#जीवनसंवाद: घर की राजनीति!

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#JeevanSamvad: रिश्ते, इसलिए नहीं होते कि उन पर अपनी मनमर्जी चलाई जाए. अपने विचार लादे जाएं. रिश्ते तो इसलिए हैं कि उन पर जिंदगी की कमीज़ आसानी से टांग दी जाए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 17, 2020, 12:02 AM IST
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घर में घटित होने वाले तनाव को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया. भारत में हर साल होने वाली आत्महत्या के केंद्र में घर का तनाव है. इसके दूसरे बड़े कारण भी हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण घर के तनाव को ठीक से नहीं संभाल पाना है. जीवन संवाद में हम निरंतर इस बात की चर्चा करते रहे हैं कि घर के तनाव को लंबे समय तक अनदेखा करने से मन के घाव गहरे होते जाते हैं. कोई इमारत एक दिन में खंडहर नहीं बनती. हर दिन की उपेक्षा उसे खंडहर बनने की ओर धकेलती है. जीवन की भी यही कहानी है!


पटना, बिहार से नरेंद्र सिंह ने लिखा है, 'राजनीति पर अधिक ध्यान देने से केवल देश की दूसरी गतिविधियां ही प्रभावित नहीं होतीं, बल्कि हमारे जीवन पर भी उसका अच्छा असर नहीं होता. घर की राजनीति कहीं अधिक कष्टकारी होती है. राजनीति की ओर हमारा ध्यान इतना ज्यादा है कि हम रिश्ते, घर, परिवार सब जगह सरल स्नेह और आत्मीयता को छोड़कर राजनीतिक तरीके से निर्णय लेने लगे हैं.'

थोड़ा ठहरकर सोचेंगे हम तो पाते हैं कि यह घर-घर की कहानी बनती जा रही है. सास-बहू के रिश्ते तल्ख ही होते जा रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे पिता-पुत्र के संबंधों में तनाव बढ़ता जा रहा है. रिश्ते, इसलिए नहीं होते कि उन पर अपनी मनमर्जी चलाई जाए. अपने विचार लादे जाएं. रिश्ते तो इसलिए हैं कि उन पर जिंदगी की कमीज़ आसानी से टांग दी जाए. जो रिश्तों के अर्थ को भूलते जाते हैं, अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए वह अपने लिए खाई बनाते जाते हैं, जिसमें अंततः उन्हें ही गिरना पड़ता है.

घर की राजनीति सबसे अधिक खतरनाक है. जब भाई-बहन का मनमुटाव इतना बढ़ जाता है कि वह भीतर घुटन पैदा करने लगे, तो जरूरी है घर में रोशनदान हों. पहले पिता, अगर वह खिड़कियां न खोल पाएं, तो चाचा /चाची /मौसेरे /चचेरे रिश्ते इसलिए ही होते थे कि वह समय रहते खिड़कियां और दरवाजे खोल सकें. लेकिन बढ़ते शहरीकरण, अंधी आंखों से बाजार के दिखाए रास्ते पर चलता समाज अपने मूल्यों को भूलता ही चला जा रहा है. हम भी सबकुछ भूलते जा रहे हैं. लॉकडाउन के कारण बहुत बड़ी संख्या में मुझे परिवार, निजी रिश्तों के अध्ययन का अवसर मिला. जितना मैं समझ पा रहा हूं, देख पा रहा हूं उन सबका निचोड़ है, छोटे-छोटे अहंकार का बड़ा और बेकाबू होते जाना.



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कहीं छोटा भाई/बहन परेशान हो गए कि बड़े उसकी बात ही नहीं सुनते. दूसरी ओर ऐसे बड़े भाई/बहन भी बड़ी संख्या में हैं, जिनकी बस इतनी शिकायत है कि छोटों के मन में उनके लिए आदर नहीं. बुजुर्ग होते पिता पुराने वृक्ष जैसे होते जाते हैं. चाहकर भी हवा की बांह नहीं थाम सकते! मां के अपने संकट हैं. जो माता-पिता खुद नैतिक आधार को अपनी छोटे-छोटे फायदे के लिए छोड़ चुके होते हैं, उनकी भावुकताभरी बातों के लिए किसके पास समय होगा. कोरोना वायरस ने हमारे कमजोर होते रिश्तों की पोल खोल दी है. अगर समय रहते हमने इसे नहीं संभाला तो संभव है अगली बार इतनी स्पष्ट चेतावनी हमें न मिले.
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