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#जीवनसंवाद: सिर्फ खुद से डरना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 6:42 PM IST

Jeevan Samvad: सबको समझने के लिए स्‍वयं को सुनना पहला इलाज है. भीतर की आवाज को ऐसा पारदर्शी मन देना, जिससे वह आप तक आसानी से पहुंचने लगे, अगला कदम है. हमें व्‍यस्‍तता के बीच यह तो ख्‍याल रखना ही है कि हम कहीं खुद से ही न छूट जाएं.​

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  • Last Updated: December 11, 2019, 6:42 PM IST
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लता मंगेशकर के जीवन के बारे में कुछ खोजते हुए बहुत सुंदर ख्‍याल मिले. वह कहती हैं, जीवन का मंत्र है, 'सिर्फ खुद से डरना'. वह समझाती हैं, 'अपने भीतर की आवाज सुनिए. जब कहीं लगे कुछ ठीक नहीं है, तो उसे अनदेखा मत करिए. दुनिया की परवाह से कहीं अधिक जरूरी है- काम, निर्णय करते समय स्वयं को अपने पैमाने पर खरा उतारना'. अपने नियम-कायदों से डरना. असल में होता यही है कि हम धीरे-धीरे खुद से दूर होते जाते हैं. पगडंडी पर चलते हुए अक्सर एक ख्याल रहता है कि हम 'ठीक' तो चल रहे हैं, लेकिन जैसे जैसे मंजिल की ओर बढ़ने लगते हैं, खुद से डरना बंद कर देते हैं. खुद की सुनना बंद कर देते हैं.

यहीं से हमारे अहंकार की अंतर्यात्रा आरंभ होती है. हम खुद से यानी भीतर से डरना बंद कर देते हैं. 'हम स्‍वयं से नहीं डरेंगे' की प्रक्रिया में खुद से दूर होते जाते हैं. अपनी इच्‍छा, महत्‍वाकांक्षा के बीच यह ख्‍याल रखना जरूरी है कि हम कहां जा रहे हैं! हम जिंदगी में जब भी फैसले ले रहे होते हैं, भीतर से एक हल्‍की आवाज हमसे कुछ कहने की कोशिश में होती है.

जिसका चित्‍त भीतर से घना, ठहरा, गहरा है. उस पर वक्‍त की आंधी का असर कम होता है. जो स्‍वयं से डरता है, केवल वही निडर है! जो स्‍वयं की सुनता है, वही सबकी सुन सकता है. अपनी आवाज से दूर होते ही हम स्‍वयं से दूर होने लगते हैं. जब आप खुद से दूर हो जाएंगे तो किसके पास रहेंगे, किसकी बात सुनेंगे, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं.


इसलिए सबसे पहला काम यही करिए कि स्‍वयं से निकटता की जांच करते रहिए. हर दिन कम से कम दस मिनट अपने लिए निकाले जाएं. स्‍वयं के लिए. जहां आपका अर्थ, आपका परिवार नहीं होना चाहिए. आपके बच्‍चे, माता-पिता नहीं हैं. केवल आप हैं.

अपने पास रहिए. स्‍वयं को सुनिए. हम कहां जा रहे हैं, किधर जाने को निकले थे, कहां पहुंच गए! इस बात से अक्‍सर हमारा ध्‍यान भटक जाता है. ध्‍यान भटकते ही हम उस दौड़ का हिस्‍सा बन जाते हैं, जिसमें दुनिया शामिल है. पागलपन की हद तक. यह पागलपन कहां से आता है. कैसे हमारी जिंदगी में दाखिल हो जाता है!

इन सबको समझने के लिए स्‍वयं को सुनना पहला इलाज है. भीतर की आवाज को ऐसा पारदर्शी मन देना, जिससे वह आप तक आसानी से पहुंचने लगे, अगला कदम है. हमें व्‍यस्‍तता के बीच यह तो ख्‍याल रखना ही है कि हम कहीं खुद से ही न छूट जाएं.
हम इस बात का हमेशा ख्‍याल रखते हैं कि रेलवे स्‍टेशन से हम समय पर ट्रेन पकड़ें. एयरपोर्ट पर तो इस बात का और अधिक ख्‍याल रखना होता है. क्‍योंकि इनमें दूसरों से किए वादे शामिल होते हैं. मजेदार बात है कि हम दूसरों से किए वादे तो खूब याद रखते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में हमारा हाथ, साथ खुद से छूटता जाता है.

हम स्‍वयं से दूर होने लगते हैं, क्‍योंकि हम अपनी सुनना, स्‍वयं से डरना बंद कर देते हैं. ऐसा करते हुए हम उन सहज नैतिक मूल्‍यों से दूर होते जाते हैं, जो हमें मनुष्‍यता से बांधे रखते हैं. एक-दूसरे छल करते हुए, हम भूल जाते हैं कि चीजें घूमकर हमारी ओर आएंगी ही. मनुष्‍य और मनुष्‍यता के नियम बहुत सरल हैं, मुश्किल केवल यह है कि ये हमारे लिए कठिन होते जा रहे हैं, इसीलिए हम उनसे दूर होते जा रहे हैं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 5, 2019, 12:16 PM IST
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