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#जीवनसंवाद: अपमान सहने की क्षमता!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 10:19 AM IST
#जीवनसंवाद: अपमान सहने की क्षमता!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: गांधी अपमान को इस तरह सहते हैं कि महात्‍मा हो जाते हैं. नेल्‍सन मंडेला ऐसे स्‍वीकार करते है कि शांति पुरुष हो जाते हैं. श्रीकृष्‍ण इस तरह सहते हैं कि सौ तक गिनते रहते हैं.

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  • Last Updated: November 19, 2019, 10:19 AM IST
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अपमान सहने की हमारी क्षमता से ही तय होता है कि जीवन के प्रति हम कितनी गहराई रखते हैं. बड़ी संख्‍या में लोग ऐसे मिल जाएंगे जो क्रोध को अपनी आत्‍मा की सतह पर लिए घूमते रहते हैं. ऐसे लोग किसी भी बात पर नाराज हो सकते हैं. इनकी भावना हमेशा आहत होने को तत्‍पर रहती है. बात को जाने, समझे बिना अपनी धारणा बना लेने से यह खतरा हमेशा रहता है. लेकिन इसके साथ ही जीवन के प्रति व्‍यापक दृष्टिकोण, धैर्य की कमी चीज़ों को सहने की क्षमता कम करती जाती है.

जीवन के प्रति गहरी आस्‍था रखे बिना उससे कुछ भी हासिल करना आसान नहीं. अपमान सहने की क्षमता अनमोल गुण है. जीवन में ठुकराए जाने, अपमान सहे बिना कुछ हासिल करने के उदाहरण बहुत कम हैं. असल में हमारे कुछ होने के अहंकार को चोट लगे बिना हम कुछ नया करने की ओर बढ़ते नहीं हैं.

मैं यहां जिस अपमान को सहने की बात कर रहा हूं कि वह अन्‍याय नहीं है. अन्‍याय अलग बात है, अपमान अलग. आपके मौलिक अधिकार आपसे छीन लिए जाएं, यह अन्‍याय है. इसमें कोई दुविधा नहीं. लेकिन पिता जी जब यह कह देते हैं कि घर में सबको अपना खर्च खुद उठाना होगा, तो यह हमें अपमान लगता है. आप जिस लड़की/लड़के से प्रेम करते हैं/करती हैं, अगर उसने आपका प्रस्‍ताव ठुकरा दिया तो यह अपमान लगता है. भारत के बारे में बात करें तो यहां हर युवा को यह इतना अधिक प्रभावित करता है कि अपने को ठुकराए जाने से आहत होकर बड़ी संख्‍या में युवा हत्‍याएं कर देते हैं. एक-दूसरे पर एसिड फेंक कर उसका जीवन नष्‍ट कर देते हैं.

अपने श्रेष्‍ठ होने पर हम इतने मुग्‍ध हैं कि दूसरे को यह अधिकार भी नहीं देते कि वह हमें ‘न’ कह सके. एसिड अटैक इस मनोरोग का इसका सबसे सरल उदाहरण हैं.

आप नौकरी के लिए इंटरव्‍यू देकर आते हैं, आपकी जगह‍ किसी और का चयन हो जाता है, तो आपको लगता है, आपका अपमान हुआ. आप जिंदगी भर उस इंसान को याद रखते हैं. उसकी यादों के कबाड़ को मन में भरे बैठे रहते हैं. जिसका कोई अर्थ नहीं. यह भी संभव है कि जिसके कारण आप अपमानित हो रहे हैं, उसे पता ही न हो. उसके पास मौजूद विकल्‍प में आप समाते ही न रहे हों.

मैं दूसरों की नहीं, अपनी बात आपसे साझा करता हूं कि ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ. बल्कि होता ही रहा. मैंने इसे इस तरह स्‍वीकार किया कि अपना रास्‍ता बनाइए. परिचय का अर्थ हमेशा सहायता नहीं है. बस इतनी सी बात हमारा दिमाग स्‍वीकार कर ले तो वह बहुत प्रकार की कुंठा, ओढ़े गए दुख, पीड़ा और तनाव से मुक्‍त रहता है.

गुरु शिष्‍य को सहना ही सिखाता है. हर उस चीज़ को जो उसके भीतर नहीं है, कम है, उससे स्‍वीकार करके ही तो हम आगे जाएंगे.

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अपमान सहना, उस पर प्रतिक्रिया नितांत निजी है, लेकिन इसे सतर्कता से संभालना होता है. यहीं यह कला हो जाती है. गांधी अपमान को इस तरह सहते हैं कि महात्‍मा हो जाते हैं. नेल्‍सन मंडेला ऐसे स्‍वीकार करते है कि शांति पुरुष हो जाते हैं. श्रीकृष्‍ण इस तरह सहते हैं कि सौ तक गिनते रहते हैं.

कुल मिलाकर सहे बिना बहुत दूर का सफर संभव नहीं. सफर अगर हो भी जाए तो उसमें मनुष्‍यता कम से कम कितनी घुली होगी, यह सरलता से कहा जा सकता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 19, 2019, 9:26 AM IST
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