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#जीवनसंवाद: डिप्रेशन, आत्महत्या और प्रवीण कुमार!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 20, 2020, 5:15 PM IST
#जीवनसंवाद: डिप्रेशन, आत्महत्या और प्रवीण कुमार!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हर साल भारत में तनाव और अकेलेपन की वजह से बढ़ रही आत्महत्या में अपने प्रियजन को खोने वाले लोग प्रवीण के परिवार की तरह किस्मत वाले नहीं होते. अक्सर हमें उनके नहीं रहने की कहानियां पढ़ने को मिलती हैं.

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रविवार के 'इंडियन एक्सप्रेस' में कुछ साल पहले तक भारतीय क्रिकेट का अभिन्न हिस्सा माने जा रहे प्रवीण कुमार के जीवन पर महत्वपूर्ण सामग्री है. यह उन सभी को पढ़ना चाहिए जिनकी रुचि जीवन और उससे जुड़े विषयों पर है. उनके लिए खास तौर पर जो यह मान बैठते हैं कि कामयाबी संघर्ष का अंत है. जबकि असल में कामयाबी तो संघर्ष का नया अध्याय है. प्रवीण की कहानी में इतने मोड़ हैं कि उस पर बड़ी आसानी से एक फिल्म बनाई जा सकती है. कहानी और उपन्यास भी लिखा जा सकता है.

(क्रिकेटर प्रवीण कुमार की पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

फिलहाल आज हम उनकी जिंदगी के उस हिस्से पर संवाद करेंगे, जिस पर चुप्पी तोड़कर प्रवीण ने समाज की मदद ही की है. भारत डिप्रेशन को बीमारी मानने से भी बहुत दूर है. इसलिए इस पर किसी का ध्यान ही नहीं है. हम जिस चीज को मानते ही नहीं उसके बारे में बात करना तो दूर वह हमारे ख्याल में ही नहीं आता. इसलिए, प्रवीण कुमार ने अपना दर्द साझा करके हमें सजग किया है. घुटन को साझा नहीं करने से जिंदगी संकट में पड़ सकती है. प्रवीण आत्महत्या के किनारे से लौट कर आए हैं. उनकी बात ध्यान से सुनिए!

प्रवीण को 2007 में भारतीय क्रिकेट टीम से बुलावा आता है, उसके बाद वह 2011 तक टीम का सबसे खास हिस्सा बनकर रहे. क्रिकेट के दिग्गज मानते थे कि स्विंग गेंदबाजी में प्रवीण का कोई मुकाबला नहीं. क्रिकेट के चाहने वाले ऑस्ट्रेलिया में भारत को वहां होने वाली त्रिपक्षीय सीरीज के फाइनल में 2008 में प्रसिद्ध जीत के लिए प्रवीण को खासतौर पर याद करते हैं. ब्रिसबेन में एडम गिलक्रिस्ट, रिकी पोंटिंग और माइकल क्लार्क के विकेट निकाल कर प्रवीण ने पहली बार ऑस्ट्रेलिया में सबसे बड़ी एक दिवसीय टूर्नामेंट की जीत भारत के नाम करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. उसके बाद 2011 में इंग्लैंड को उसके घर में प्रवीण कुमार ने दिन में तारे दिखा दिए थे. उस दौरे में कुमार भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे सफल गेंदबाज साबित हुए थे.

praveen kumar
भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा रहे प्रवीण कुमार ने डिप्रेशन और आत्महत्या के ख्याल की बात कबूल की है.


कुल मिलाकर भारतीय क्रिकेट टीम का एक ऐसा चमकदार हिस्सा जिसका नाम इतिहास में अपनी छोटी सी झलक के साथ उपस्थित है. उनके बड़े प्रशंसकों में इंग्लैंड के सबसे सफल बल्लेबाजों में से एक केविन पीटरसन भी शामिल हैं.

कुछ महीने पहले तक वह अपनी जिंदगी को डिप्रेशन से बाहर निकालने के लिए कुछ वैसे ही जूझ रहे थे, जैसे उनकी गेंदबाजी से बचने के लिए बल्लेबाज प्रयासरत होते थे. प्रवीण ने खुद कहा है, भारत में डिप्रेशन को कोई समझता ही नहीं. इसके बारे में कोई कुछ नहीं जानता, जब भारत में यह स्थिति है तो मेरठ में तो निश्चित रूप कोई इस पर बात नहीं करता. पिछले कई वर्षों से प्रवीण क्रिकेट के बाद जीवन मेंं आए अकेलेपन, संवादहीनता से गुजर रहे थे.
प्रवीण कुमार ने माना है कि भरे-पूरे परिवार में बचपन बिताने के बाद अचानक से पत्नी और बच्चों के बीच उनका अकेलापन बढ़ गया. वह कहते हैं, सब घर में सब खाली-खाली लगता है. फिर कोई कब तक अपने घरवालों से ही बात करे. प्रवीण का नया घर शहर से दूर है. इसलिए अगर उनका किसी से बातचीत का मन हो, तो उन्हें अपने रेस्टोरेंट ही जाना होता है. वह कहते हैं यहां (घर पर) कोई संवाद नहीं है.


प्रवीण लगभग उन्हीं सवालों से जूझ रहे हैं जिनका हम जीवन संवाद में पिछले कुछ वर्षों से निरंतर जिक्र कर रहे हैं. अपनोंं से दूरी, संवाद हीनता की स्थिति सारी सुख सुविधाओं के बीच में रूखा और अकेला कर रही हैं. प्रवीण के साथ भी एकदम यही हुआ. ‌उनके लिए भी धन कोई समस्या नहीं है. जैसा तनाव का सामना करने वालेेे अनेक लोगों के बीच देखा गया है.

लगभग दो महीने पहले एक कंपकपाती सुबह में प्रवीण ने अपनी गाड़ी निकाली और रिवाल्वर भी. उसके बाद वह हरिद्वार हाईवे पर निकल पड़े. अपने भीतर बैठे खालीपन, गुस्से और दुनिया के नजरअंदाज किए जाने से दुखी मन के साथ सोचते हैं कि यह सब क्या हो रहा है. अब जिंदगी को अलविदा कह देना चाहिए. तभी उनकी नजर गाड़ी में रखी बच्चों की एक तस्वीर पर जाती है. वह सोचते हैं, मेरे बाद इन फूल जैसे बच्चों का क्या होगा!

तस्वीर कि उस फ्रेम को सलाम! स्नेह की पुकार को प्रणाम! प्रवीण इरादा बदल कर लौट आए. डॉक्टर के पास गए और अपना इलाज शुरू कराया. ध्यान दीजिए, डॉक्टरों ने मिली सलाह है -वह घर से बाहर निकलें, लोगों से मिलें. समाज के कार्यक्रमों में हिस्सा लें. जितना संभव हो संवाद करें. प्रवीण का परिवार खुश किस्मत है कि बच्चों की एक तस्वीर ने उन्हें मौत के मुंह से वापस निकाल लिया.


हर साल भारत में तनाव और अकेलेपन की वजह से बढ़ रही आत्महत्या में अपने प्रियजन को खोने वाले लोग प्रवीण के परिवार की तरह किस्मत वाले नहीं होते. अक्सर हमें उनके नहीं रहने की कहानियां पढ़ने को मिलती हैं.

आप सभी से निवेदन है कि अपने आसपास अपने प्रियजन, सहकर्मी, मित्र रिश्तेदार और उन सभी से जिनसेेे आप प्रेम करते हैं, संवाद कीजिए. उन्हें अकेला मत छोड़िए. जिंदगी बड़ी है इसका अर्थ या नहीं कि उन चीजों को भी हमेशा टालते रहें, जिनसे बहुत सारा फर्क पड़ता है. एक-दूसरे से मिलना, बार-बार मिलना, बात करना. खूब सारी बात करना और दर्द को समझने की चेष्टा करना, ऐसा ही जरूरी काम है.

तनाव, निराशा, रिश्‍तों की गुत्‍थी और आत्‍महत्‍या पर मन की गांठ से जुड़े सवालों के लिए आप हमारी खास पहल जीवन ‘जीवन संवाद’ से जुड़ सकते हैं.  इसके सभी लेख यहां मिलेंगे.  आप हमें अपने सवाल ई-मेल भी कर सकते हैं.

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First published: January 20, 2020, 9:25 AM IST
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