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#जीवनसंवाद: पिता से प्रेम की लुकाछुपी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 3, 2020, 8:00 PM IST
#जीवनसंवाद: पिता से प्रेम की लुकाछुपी!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: स्‍नेह का यह रिवाज अपने तरीके से काम कर रहा था, इसमें सबसे बड़ी बाधा तब आई जब परिवार टूटने लगे. नौकरी के लिए पलायन तेजी से बढ़ा. एक शहर से दूसरे शहर में बसने की कोशिश तेज़ होती गई.

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  • Last Updated: January 3, 2020, 8:00 PM IST
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हम जिस तरह के समाज में रहते हैं. वहां पिता बच्‍चे से प्रेम तो खूब करते हैं लेकिन उसे अभिव्‍यक्त करने में संकोच बरतते रहे हैं. उनका स्नेह आंखों से बरसता है. व्‍यवहार में झलकता है. हां, शब्‍दों में कम आता है.

कुछ समय पहले एक दोस्‍त ने बीमारी के चलते अपने पिता को खो दिया. उन्‍होंने अपने पिता के प्रति प्रेम साझा करते हुए कहा कि न कभी हम पापा से जी भर के प्‍यार का अहसास करा सके, न पापा! हमारे यहां लाड़ करने का काम मां के हिस्‍से इतना ज्‍यादा हो गया कि कई बार पिता न चाहते हुए भी हाशिए पर चले जाते हैं. अपने यहां पिता को डांटने, कड़ाई से पेश आने का दायित्‍व सौंपा गया है. जो इस समय पिता हैं, संभव है, वह बच्‍चों से खुलकर प्रेम जता रहे हों, लेकिन वह स्‍वयं अपने पिता से प्रेम की लुकाछुपी से इनकार नहीं कर सकते.

इससे हुआ यह कि ऐसे पिता जो इस समय दादा/नाना हैं या ऐसा होने की ओर बढ़ रहे हैं, उनके साथ संवाद करने वालों की कमी हो रही है. आप कह सकते हैं कि यह तो हमेशा से था, इसमें नया क्‍या है. पहले संयुक्‍त परिवार में प्रेम करने वालों की कमी नहीं थी. वहां संवाद के लिए समय कम नहीं था. बच्‍चे बंटे नहीं थे. स्‍नेह बंटा नहीं था. बच्‍चों के पास दादा/नाना रहते थे. दादा/नाना को बच्‍चों से फुर्सत नहीं मिलती थी.


इस तरह असल में पिता यानी पुरुष बच्‍चों से स्‍नेह से तो करते थे, लेकिन एक पीढ़ी आगे का होता था. अपने बच्‍चे की जगह उसके बच्‍चों से होता था.

स्‍नेह का यह रिवाज अपने तरीके से काम कर रहा था, इसमें सबसे बड़ी बाधा तब आई जब परिवार टूटने लगे. नौकरी के लिए पलायन तेजी से बढ़ा. एक शहर से दूसरे शहर में बसने की कोशिश तेज़ होती गई.


अब बच्‍चों की सबसे बड़ी मुश्किल उनके पास प्‍यार करने के लिए केवल माता-पिता का होना है. माता–पिता को ही दादा/दादी के हिस्‍से का प्‍यार करना है. बच्‍चों के स्‍नेह, अनुराग में समय की कटौती उनकी प‍रवरिश को कठिन बना रही है.आखिर माता-पिता अकेले कहां से सबके हिस्‍से का स्‍नेह लेकर आएं. उनके लिए यह मुश्किल वक्‍त है. बच्‍चों के दादा/दादी दूसरे शहर में हैं. कोई उनको साथ रखना नहीं चाहता तो कोई चाहकर भी साथ नहीं रह सकता. जरूरी नहीं कि बड़ों को ही सारे समझौते करने के लिए मजबूर किया जाए.

मेरे माता-पिता मेरे साथ नहीं रहते. क्‍योंकि उनको अपना समाज है. उनकी अपनी दुनिया है. उनका रचा संसार उनके शहर में है. इसलिए मैं भी नहीं चाहता कि उनको यहां परिवार का कैदी बना दिया जाए. लेकिन कुछ मित्रों के माता-पिता एक ही शहर में रहते हुए एक-दूसरे से दूर हैं. उनके बीच का स्‍नेह छोटे-छोटे मन मुटाव को पार नहीं कर पाता.

अनेक पिता पुत्र अपने स्‍नेह को प्रकट नहीं कर पाते. उनके बीच संवाद के पुल कभी बने ही नहीं. अब जबकि ऐसे पिता दादा बन चुके हैं, अपने बच्‍चे के बच्‍चों से दूर हैं, उन्‍हें कौन प्रेम करेगा. उन्‍हें कौन दुलार करेगा.


इसलिए, आपसे निवेदन है कि अपने माता-पिता से प्रेम को बढ़ाइए. संवाद के पुल टूट गए हैं तो उन्‍हें जोडि़ए. मां तो आपसे कहीं अधिक जुड़ी हैं, लेकिन पिता को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता.

चलते-चलते एक छोटा सा किस्‍सा
एक लेखक, कवि बेटे ने सुबह पिता को कुछ खोजते हुए देखकर पूछा- पापा क्‍या खोज रहे हैं. पिता ने कहा, नेल कटर. बेटे ने कहा, नाखून तो मेरे भी बढ़ गए हैं. पिता ने कहा, हां बेटा, तुम्‍हारे नाखून के लिए ही उसे तलाश रहा हूं. पिता ऐसे ही होते हैं. उन्‍हें खूब सारे दुलार, लाड़ और स्‍नेह दीजिए.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 27, 2019, 2:09 PM IST
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