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#जीवनसंवाद: मन की चोट और स्नेह!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 3, 2020, 3:19 PM IST
#जीवनसंवाद:  मन की चोट और स्नेह!
जीवन संवाद

एक-दूसरे को छोड़कर, एक-दूसरे से कटकर हम सुखी, आनंदित नहीं रह सकते. अंतत: हमें एक-दूसरे से जुड़ना ही होगा. जिंदगी की यही रीत है. हम इस रीत से अलग रिवाज बनाने निकल पड़े हैं.

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  • Last Updated: January 3, 2020, 3:19 PM IST
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ठंड के मौसम में शरीर की पुरानी चोट अक्‍सर दर्द देती है. मौसम बदलता है, हम उसे भूल जाते हैं. शरीर की चोट की याद आती-जाती रहती है लेकिन कुछ चोट गहरे असर करती हैं. वह न तो शरीर से मिली होती है, न ही उसका असर शरीर तक होता है.

मन को लगने वाली चोट का दर्द गहरा होता है. आत्‍मा तक उतर जाता है. जो जख्‍म मन में गहरे उतर जाता है, उसका रंग बड़ी मुश्किल से उतरता है. इसलिए, ऐसी चोट के प्रति स्‍वयं के साथ परिवार, मित्र और उन सभी की सजगता चाहिए, जो आपसे प्रेम करते हैं.

भोपाल से एक पाठक की प्रतिक्रि‍या ने शुक्रवार की शाम मेरी आंखें नम कर दीं. उन्‍होंने बताया, वह शोक में डूबे अपने परिवार (पड़़ोसी) में चाचा जी को दो-तीन महीने से जीवन संवाद के लेख साझा कर रहीं थी. क्‍योंकि वह खुद उन्‍हें सांत्‍वना देने की स्थिति में नहीं थीं. इसलिए, वह हर दिन एक लेख उन्‍हें भेज देतीं. यह सिलसिला दो महीने से जारी था.

कुछ दिन पहले जब वह उनसे मिलीं तो चाचा जी ने कहा कि उनको ‘जीवन संवाद’ से जीवन की प्रेरणा मिली. दुख तो आया है, लेकिन उससे आंखें चुराकर जिंदगी नहीं जीना. उससे लोहा लेना है. जीना ही है! इसका कोई विकल्‍प नहीं.यह भावुक क्षण था. अगर मेरा लेखन किसी के लिए इतना भी कर पा रहा है तो मेरे लिए यह किसी भी काम से बढ़कर है!

कुछ महीने पहले इन्‍होंने अपने बेटे को खो दिया. बेटा आईआईटी की तैयारी का तनाव बर्दाश्‍त नहीं कर पाया. वह संभवत: अपनी पीड़ा उनसे कह नहीं पाया. कहने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया. उसने जीवन का संघर्ष आरंभ करने से पहले ही हार को स्‍वीकार कर लिया. उसने आत्‍महत्‍या को चुन लिया.


सत्रह बरस की उम्र क्‍या होती है. काश! हम बच्‍चों को समझा सकें कि वह हमें आसानी से मना कर सकते हैं. हम उनकी न सुनने के लिए तैयार हैं. इसके साथ ही माता-पिता को भी यह समझने की जरूरत है कि बच्‍चा अगर उनके सुझाए रास्‍ते पर नहीं चल पा रहा है तो इसमें कोई गलती नहीं. बहुत संभव है कि चीजें उसकी समझ/क्षमता से ही बाहर हों.किसी भी परीक्षा, सपना को बच्‍चे की जिंदगी से मूल्‍यवान नहीं समझना है. यह बात जितनी माता-पिता को समझनी जरूरी है, उतनी ही बच्‍चों को भी.

हमें स्‍वीकार करना होगा कि कोशिश करने की सीमा है. बिजली आसमान में चमकती है, जमीन पर नहीं. इसके मायने यह हैं कि जो कुछ चुना गया है, उसकी दिशा ठीक होनी जरूरी है. एक बच्‍चा जिसका इंजीनियरिंग की पढ़ाई में न लग रहा हो, वह अर्थशास्‍त्री, लेखक, अभिनेता, वैज्ञानिक बनने की क्षमता रखता है.


इसलिए दिशा सही होना जरूरी है. बच्‍चा जो चुन रहा है, उसमें सफलता से अधिक असफलता की संभावना है. इसलिए, माता-पिता को उसकी असफलता के साथ खड़े रहने के लिए तैयार होना चाहिए. जब हम बारिश के लिए मानसिक रूप से तैयार रहते हैं तो भीगने पर भी उसका कष्‍ट नहीं होता. मन का अभ्‍यास जीवन के संघर्ष को सरल करता है.

इन सबके बीच अगर दुख किसी कारण आ ही गया तो उसका सामना करने के लिए मन के जिरह बख्‍तर (कवच) बनाने जरूरी हैं. ऐसे लोग जिनसे मन का दर्द साझा किया जा सके, बिना संकोच के. सब कुछ उड़ेलना आसाना हो, जिनके साथ. उनका हाथ सलीके से थामे रहिए. इस प्रेम, स्‍नेह से बढ़कर कुछ नहीं.

और हां, जिन्‍हें लगे कि ऐसा साथी तलाशना मुश्किल है, उनके लिए ‘जीवन संवाद’ है. अपने मन की गुत्‍थी, दुख की गठरी हमारे ई-मेल, फेसबुक मैसेंजर पर लाद दीजिए.

‘आसान है’, इस वाक्‍य को दोहराते रहने से जिंदगी के घुमावदार, खतरनाक मोड़ से आसानी से गुजरा जा सकता है. ‘जीवन संवाद’ में हम हमेशा कहते हैं, ‘बच्‍चे आपसे हैं, आपके लिए नहीं’. इसे जीवन मूल्‍य बनने का समय आ गया है.


‘जीवन संवाद’ डिप्रेशन और आत्‍महत्‍या के विरुद्ध संवाद है. हमें मिलकर दुख को साझा करना है. दुख घटता नहीं, उसे बांटना होता है. आगे बढ़कर आंसू पोंछने होते हैं. रोता हुआ व्‍यक्ति गाल आगे नहीं करता, उसे स्नेह का स्पर्श देना होता है.

जिंदगी की यही रीत है. हम इस रीत से अलग रिवाज बनाने निकल पड़े हैं. ए‍क-दूसरे को छोड़कर, एक-दूसरे से कटकर हम सुखी, आनंदि‍त नहीं रह सकते. अंतत: हमें एक-दूसरे से जुड़ना ही होगा.

जीना है, हर हाल में. इसे कभी नहीं भूलना है.

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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First published: December 31, 2019, 9:34 AM IST
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