#जीवनसंवाद: हराना बंद कीजिए!

#जीवनसंवाद: हराना बंद कीजिए!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हमेशा एक-दूसरे पर हावी होने का प्रयास असल में भीतर के अहंकार का संकट है. अहंकार हमेशा उसी रूप में नहीं होता जैसा हम परंपरागत रूप में देखते हैं. अहंकार अपने रूप बदल लेता है.

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रिश्तों में सबसे बड़ा संकट एक-दूसरे को पराजित करने का है. कोई अपनी हार मानना ही नहीं चाहता. हम एक-दूसरे से बेहतर और श्रेष्ठ होने की ज़िद में खुद को पराजित करते जाते हैं. लॉकडाउन के दौरान एक-दूसरे के साथ रहने का जो अनुभव हमको हासिल हुआ है, उसमें सबसे बड़ी समस्या एक-दूसरे के साथ तर्कों में उलझते जाना, एक-दूसरे पर हावी होने का प्रयास करते जाना एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है. ‌

रिश्ते हमारे जीवन में लगभग ऑक्सीजन की तरह होते हैं. अगर उनमें सुगंध बनी रहे, खिलने की ललक बनी रहे और अपनी गरिमा, अनुराग को बनाए रख पाएं तो जिंदगी सरलता से खूबसूरत, सुगंधित बनी रह सकती है.

हमेशा एक-दूसरे पर हावी होने का प्रयास असल में भीतर के अहंकार का संकट है. अहंकार हमेशा उसी रूप में नहीं होता जैसा हम परंपरागत रूप में देखते हैं. अहंकार अपने रूप बदल लेता है. कभी वह श्रेष्ठता के गहरे भाव, कभी मैं ही सब कुछ करता हूं तो कभी मेरे बिना तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं जैसे रूपों में हमारे सामने प्रकट होता रहता है. ‌



हमने देखा है बहुत से लोग अक्सर इन शब्दों का उच्चारण करते रहते हैं. शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं. हमारी अभिव्यक्ति इनके सहारे ही होती हैं. आंखों और चेहरे से अपनी बात कहना हम भूलते ही जा रहे हैं. पहले भाव आता है, उससे विचार आता है उसके बाद शब्द बाहर दिखते हैं. ‌




आपने महसूस किया होगा जब हम बहुत अधिक गुस्से में होते हैं तो हमारे होंठ कांपने लगते हैं. कुछ कहते नहीं बनता है. हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है. उस वक्त बिना कहे रुकना संभव नहीं. रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं, 'जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है.'


इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि जब शब्द नहीं होते तो क्रोध दिमाग पर तैरने लगता है. मन की पीड़ा भीतर क्यों जमी रहती है! इसीलिए क्योंकि हमारे पास उसे बाहर लाने के लिए शब्द नहीं होते. इसलिए नहीं आ पाते क्योंकि पीड़ा को कहने में अहंकार के टूटने का भी डर है. बाहर से हम इतने मजबूत जो नजर आते हैं. यह मजबूती केवल बुनी हुई होती है, इसकी कोई नींव नहीं होती. इसलिए, तो हम कह नहीं पाते. संकोच की दीवार भी उन भावनाओं को बाहर आनेे से रोकती है, जो कई बार हमें भीतर ही भीतर दमित करते रहते हैं.

लाओत्से ने बड़ी खूबसूरत बात कही, मुझको कोई हरा ही नहीं सकता. उनके शिष्यों ने कहा आप बड़े विद्वान हैं, लेकिन शारीरिक रूप से बलवान पहलवान तो आप को हरा ही सकते हैं. लाओत्से फिर जोर देकर कहते हैं, कोई मुझे किसी दंगल में नहीं हरा सकता! भले ही कितना ही बड़ा पहलवान क्यों ना हो. यह कैसे होगा पूछने पर वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, मैं पहले ही चारों खाने चित हो जाऊंगा. मैं स्वयं ही हार मान लूंगा. जब मैं खुद ही हार मान लूंगा, तो मुझे कौन हराएगा! मुझे कोई नहीं हरा सकता.

लाओत्से जीवन का गहरा संदेश दे रहे. बहुत ठोस बात कह रहे हैं. हम सब एक-दूसरे को हराने में ही लगे रहते हैं. कोई जब कहता है, देखो मेरी बात सच निकली. तो हम तुरंत कहते हैं, मैंने भी यही कहा था! मैं तो पहले ही कह चुका था. जब हम यह कह रहे होते हैं तो दूसरे को हराने की कोशिश कर रहे होते हैं. इस पल हम दूसरे को हराएंगे, अगले ही क्षण दूसरा हमें हराने में जुट जाएगा!


जीवन को कभी खत्म न होने वाली दौड़ बना लिया है. चूहों की दौड़ में जीतने वाला अंततः चूहों का ही विजेता होता है! चूहों को इस तरह दौड़ते हुए देखकर, उन पर हंसते हुए हम उनके ही जैसे होते जा रहे हैं. जीवन दौड़ने में नहीं है. दौड़ कर हम कहीं नहीं पहुंच सकते, क्योंकि जैसे ही पहुंचेंगे पीछे वाला थोड़ी देर में वहां पहुंच जाएगा, हमें फिर भागना होगा! जिंदगी की इस कहानी को हम सब जानते हैं उसके बाद भी इससे बाहर नहीं निकल पाते. हार -जीत का यह दिलकश चक्रव्यूह हमारा ही रचा हुआ है! इसलिए हमें ही से तोड़ना होगा!

शुभकामना सहित....

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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