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#जीवनसंवाद: बच्‍चे, मोबाइल और सवाल!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 20, 2019, 9:31 AM IST
#जीवनसंवाद: बच्‍चे, मोबाइल और सवाल!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: इन दिनों माता-पिता यह कहते सुने जाते हैं, 'मोबाइल ले लो, लेकिन हमें थोड़ी देर चैन से रहने दो.' हम बच्‍चों को मोबाइल के सहारे छोड़कर एक साथ गई गलतियां कर रहे हैं.

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  • Last Updated: December 20, 2019, 9:31 AM IST
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हम बच्‍चों की किस बात से सबसे ज्‍यादा खुश, परेशान होते हैं. खुश इस बात से कि हम उन्‍हें जो कहें, वह चुपचाप मान लें. वैसा ही करते जाएं. परेशान इस बात से होते हैं कि वह इतने सवाल क्‍यों करते हैं! हमारे देश में इस समय एक नया चलन आया है. हम बच्‍चे के लिए भी स्‍मार्टफोन लेने लगे हैं. हम ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि हमारे मन में यह भाव होता है कि इससे बच्‍चा अपनी दुनिया में व्‍यस्‍त रहेगा. हम अपनी दुनिया में. इन दिनों माता-पिता यह कहते भी सुने जाते हैं, 'मोबाइल ले लो, लेकिन हमें थोड़ी देर चैन से रहने दो.’हम बच्‍चों को मोबाइल के सहारे छोड़कर एक साथ गई गलतियां कर रहे हैं.

अगर उसमें इंटरनेट है, तो बच्‍चा ऐसी सभी वेबसाइट तक पहुंच सकता है, जो उसकी मानसिक सेहत के लिए उचित नहीं हैं. बच्‍चों के इससे पोर्न वेबसाइट तक पहुंचने का खतरा भी तेजी से बढ़ा है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के कारण अब मशीन आपके व्‍यवहार के साथ ही आपके मन के सवालों तक पहुंचने लगी है. किशोर, वयस्क होते बच्‍चों के साथ उन सभी विषयों पर संवाद कीजिए, जिनके लिए वह दूसरों के पास जा सकते हैं.

एक उम्र के बाद बच्‍चों के शरीर में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को केवल उपदेश से नहीं सुलझाया जा सकता. उनके मन, भावना को पढ़ते हुए इस पर बात करनी जरूरी है. अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो कोई दूसरा करेगा. वह बच्‍चे के मन को कहां ले जाएगा, यह समझना मुश्किल नहीं.


बच्‍चे इन कारणों से भी यौन हिंसा का शिकार हो रहे हैं. इसलिए, वह क्‍या देख रहे हैं. इसका पूरा ख्‍याल रखा जाना जरूरी है. इसके साथ ही उनके शारीरिक, मानिसक बदलाव के प्रति सतर्क रहें. अगर आपको जानकारी नहीं है, तो इसके लिए विशेषज्ञ के पास जाने में एकदम नहीं हिचकना चाहिए.

इसके साथ ही निरंतर मोबाइल के संपर्क में रहने के कारण बच्‍चों की आंखों की सेहत भी प्रभावित हो रही है. उनके चश्‍मों का नंबर बढ़ रहा है. अगर चश्‍मा नहीं था, तो लग रहा है. उनके देखने की क्षमता के साथ आंखों में ड्राइनेस (सूखापन) बढ़ रहा है. इसके साथ ही उनके शरीर के दूसरे हिस्‍सों में भी विकार पैदा हो रहे हैं. उनमें चिड़चिड़ापन, गुस्सा और तनाव बढ़ने का भी इससे संबंध है. बच्‍चों को मोबाइल की लत बड़ों की सिगरेट की लत जितनी ही हानिकारक है.


हमारे एक मित्र के यहां एक सामान्‍य नियम हमने देखा. वह घर पहुंचते ही अपना मोबाइल बच्‍चों के हवाले कर देते हैं. इतना ही नहीं किसी दूसरे के यहां जाने पर भी अगर उनका बच्‍चा जिद कर रहा हो, तो उसे अपना मोबाइल थमा देते हैं. अरे रोना मत भाई, मोबाइल ले लो. इससे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से बढ़ा. हम लोग टोंकते, तो वह यही कहते, अब बच्‍चे को समझाने में दिमाग खपाने से अच्‍छा है, उसे कुछ देर के लिए मोबाइल दे दीजिए. एक बार मोबाइल देने के बाद यह कुछ देर अक्‍सर बहुत देर में बदल जाती.कुछ दिन पहले उनके घर में बच्‍चों ने आंख में दर्द की शिकायत की. वैसे तो यह किसी भी बच्‍चे को हो सकता है. लेकिन इस मामले में डॉक्‍टर ने मोबइल को ही दोषी माना है. बच्‍चे को मोबाइल से सख्‍त दूर रखने को कहा गया.

बच्‍चे को मोबाइल से मिली सबसे खराब आदत उसकी सवाल पूछने की खत्‍म होती क्षमता है. हम बड़े तो हर बात में गूगल करते हुए किताब, शब्‍दकोष से दूर हो ही गए हैं. अब बच्‍चे भी इसी गली में घूम रहे हैं.


बच्‍चा हमसे केवल सवाल नहीं पूछता. इस दौरान वह सवाल करते हुए हमें भी समझने की कोशिश करता है. सवाल कभी अनुचित, गलत नहीं होते. गलत केवल जवाब होते हैं. जो अक्‍सर हम गुस्‍से, उत्तेजना, कुंठा, दुख और परेशानी के साथ देते हैं.

मेरा सुझाव है कि स्‍कूल, कॉलेज और घर में हमें बच्‍चों को बाकायदा इसके लिए प्रशिक्षण देना चाहिए कि सवाल कैसे पूछे जाएं. हम अपनी बात रखें कैसे. यही एक चीज है, जो बच्‍चों को सबसे प्‍यार, स्‍नेह से समझाई जानी चाहिए. बाकी सब वह स्‍वयं सीख लेते हैं.

इस समय का संकट यही है कि हम उन्‍हें बाकी सब सिखा रहे हैं, बस उनके सवालों को टाल/दूसरी ओर धकेल रहे हैं. इसलिए जितना संभव हो बच्‍चे के सवाल का जवाब आप दीजिए. उसे गूगल, दूसरों के सहारे मत छोड़िए़.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 6, 2019, 12:27 PM IST
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