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#जीवनसंवाद: अभिलाषा के पुष्प!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 19, 2020, 12:01 PM IST
#जीवनसंवाद: अभिलाषा के पुष्प!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: हमारे ‘जीवन मूल्‍य’ से जीवन शब्‍द निकल गया है. केवल मूल्‍य बचा है. इसलिए, अभिलाषा के पुष्‍प सुगंधहीन हो गए हैं. जीवन के बगीचे की मुस्‍कान के लिए इनकी सही देखभाल बहुत जरूरी है.

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  • Last Updated: February 19, 2020, 12:01 PM IST
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हमारी चाहतें कहां ठ‍हरती, थमती हैं. वह तो वैसे ही आगे बढ़ती जाती हैं, जैसे मैराथन में सबसे आगे पहुंचने की कोशिश धावक करते हैं. हमारी जिंदगी को अगर मैराथन मान लिया जाए तो अभिलाषा मैराथन में भाग लेने वाले धावकों के बहुत नजदीक पहुंच जाती हैं. एक इच्‍छा से आगे बढ़ते ही मन दूसरे रथ पर सवार हो जाता है. इसमें कुछ भी नया नहीं. आदि मानव के गुफा से लेकर अब हमारे फ़्लैट तक के सफर में नए की चाह का बड़ा योगदान है. हम नए से प्रेम करते हैं. नए के लिए उत्‍सुक हैं. कुछ नया करना चाहते हैं. यह तो सहज प्रक्रिया है. लेकिन हम यहां थोड़े संशय में हैं.

नया करने और नई इच्छा में गहरा अंतर है. हम एक काम करके ऊब गए हैं. तो दूसरा करना चाहते हैं. किसी नए काम में स्‍वयं को डुबोना चाहते हैं. यह नए की आकांक्षा है. यह मन की अभिलाषा तो है लेकिन इसमें दुनिया का ग्‍लैमर नहीं है. इसमें मन की गहराई से आ रही ध्‍वनि को सुनने की कोशिश है. सब जिस रंग में रंगे हैं, उससे उलट दूसरा रास्‍ता पकड़ने की चाहत है.

जहां से संकट आरंभ होता है, वह है- सबको देखकर, संसार के अनुरूप चलने की अभिलाषा. सब ऐसा करते हैं. संसार में ऐसे ही मनुष्‍य की पूछ है. इसलिए हम वही निर्णय करें जिसकी दुनिया सराहना करे तो ऐसी अभिलाषा हमें कहीं पहुंचने में मदद नहीं करेगी.

हम जो भी फैसले कर रहे हैं, सोच-समझ रहे हैं, वह सब एक सरीखी अभिलाषा के पुष्‍प हैं. अगर अभिलाषा मौलिक नहीं है तो जीवन में सुगंध, सुकून और स्नेह सुलभ नहीं हो पाएंगे!




दूसरों की आदत, विचार और निर्णय की नकल हमें कुछ आर्थिक आधार प्रदान कर सकती है, लेकिन हमें उस सुख तक नहीं पहुंचा सकती जो जीवन का आधार है. उस आंतरिक सुख तक तो कभी नहीं, जिसकी कमी से जिंदगी दुख की गहराई की ओर निकल पड़ती है.

कुछ छोटे-छोटे उदाहरण लेते हैं. हम अच्‍छे भले प्रसन्‍नता से एक घर में रहते हैं. कुछ बचत हैं. घर भी पर्याप्‍त है. तभी एक दिन ऐसा होता है कि पड़ोसी नए फ्लैट की सूचना हमें देते हैं. उसी पल से हम बेचैन हो उठते हैं. हमें उसकी सूचना से जितनी खुशी मिलती है, उससे अधिक मन में चिंता बढ़ जाती है.


अरे! हमें भी उतने ही पैसे मिलते हैं. हमने भी तो उसके साथ ही करियर शुरू किया था, लेकिन देखो न वह कहां चला गया. हम कहां रह गए. इसमें मजेदार बात यह होती है कि कई बार वही पड़ोसी आपकी जीवनशैली का मुरीद होता है. उसे लगता है कि आपके जीवन में तो सुकून है. आपके पास ईएमआई (हर महीने कटने वाली कर्ज की रकम ) का बोझ नहीं है. आपके माथे पर हर महीने चिंता की लकीर गहरी नहीं होती. आप नौकरी का चुनाव अपनी पसंद से कर सकते हैं, तनाव को एक स्‍तर के बाद नकार सकते हैं. लेकिन आपका पड़ोसी ऐसा नहीं कर सकता. क्‍योंकि उसकी तो हर चीज़ ईएमआई पर है.

वह आपकी जीवनशैली, सुकून पर फि‍दा है. जबकि आपकी उसकी ईएमआई की क्षमता, जो असल में दुख है. उसकी अभिलाषा में दुबले हुए जा रहे हैं.


ऐसी एक नहीं अनेक अभिलाषा हैं. बल्कि अभिलाषा के पूरे-पूरे गुलदस्‍ते हैं. जीवन की महक यहीं से रूठ जाती है. इसलिए, जितना संभव हो अपने निर्णय और फैसले को अपने अनुकूल बनाइए. अपनी शांति, सुकून और जीवन मूल्‍य के अनुसार.

हमारे ‘जीवन मूल्‍य’ से जीवन शब्‍द निकल गया है. केवल मूल्‍य बचा है. इसलिए, अभिलाषा के पुष्‍प सुगंधहीन हो गए हैं. जीवन के बगीचे की मुस्‍कान के लिए इनकी सही देखभाल बहुत जरूर है. सबका ख्‍याल रखिए. सबकी इच्छा और आकांक्षा का लिहाज कीजिए, लेकिन फैसले केवल अपने कीजिए.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: February 14, 2020, 9:03 AM IST
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