लाइव टीवी

#जीवनसंवाद: खुद से शर्मिंदा नहीं होना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 10, 2019, 11:58 AM IST
#जीवनसंवाद: खुद से शर्मिंदा नहीं होना!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: दुनिया अपने में व्यस्त है. जिनको फर्क पड़ता है, वह आपका साथ दे रहे हैं. हमारे साथ सबसे बड़ा संकट यही होता है कि हम जिनसे प्रेम करते हैं, जिनके लिए जीते हैं, उनके अतिरिक्त सबकी बातें सुनते हैं!

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 10, 2019, 11:58 AM IST
  • Share this:
कुछ समय पहले मध्य प्रदेश, इंदौर से खबर आई, बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाले युवा ने नौकरी जाने के बाद आत्महत्या को चुना. उनके पास एक शानदार कर्ज मुक्त घर, पिता की मां को मिलने वाली अच्छी पेंशन, गांव में जमीन भी थी. वह नौकरी जाने को अपनी प्रतिष्ठा से इतना अधिक जोड़ कर देख रहे थे कि उसके बिना अस्तित्व की कल्पना ही नहीं कर सके. इन दिनों युवाओं के बीच यह परेशानी अधिक देखी जा रही है कि वह अपने 'स्टेटस' को लेकर बहुत अधिक तनाव में रहते हैं. उनके लिए उनका 'स्टेटस' जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान होता जा रहा है.

हम अपने 'कुछ' होने को अपने से भी ज़रूरी मानने लगे हैं. स्वयं से अधिक मूल्यवान किसी भी चीज़ को मानने पर जीवन के लिए उसका परिणाम भला नहीं होता.


यहां जिनके बारे में बात की जा रही है, उनके बारे में दो बातें स्पष्ट करना हूं. पहली वह एक अच्छी नौकरी में थे. उनकी नौकरी इसलिए गई, क्योंकि कंपनी ने अपनी संबंधित यूनिट बंद कर दी थी. दूसरी, उनके सामने आर्थिक संकट नहीं था. कुछ दिन जमा पूंजी, विरासत में मिली संपदा के आधार पर निकाले जा सकते थे. सब कुछ आसानी से हो सकता था, अगर उन्होंने इसे अपने 'अहंकार' (ईगो) से नहीं जोड़ा होता.

आपको यह बात विचित्र लग सकती है कि इसे अहंकार क्यों कहा जा रहा है. यह तो सहानुभूति का विषय होना चाहिए. निश्चित रूप से यह सहानुभूति का विषय भी है, लेकिन निश्चित सीमा तक. मन के व्यवहार को जानने, समझने के लिए उसके विभिन्न स्तरों तक पहुंचना जरूरी है.

हम पद, धन से हासिल होने वाली प्रतिष्ठा को लेकर ज्यादा सजग, संवेदनशील हो गए हैं. इसे ऐसी चीजों से जोड़ कर देखते रहते हैं, जिन पर हमारा नियंत्रण बेहद सीमित होता है. मैंने अपने जीवन में ऐसे अनुभवों का सामना किया है, जहां ऐसे प्रश्न अक्सर उपस्थित हो जाया करते थे. लोग क्या कहेंगे? यह हमारे मन का सबसे बड़ा रोग है! अरे, लोगों को सांस लेने की फुर्सत नहीं है.


दुनिया अपने में व्यस्त है. जिनको फर्क पड़ता है, वह आपका साथ दे रहे हैं. हमारे साथ सबसे बड़ा संकट यही होता है कि हम जिनसे प्रेम करते हैं, जिनके लिए जीते हैं, उनके अतिरिक्त सबकी बातें सुनते हैं!

नौकरी जाने पर, आर्थिक संकट गहराने पर माता-पिता कहते हैं सब ठीक हो जाएगा. परिवार कहता है हम आपके साथ हैं. सब मिलकर लड़ेंगे. लेकिन आप उनकी प्रतिक्रिया, व्यवहार से संचालित होते हैं, जो केवल आपकी कृत्रिम प्रतिष्ठा से जुड़े हुए हैं. ऐसे लोगों के लिए एक बड़ा सुंदर शब्द है, शुभचिंतक!
Loading...

यहां सुनें पूरा जीवन संवाद


शुभचिंतक के लिए मेरी परिभाषा है, आपके शुभ में आपकी चिंता करें. जब आपका समय अनुकूल है, उनके अनुकूल है, तब आपके चिंतक होते हैं. ऐसे लोगों को शुभचिंतक कहा जाता है. अपने जीवन की दशा-दिशा को जब हम बहुत अधिक शुभचिंतकों के हिसाब से संचालित करने लगते हैं, तो हमारा अहंकार भी बड़ा होता जाता है. खुद को सिकंदर समझते देर नहींं लगती. मुश्किल समय के लिए हम खुद को तैयार रखना ही भूलते जाते हैं. परिस्थितियां कैसी भी हों हमें हार नहीं माननी है. मनुष्य का सबसे बड़ा दायित्व विपरीत परिस्थितियों से मुकाबला करना है. परिवार, मित्र और समाज से मदद लेने का अर्थ छोटा होना नहीं. जितनी जल्दी हम इसे समझ लेंगे, उतनी ही शीघ्रता से स्वयं को अनचाहे संकटों से मुक्त कर लेंगे.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें: 

#जीवनसंवाद: मन की काई!

#जीवनसंवाद: टूटे हुए पुल!

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: October 10, 2019, 7:39 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...