#जीवनसंवाद: सारा प्यार तुम्हारा!

#जीवनसंवाद: सारा प्यार तुम्हारा!
#जीवन संवाद: सारा प्यार तुम्हारा!

Jeevan Samvad: हमें लगता है जीवन में बहुत समय है, जीवन में बहुत अवकाश है. जबकि ऐसा है नहीं. जीवन बहुत सख्त नियमों वाला प्रीपेेड अकाउंट है. इसमें किसी तरह का कोई अतिरिक्त रिचार्ज नहीं मिलता. जीवन केे नियम बहुत सख्त हैं. यहां केे नियमों में बदलाव की गुंजाइश बहुत कम है.

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जीवन कितना अधिक अप्रत्याशित है. इसका कई बार जब तक हमें एहसास होता है तब तक बहुत कुछ घट चुका होता है. बहुत कुछ बह चुका होता है. वक्त की मुट्ठी भर रेत संभालने की हम जितने की कोशिश करते हैं वह उतनी तेजी से हमसे दूर जाने लगती है. जीवन अचानक से वैज्ञानिकता से भर जाता है, जब उसकी निर्भरता भावना से अधिक किसी एक दशा पर निर्भर हो जाती है.

'जीवन संवााद' को राजस्थान के उदयपुर से एक पत्र मिला है जिसमें एक परिवार ने अपने प्रियजन के एकाएक जटिल बीमारी से घिर जाने का जिक्र करते हुए लिखा है कि हम तुमको कितना स्थगित करते रहते हैं.

हम भूल जाते हैं कि आज खिले फूलों को स्नेह नहीं किया गया तो संभव है रात और सवेरे के बीच हवा का तेज़ लम्हा उनको हमसे दूर कर दे. इसलिए जिस पल हम उनके पास हो सकते हैं, वहां होना चाहिए. प्यार को स्थगित करने का काम जीवन को स्थगित करने जैसा है.




दमयंती धारीवाल लिखती हैं, 'जैसे ही हमें पता चला भाई गंभीर बीमारी की चपेट में हैं, सारा परिवार धीरे-धीरे पास आ गया. सब मदद के लिए दौड़ते चले आए. लेकिन समय का जादू देखिए कि उसने भाई के साथ बहुत कंजूसी की! भाई कह रहे हैं कि जब तक कोई संकट न आए, हम प्रेम को स्थगित क्यों करते रहते हैं? क्यों टालते रहते हैं. आज नहीं, आज तो समय नहीं है. अभी कैसेे हो पाएगा. बाद में देखते हैं. इस दिवाली, ईद और क्रिसमस में छुट्टी नहीं मिल पाएगी, अगली बार सोचते हैं. इसी तरह हम एक-दूसरे केे प्यार को मिलने के अवसर से, एक-दूसरे के सानिध्य के अवसर से वंचित करते रहते हैं.'


इस पत्र ने बहुत सारी ऐसी बातों की ओर संकेत किया है जिनको हम सब जानते हुए भी अनदेखा किए रहते हैं. हमें लगता है जीवन में बहुत समय है, जीवन में बहुत अवकाश है. जबकि ऐसा है नहीं. जीवन बहुत सख्त नियमों वाला प्रीपेेड अकाउंट है. इसमें किसी तरह का कोई अतिरिक्त रिचार्ज नहीं मिलता. जीवन केे नियम बहुत सख्त हैं. यहां केे नियमों में बदलाव की गुंजाइश बहुत कम है.

जिस तरह की जीवनशैली हमारे समाज ने दूसरों से नकल करने के चक्कर में अपना ली है, उससे सबसे अधिक नुकसान जीवन और प्यार का हुआ है. पहलेे हमारा मिलना सहज था. प्यार को सहेजना सहज था. बल्कि वह सहेजने से भी दूर था, क्योंकि उसमें बिखरनेे जैसा कुछ नहीं था. लेकिन धीरे-धीरे हमने 'हम' वाली जीवनशैली को 'मैं' में बदल दिया. सब कुछ सोचना विचारना केवल अपनेेे तक सीमित हो गया.

हमने सब कुछ की परिभाषा संयुक्त परिवार से निकालकर पति पत्नी और बच्चों तक सीमित कर दी. उसमें माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची किसी के लिए कोई जगह नहीं बची. अगर जगह बची भी तो बड़ी सहमी-सहमी सी. हमने प्यार को नीले आसमान से उतार कर एक तंग कोठरी में कैद कर दिया.


हम एक-दूसरे का प्यार कम करते जा रहे हैं. हमें एक-दूसरे के अधिक निकट आने की जरूरत है. एक-दूसरे के लिए अधिक कोमलता, उदारता और स्नेहन की दरकार है. प्रेेम को केवल विकट परिस्थितियों के लिए, जीवन मरण के संकट के लिए बचाकर नहीं रखना है. जीना है. जिससे प्यार की सुगंध जीवन का स्थाई भाव बन सके. जीवन की जड़ों असली खाद-पानी अपेक्षा से परे प्रेम से ही मिलता है. हम सबको थोड़ी-थोड़ी कोशिश करनी होगी, प्रेम की रिक्त्तता भरने के लिए!

अपने प्रियजनों के प्रति प्रेम को प्रकट करने के लिए किसी क्षण की प्रतीक्षा ना करें. ना जाने वह कब किस रूप में आ जाए. कौन सा लम्हा आखिरी बन जाए. हर पल को जीवन की संपूर्णता के साथ जीना होगा. सारे प्यार को गहराई केे साथ समेट कर एक दूसरे के हृदय में प्रवाहित करना होगा. प्यार बांटने से ही बढ़ता है, हृदय  में रखने से नहीं! शुभकामना सहित...

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