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#जीवनसंवाद : जो साथ नहीं हैं (दूसरी किश्त)

#जीवनसंवाद : जो साथ नहीं हैं (दूसरी किश्त)

हमें संबंधों को 'दूर दृष्टि दोष' से बचाना होगा. उम्र बढ़ने के साथ जैसे सेहत के प्रति हम सजग होते हैं, कुछ वैसा ही रिश्तों के लिए भी जरूरी है!

पहले अंक में आपने पढ़ा कि हम अपने समीप रहने वालों से धीरे-धीरे अनजाने ही कैसे दूर होते जाते हैं. यह प्रक्रिया इतनी 'धीमी' है कि कई बार हमें जब तक इस बात का एहसास होता है, रिश्तों की नौका डूब चुकी होती है. इसलिए, जीवन के प्रति सचेतन दृष्टिकोण जरूरी है. किसी भी संबंध में हम 'सब कुछ ठीक है', मानकर नहीं चल सकते. किसी भी रिश्ते को कम आंकने, 'यह सदा हमारे पास रहेगा' मानने की गलती नहीं कर सकते. यह खतरा उठाने की बेवजह जरूरत नहीं है.

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हमसे जो किसी कारणवश दूर हुए. छिटक गए, उसमें ही दोनों पक्षों की ओर से गलती की गई हो यह भी हमेशा नहीं होता. कई बार किसी एक पक्ष को अपने सही होने का भ्रम इतना प्रबल होता है कि दूसरे को सहज भाव भी नहीं दिया जाता.

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आंखों में दो तरह के दोष होते हैं. पहला दूर दृष्टि दोष. इसमें दूर की चीजें तो ठीक दिखाई देती है लेकिन निकट की चीजों को देखने में समस्या आती है. दूसरा, निकट दृष्टि दोष. इसमें निकट की चीजों को आसानी से देखा जाता है लेकिन दूर की चीजें स्पष्टता से दिखाई नहीं देतीं.
हम यहां जिस संदर्भ में रिश्तों की बात कर रहे हैं, उसमें दूर दृष्टि दोष प्रासंगिक है. जैसे इसमें दूर की चीजें तो ठीक दिखाई देती हैं, लेकिन निकट की चीजों को देखने, समझने में असुविधा होती है, वैसे ही संबंधों के विषय में होता है. हम आसानी से सुलभ, अपने समीप अपने परिजनों को लंबे समय तक निकटता के कारण अनेक अवसरों पर ठीक से नहीं समझ पाते. छोटे-छोटे मतभेदों को मनभेद में बदलते जाते हैं.
इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम लिया होता है कि जो दूर है, उसके 'दूर' होने की आशंका तो बनी ही रहती है, लेकिन इसके साथ ही जो निकट हैं, उन्हें ठीक से नहीं संभाल पाने के कारण उनके भी दूर हो जाने का खतरा बढ़ता जाता है!

इसलिए, यह बहुत जरूरी है कि हम हमेशा अपने साथ रहने वालों के प्रति सजग रहें. उनके भीतर कभी भी इस बात का संदेश ना जाए कि उनकी सेवाओं को काम आंक रहे हैं. वह हमेशा हमारे साथ हैं, इस बात को कभी भी अपनी सुविधा के लिए नहीं बनाना चाहिए. इस रवैये से संबंधित लोगों के प्रति हमारे व्यवहार, स्नेह, आत्मीयता में एक तरह की लापरवाही आ जाती है. साथ होने का अर्थ कभी भी हमेशा साथ होना नहीं है.
कोई भी व्यक्ति जो आपके साथ है वह अलग-अलग कारणों से है. इसलिए उसके प्रति भी वैसा ही नियमित, सजग आचरण जरूरी है जैसा उनके प्रति जो हमारे साथ नहीं हैं. आपको एक अनुभव के साथ छोड़े जा रहा हूं.


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हमारे एक मित्र अपने चार भाइयों में से एक भाई के साथ बचपन से रहे. माता-पिता भी इनके साथ थे. मैंने हमेशा महसूस किया कि अपने बाकी दो भाइयों के प्रति इनके मन में गहरा प्रेम था. उन दोनों की दुनिया को सरलता से दिख जाने वाली गलतियों के प्रति भी यह मित्र मौन रहा करते थे. जिस भाई के साथ रहते थे उसकी छोटी-छोटी चीजें भी उन्हें असहज कर देती थीं. जिनके साथ वह बचपन से रहे, विवाह हुआ. उनके साथ संबंध अंततः ऐसे मोड़ पर आ गए, जहां केवल दुआ सलाम की गुंजाइश होती है. जबकि बाकी दो के साथ उनके संबंध बहुत हद तक वैसे ही हैं,जैसे पहले थे.
यह एक किस्म का दूर दृष्टि दोष है. संबंधों में दूर दृष्टि दोष ही अधिक नुकसानदायक होते हैं. इसलिए आंखों की तरह ही संबंधों का भी सजगता, आत्मीयता और सावधानी से खयाल रखना जरूरी है.


पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

Tags: Dayashankar mishra, JEEVAN SAMVAD

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