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#जीवनसंवाद: डर का सफर!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 19, 2020, 11:59 AM IST
#जीवनसंवाद: डर का सफर!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: पहले रिश्‍तों के बनने का डर, फि‍र टूटने की आहट. पहले डर के अंधेरे में शिक्षा, उसके बाद किसी स्‍थाई ठिकाने की खोज और अंत में उसके छिटक जाने के डर की लंबी यात्रा. जिंदगी को हमने डर का यात्री निवास बना दिया है.

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  • Last Updated: February 19, 2020, 11:59 AM IST
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जिंदगी को हमने डर का यात्री निवास बना दिया है. मन में भय की घंटियां निरंतर बजती रहती हैं. हमने इसे अपना स्‍वभाव बना लिया है. पहले रिश्‍तों के बनने का डर, फि‍र टूटने की आहट. पहले डर के अंधेरे में शिक्षा, उसके बाद किसी स्‍थाई ठिकाने की खोज और अंत में उसके छिटक जाने के डर की लंबी यात्रा. जिंदगी को हमने डर का यात्री निवास बना दिया है.

हमारे मन का यह हाल तब है, जब हम स्‍वयं को हर समय आधुनिक कहते रहते हैं. हर तीसरे चौथे दिन हमें अंतरिक्ष में घर बनाने की खबरें मिलती रहती हैं. विज्ञान नए अभियान की तैयारी में है. हम स्‍वयं को तकनीक प्रेमी और जागरूक समाज के रूप में देखे जाने के हर दिन दावे करते रहते हैं. उसके बाद भी यह माहौल है कि डर जरूरी है!

हम भूल जाते हैं कि डर हुआ आदमी ही दूसरे को डराता है. जिसके मन में अभय है, वह कभी दूसरे को डराने की कोशिश नहीं करता. जिसके पास सब कुछ है, वह दूसरे को अपने होने से आतंकित नहीं करता. लेकिन, जिसके पास कुछ नहीं, वह दूसरे के मन पर सबसे अधिक अधिकार की कोशि‍श में रहता है. धीरे चलना. ठहकर जीवन जीना, यह सब बातें हम भूलते जा रहे हैं.
इसलिए हम अक्‍सर हड़बड़ी में रहते हैं. घबराए हुए. कुछ परेशान से. अपने आसपास आप अधिकांश लोगों को अक्‍सर ऐसे ही पाते हैं. आपके समीप जो भी मन हैं (क्‍योंकि हर कोई केवल एक मन ही है) थोड़ा ध्‍यान से उन्‍हें देखिए तो आप सरलता से समझ जाएंगे कि सारे मन कितने उथले होते जा रहे हैं. गहराई की सारी जिम्‍मेदारी मानिए हमने केवल समंदर को दे दी है. बाकी सारे उथली सतह पर आ गए हैं.



जिंदगी सिवाय कड़ियों के कुछ नहीं. सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इस बात को हम जितनी जल्‍दी समझ लेते हैं. उतनी ही शीघ्रता से हमारे डर, भय दूर होते जाएंगे. जब तक आप भीतर से निर्भय नहीं होते हैं. बाहर से बुलेट पूफ्र जैकेट पहनने से कुछ नहीं होने वाला.



हम कहीं सबसे अधिक कमजोर हैं तो वह है, मन! जब तक हमारा मन भयभीत है, हम किसी भी किले में जाकर क्‍यों न रहने लगें, हम जीवन सुख के दरवाजे तक नहीं पहुंच सकते. असली जीवन वहां से आरंभ होता है, जहां से हमारे डर खत्‍म होते हैं. आइए, डर के बारे में सबसे खतरनाक मिथक से मिलते हैं.

हम अक्‍सर ऐसे लोगों को साहसी समझते हैं, जो जंगल/खतरनाक जगह में जाने से न डरें. अगर ऐसे लोग अभय को प्राप्‍त हुए होते तो निर्भय डाकू होते जबकि वह तो स्‍वयं भयभीत हैं. इसलिए डर को शरीर की शक्ति से बाहर देखते की जरूरत है. जंगल के जहरीले सांप, खतरनाक जानवर से जो नहीं डरता जरूरी नहीं, उसके भीतर अभय हो.

डर से बाहर होने का अर्थ है- मानसिक डर से मुक्ति. मन में किसी का डर न होना. जिनसे जीवन को भय है, उससे डरना तो सहज है. यह जीवन बोध है. यह असली संकट नहीं.


असली संकट है, मानसिक डर. वह खोने का डर जो हमने किसी तरह पा लिया है. संघर्ष का डर. छाया में रहते हुए हम धूप से डरने वाले समाज बन गए हैं. अनर्थ की आशंका में डूबे समाज बनते जा रहे हैं. इनसे मुक्‍त हुए बिना अपने मन को निर्भय नहीं बनाया जा सकता. यह डर हमारे सहज विवेक पर सबसे बड़ा संकट हैं.
इसलिए, अपनी जीवन आस्‍था को गहरा, प्रकाशवान और साहसी बनाइए. सारे डर विश्‍वास की कमी से उपजते हैं, स्‍नेह और आस्‍था की रोशनी में गायब हो जाते हैं.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: February 17, 2020, 12:37 PM IST
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