जीवन संवाद: कर्ज की जीवनशैली!

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#JeevanSamvad: युवाओं के बीच एक चीज बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही है. किसी भी कीमत पर अपनी हैसियत कम न बताना. अपनी सामाजिक हैसियत को कर्ज के सहारे चमकदार बनाने की चाहत ने हमें गहरे संकट में डाल दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 6, 2020, 11:50 PM IST
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कोरोना के हमारे जीवन में प्रवेश के बीच हमारी नजर कुछ ऐसे संकटों पर भी पड़ रही है, जिन पर पहले हमारा ध्यान ही नहीं था. कुछ दिन पहले क्रेडिट कार्ड से जुड़ी एक संस्था ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि क्रेडिट कार्ड से कर्ज लेने वालों की संख्या पिछले छह महीने में कई गुना बढ़ गई. इतना ही नहीं अब छोटे और मध्यम दर्जे के शहरों में भी क्रेडिट कार्ड लोकप्रिय होते जा रहे हैं. इनसे जुड़ी कंपनियों के लिए निश्चित रूप से अच्छी खबर हो सकती है, लेकिन बढ़ता हुआ कर्ज व्यक्तियों के लिए बहुत संकटकारी है. युवाओं के बीच एक चीज बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही है. किसी भी कीमत पर अपनी हैसियत कम न बताना. दूसरों के पास जो चीजें हैं, उसे किसी भी तरह अपने पास ही रखना, जिससे सामाजिक हैसियत चमकदार बनी रहे. भले ही बुनियाद खोखली होती जाए.


मनोवैज्ञानिक इसे टेंपरेरी मैडनेस (अस्थाई पागलपन) कहेंगे. याद रहे, गुस्से को भी मनोविज्ञान की भाषा में टेंपरेरी मैडनेस ही कहा जाता है. जब यह अस्थायी भाव, स्थायित्व की ओर बढ़ने लगे, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हम संकट वाली सुरंग में प्रवेश कर गए हैं. जंगल में टहलना अलग बात है और भटक जाना दूसरी बात. अपने जीवन-मूल्यों की निरंतर उपेक्षा के कारण हम जीवन के रास्ते में भटक गए हैं. बड़ी संख्या में कर्ज पर निर्भरता जिंदगी की बुनियाद को कमजोर करने वाली है.

आप सोच रहे होंगे गुस्से और कर्ज से अपनी झूठी शान बघारने को मैं जोड़ क्यों रहा हूं! यह इसलिए, क्योंकि दोनों के ही मूल में उलझन है. हम सुलझने के रास्ते पर नहीं हैं. हमारी चेतना और मन रास्ते से भटककर उलझ गए हैं. जो कर्ज में डूबता जा रहा है, उसे ख्याल ही नहीं कि तैर नहीं रहा है, बल्कि डूब रहा है. डूबने वाले को कभी नहीं लगता कि वह डूब रहा है. उसे हमेशा यही लगता है कि उसे डुबोया जा रहा है. हम खुद को बहुत अधिक मासूम और भोला समझते हैं. दूसरों पर हंसते हुए. उनकी निंदा करते हुए. उनका मजाक उड़ाते हुए हमें ख्याल ही नहीं रहता कि हम किस दिशा में जा रहे हैं!
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मैं अपने अनुभव की बात करूं, तो पिछले 6 महीने में मैं कम से कम ऐसे 10 लोगों से मिल चुका हूं, जो आर्थिक संकट के कारण जीवन समाप्त करने की कगार तक पहुंच चुके थे. जीवन से इतने अधिक निराश हो गए थे कि कोई रास्ता ही नहीं दिखता था. सब तरफ से केवल अंधेरा था. असल में यह सब बहुत अधिक आशावादी लोग थे. इतनी अधिक आशा ओढ़ ली थी इन्होंने कि उसके बाद निराशा ही बाकी थी. जब हमने इनसे बात शुरू की तो देखा पिछले कई वर्षों से इन सबके जीवन में कर्ज बढ़ता ही जा रहा था. व्यापारिक कौशल, सूझबूझ की कमी के कारण यह नुकसान इतना अधिक नहीं हुआ जितना झूठी शान-शौकत और बहुत अधिक वैभव के प्रदर्शन में हुआ. जिसको आजकल 'स्टेटस मेंटेन' करना भी कहते हैं.


आपसे इसके बारे में एक बात और साझा करना चाहता हूं कि इनमें से अधिकांश पुरुष थे और उन्होंने कभी अपनी जीवनसाथी से आर्थिक संकट का जिक्र नहीं किया, क्योंकि इससे उनके अहंकार को चोट पहुंचती थी. संभव है अब आप अहंकार, गुस्से और कर्ज के आपसी संबंध को समझ पाएं. अहंकार का अर्थ ही हुआ कि हम स्वीकार नहीं करेंगे! मानेंगे ही नहीं कि हम गलत हैं. हम भला गलत कैसे हो सकते हैं. गुस्सा इसलिए, क्योंकि जैसे ही कोई हमसे बात शुरू करता है, हमारी कमजोरी पर हम भड़क जाते हैं. अब इसको कर्ज़ से जोड़िए. जो विनम्र हैं, संभव है भावुक होकर अपने परिवार से अपना कष्ट कह दें. जो विनयशील हैं, उनके भीतर खुद के छोटा दिखने का डर नहीं रहता. वह भी अपना संकट परिवार से कह देते हैं, लेकिन जो गुस्से और अहंकार से भर गए हैं, वह संकट में भी खुद को खोल नहीं पाते. कर्ज की खाई में धंसते ही जाते हैं! इसलिए जरूरी है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था के प्रति जागरूक बनें. अपने नजरिए रवैया को विनम्र और पारदर्शी बनाएं. इससे जीवन को सुलझाने में मदद मिलेगी. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं. फर्क इससे पड़ता है कि आपका परिवार और आप संकट से कैसे खुद को बचाते हैं!

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