लाइव टीवी
Elec-widget

#जीवन संवाद: आत्मा के माली!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 27, 2019, 9:38 AM IST
#जीवन संवाद: आत्मा के माली!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: माता-पिता अपेक्षाएं तो खूब सारी कर रहे हैं, लेकिन वह भूल जाते हैं कि इनके साथ बच्चे को संभालना भी जरूरी है. बच्चों का कंपटीशन पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 27, 2019, 9:38 AM IST
  • Share this:
हम छोटे-छोटे गमलों की देखभाल के लिए भी माली की सेवाएं लेते हैं. वह तिथियों पर आकर उनकी खोज खबर लेता रहता है. गांव में माली नहीं होते, वहां पर्यावरण से थोड़ी सहजता होती है. मित्रता होती है. लेकिन शहरों में हर छोटे-बड़े फ्लैट में मालियों की सेवाएं ली जाती हैं. यह उदाहरण इसलिए चुना गया कि हमने अपने छोटे से छोटे कामकाज के लिए सलाहकार और विशेषज्ञ नियुक्त किए हुए हैं. बस आत्मा और मन की ओर से हम सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं.

यही कारण है कि भारतीयों का मानसिक स्वास्थ्य बहुत तेजी से 'खराब' से 'गंभीर' की श्रेणी में जा रहा है. खराब को तो मिलजुल कर किसी तरह ठीक किया जा सकता है लेकिन गंभीर को बहुत अधिक सुरक्षित देखभाल की आवश्यकता होती है. बहुत पुरानी बात नहीं है, जब माता-पिता, रिश्तेदार और बड़ी संख्या में दोस्त हमारी आत्मा के माली का काम किया करते थे. मन की सफाई के साथ उसकी छंटाई, देखभाल करते थे. धीरे-धीरे अपेक्षा की खरपतवार ने अपनों से हमारी दूरी कई गुना बढ़ा दी!

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे सिंधौली और सीतापुर में बच्चों के साथ संवाद का अवसर मिला. यह देखकर प्रसन्नता हुई कि बच्चे अब खुलकर डिप्रेशन, निराशा और आत्महत्या जैसे प्रश्नों पर संवाद कर रहे हैं. चिंता की बात यह है कि शहर से सुरक्षित माने जाने वाले कस्बे और गांव में भी यह संकट हमारी समझ से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है. छोटे-छोटे बच्चे पूछ रहे हैं जीवन में इतना संघर्ष क्यों है. बच्चे पूछ रहे हैं कम नंबर आने पर भी जीवन में कुछ उद्देश्य बाकी रह जाता है? उनकी घबराहट आत्मा तक पहुंच जाती है, जब उनकी ओर दुलार, प्रेम और स्नेह की सप्लाई बाधित होने लगती है.


माता-पिता अपेक्षाएं तो खूब सारी कर रहे हैं, लेकिन वह भूल जाते हैं कि इनके साथ बच्चे को संभालना भी जरूरी है. बच्चों का कंपटीशन पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गया है. उसे एक साथ बहुत सी चीजों से 'लोहा' लेना पड़ रहा है. 10वीं, 12वीं की पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं से भी जूझ रहा है. उसके ऊपर तनाव गहराता ही जा रहा है. स्कूल खुश है कि उनके बच्चे टॉप कर रहे हैं. अभिभावक खुश हैं कि बच्चा जी जान से लगा हुआ है. स्कूल बाजार का हिस्सा हैं. अभिभावक बाजार के सहारे अपने भविष्य की चिंता में डूबे हैं.

हम अभिभावक के नजरिए का सम्मान करते हैं. उनके सपनों के प्रति सद्भावना रखते हैं. लेकिन ऐसा करते हुए हम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सेहत और मनोविज्ञान से मुंह नहीं मोड़ सकते.
कबीर ने कितनी खूबसूरत बात कही है 'पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय!'

Loading...

मैं बहुत ईमानदारी के साथ आपसे साझा कर रहा हूं कि मेरी परवरिश इसी सिद्धांत के सहारे हुई. बेहद सीमित साधनों के बीच हुई. मैं इस काम को आगे बढ़ा रहा हूं. बच्चों से अपनी अपेक्षाओं को सीमित रखते हुए उन्हें यह आजादी देनी ही पड़ेगी कि वह कहां जाना चाहते हैं, क्या करना चाहते हैं.

उन्हें यह भरोसा दिलाना होगा कि उनकी असफलता में भी हम उन्हें पलकों पर बिठाने का हुनर रखते हैं. बच्चों के प्रति अपने प्रेम को परीक्षा परिणामों से हम जितना दूर रख पाएंगे, हमारा जीवन तनाव, निराशा, मनोविकार और आत्महत्या के खतरे से उतना ही दूर रहेगा

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें : 

#जीवनसंवाद: विवाह का घोषणा पत्र और पति-पत्नी!

#जीवनसंवाद: एक-दूसरे से जुड़ने की क्षमता...

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 26, 2019, 9:01 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...