ही वह भीषण संघर्ष हुआ जिसकी कहानी महाभारत है. दुर्योधन के प्रति कर्ण की निष्ठा में इन तीनों गुणों की कमी है. उसकी निष्ठा की आंखें केवल और केवल दुर्योधन को देख पाती हैं. क्योंकि उनकी आंखों पर दुर्योधन के कर्ज की पट्टी बंधी है!

आज 'जीवन संवाद' में महाभारत की चर्चा इसलिए क्योंकि हमें बड़ी संख्या में पाठकों ने लिखा है कि वह कई बार ना चाहते हुए भी माता-पिता और परिवार के दबाव में, उनके प्रति निष्ठावान होने के कारण अपने निर्णय नहीं करते. परिवार में कुछ भी गलत होते हुए देखने के बाद भी उसके विरुद्ध खड़े नहीं होते. क्योंकि वह सम्मान और निष्ठा की डोर से बंधे होते हैं.


कर्ण का जीवन दुखमय है. उसमें दुख, उपेक्षा और प्रतिभाशाली होते हुए भी अधिकारों के प्रति वंचित किए जाने की पीड़ा है. ऐसी पीड़ा के बीच दुर्योधन जैसे सहारे के प्रति निष्ठावान होना स्वाभाविक तो हो सकता है लेकिन न्याय संगत नहीं. इससे मनुष्यता के इतिहास में कर्ण की भूमिका उसके सभी गुणों के बावजूद धूमिल होती जाती है. जबकि कर्ण जैसा दानवीर पूरी कथा में दूसरा नहीं है. निष्ठा के दूसरे उदाहरण स्वयं भीष्म पितामह जो धर्म के ज्ञाता, महावीर और हर प्रकार के संकट का सामना करने में सक्षम हैं. लेकिन वह भी कर्ण की तरह केवल सिंहासन के प्रति निष्ठावान हैं.
इसीलिए भीष्म पितामह और कर्ण का जीवन उस यश को प्राप्त नहीं होता जो उनसे बहुत कम प्रतिभाशाली और सक्षम दूसरे किरदारों को मिला. निष्ठा अक्सर ही हमसे उस समय मौन रहने को कहती है जब समाज को हमारी आवाज़ की जरूरत है. इसीलिए अक्सर विद्रोही, पढ़े लिखे और चैतन्य विचार के लोग राजनीति में सफल नहीं हो पाते. क्योंकि राजनीति उस तरह की निष्ठा की मांग करती है जिसकी पूर्ति बहुत हद तक भीष्म, द्रोण और कर्ण करते हैं. यहां विदुर का उल्लेख भी जरूरी है, जो इन सब के बीच धृतराष्ट्र की नौकरी करते हुए भी सत्य के पक्ष में सजगता से खड़े हैं. उनके बिना तो पांडवों की यात्रा आगे जाती नहीं दिखती.



इन सब किरदारों पर विस्तार से बातचीत हम जीवन संवाद के अगले अंकों में करेंगे, आज की बातचीत को हम कर्ण पर ही केंद्रित रखते हैं. कर्ण से हम क्या सीख सकते हैं! 'जीवन संवाद' के लॉकडाउन के दौरान एक व्याख्यान में यह प्रश्न पूछा गया. इस प्रश्न में शामिल था कि दोस्ती कर्ण जैसी होनी चाहिए!


कर्ण से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. लेकिन दोस्ती और निष्ठा के विवेक में अंतर करना जरूरी है. कर्ण से हम सीख सकते हैं, लोगों के तानों और 'लोग क्या कहेंगे' के बीच प्रतिभा को निखारते रहना. द्रोण जैसे गुरु से अपने अंगूठे की रक्षा करना. लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है, जो गलती की उसे नहीं दोहराना. किसी के प्रति निष्ठावान होते हुए भी अपने विवेक की ओर से आंखें नहीं मूंदना.

हमें इस बात को याद रखना ही होगा कि विवेक हमारा ही है. कर्ण दुर्योधन के राज्य से बाहर जाकर, उसका राज्य लौटा कर एक सामान्य जीवन जीने का विकल्प चुन सकते थे, यदि उन्हें सत्य के प्रति राज्य से अधिक अनुराग होता. कर्ण ने द्रौपदी वस्त्र हरण के समय जिस तरह का व्यवहार किया वह यह बताता है कि अपने मित्रों के प्रति सतर्क न रहने और निष्ठा की पट्टी आंखों पर बनी रहने के कारण हमारा दिमाग, चेतना कब अन्याय की ओर झुक जाए. इसका कोई ठिकाना नहीं.

व्यक्तिगत असहमतियों को हम अन्याय में नहीं बदल सकते. कर्ण के व्यक्तित्व का प्रकाश उस दिन निष्ठा की पट्टी ने धूमिल कर दिया जब उसने दुर्योधन की प्रसन्नता के लिए अपने मनुष्यता के दायित्व को भुला दिया.


#जीवनसंवाद: साथ का संकट!

हमें इस बात को स्पष्टता से समझना है कि किसी की मेहरबानियों का कर्ज़ उतारते समय यह अवश्य ध्यान रखा जाए कि निष्ठा का अर्थ अपने विवेक और मनुष्यता के प्रति सतर्क विचारों से दूरी नहीं है. हम अक्सर निर्णय लेने के समय ऐसे ही विचारों से लगे रहते हैं. स्वतंत्रता, जितनी बाहरी जरूरत है उससे कहीं अधिक यह हमारी आंतरिक विचार प्रणाली से जुड़ी हुई है. अपने निर्णय को निष्ठा के कर्ज से दूर रख कर ही हम उस स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं जिसकी हम अक्सर बातें करते हैं.

अपने जीवन को हम जितना अधिक स्वतंत्र बना पाएंगे, उसमें आनंद की सुगंध उतनी ही व्यापक होगी. इसलिए अपने विचार और मन को उधार के विचारों से जितना संभव हो दूर रखें. निष्ठा का अर्थ अपने विवेक और मनुष्यता के प्रति सतर्क विचारों से दूरी नहीं है!

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