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#जीवनसंवाद: कितने गहरे!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 18, 2020, 4:32 PM IST
#जीवनसंवाद: कितने गहरे!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: भीतर से कटते जाने के कारण ही हम चीजों को गहराई से समझ पाने में विफल होते हैं. छोटी-छोटी कामयाबी को पचा नहीं पाने के कारण गुब्‍बारे की तरह फूल जाते हैं. समय की जरा सी धूप भी इसके कारण सहन नहीं कर पाते. जीवन में मुश्किलें उतनी ही स्‍वाभाविक हैं, जितनी दिन में धूप.

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  • Last Updated: January 18, 2020, 4:32 PM IST
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हम सब अपने बाहरी आकर्षण से इतने अधिक प्रभावित रहते हैं कि भीतर का ख्‍याल सहज ही छूट जाता है. अपने अंतर्मन से संवाद की दूर के चलते ही हम तनाव, निराशा और चिंता के भंवर में फंस रहे हैं. हमारे पास दुनिया से जुड़े रहने के लिए खूब समय है. अपना रौब दिखाने के लिए तौर-तरीकों की कमी नहीं. अगर क‍िसी चीज़ की कमी है तो वह है अपने भीतर झांकने की. हम क्‍या कर रहे हैं, क्‍यों कर रहे हैं? ऐसे सवाल इसलिए पीछे छूटते जाते हैं, क्‍योंकि हमारे चेतन और अवचेतन दोनों मन की बनावट मशीनी होती जा रही है. जो लोग हमें दूसरों से कटे नजर आते हैं, असल में वह पहले स्‍वयं से दूरी की यात्रा पर निकल चुके होते हैं.

तालाब कैसे सूखते हैं? उनके बाहरी किनारों पर पानी धीरे-धीरे कम होता है. उसके बाद अंत में मध्‍य भाग से पानी सूखता है. मन भी ऐसा ही है! जबकि तालाब भरता कैसे है! भरना वह मध्‍य से आरंभ करता है. उसके बाद उसका पानी किनारों तक पहुंचता है. यह भी हमारे मन के स्‍वभाव जैसा ही है.

जो व्‍यक्ति भीतर से संतुष्‍ट होगा, वह दूसरों के प्रति स्‍नेह और प्रेम से भरा होगा. जिसके भीतर स्‍नेह नहीं होगा, वह बाहर उसे कितना ही बांटना चाहे लेकिन यह सहज नहीं होगा. हमारा भीतर से प्रसन्‍न होना ही हमें बाहरी दुनिया से मिलने वाले दुख और निराशा से बचा पाएगा
.

हम अपने संवाद में सबसे अधिक जोर इसी बात पर देते हैं कि ‘अपने मन को दुखी करने की अनुमति किसी को मत दीजिए.’ यह खुद को आंतरिक संकट से बचाए रखने का सबसे उत्‍तम मार्ग है. दुनिया अपनी ओर नहीं देखती, वह केवल दूसरों पर टिप्‍पणी करने के लिए है. हर कोई इसी रास्‍ते चल पड़ा है. जबकि मन का आनंद और शांति दोनों ही संभव नहीं हैं.

दुख की काई मन में धीरे-धीरे जमती है. इतने धीमे कि कई बार हमें भी इसका आभास नहीं होता. ठीक वैसे ही, जैसे कई बार हम गीले कपड़े पर बैठ जाते हैं, हमें इसका अहसास नहीं होता, लेकिन बहुत देर तक उस पर बैठे रहने के कारण हमारे कपड़े भी गीले हो जाते हैं.


अपने भीतर से संपर्क टूट जाने के कारण दुख ऐसे ही आहिस्‍ता- आहिस्‍ता हमारे भीतर उतर जाता है. इसलिए, नियमित समय पर मन का रखरखाव, उसका मैल साफ करते रहना बहुत जरूरी है.
भीतर से कटते जाने के कारण ही हम चीजों को गहराई से समझ पाने में विफल होते हैं. छोटी-छोटी कामयाबी को पचा नहीं पाने के कारण गुब्‍बारे की तरह फूल जाते हैं. समय की जरा सी धूप भी इसके कारण सहन नहीं कर पाते. जीवन में मुश्किलें उतनी ही स्‍वाभाविक हैं, जितनी दिन में धूप.


अपनी सफलता, कामयाबी को नहीं पचा पाने, जरा सी बात पर इतराने की आदत से बचने के लिए एक छोटी सी कहानी उपयोगी हो सकती है.

सूरत शहर में हीरों के एक मशहूर व्‍यापारी थे. एक से बढ़कर एक महंगे हीरे उनकी दुकान के साथ घर पर भी होते. अचानक उनके घर पर चूहों का आतंक बढ़ गया. जब तक ध्‍यान दिया जाता, समस्‍या काफी बढ़ गई.

एक दिन एक चूहे ने उनका सबसे कीमती हीरा निगल लिया. तुरंत चूहे पकड़ने वाले को बुलाया गया. व्‍यापारी ने कहा, जल्‍दी से मुझे वह हीरा द‍िलाइए, मैं मुहमांगा इनाम दूंगा. चूहे पकड़ने वाले ने कहा कि यहां बहुत से चूहे हैं, कैसे पता चलेगा कि हीरा किसने खाया है. थोड़ी देर सोचने के बाद उसे तरकीब सूझी.

उसने देखना शुरू किया कि कौन सा चूहा सबसे अलग बैठा है. दूसरों से अलग बैठा है. थोड़ी में एक चूहे पर नजर पड़ी. वह एक कोने में बैठा था. तुरंत उसे पकड़कर, उसे पेट से हीरा निकाला गया.

सेठजी ने कहा, कैसे पता चला हीरा इसके पास है. पकड़ने वाले ने अपना सामान समेटते हुए विनम्रता से कहा- ‘कुछ लोग जरा सी कामयाबी आने पर फुलकर कुप्‍पा हो जाते हैं. अपने मित्र, रिश्‍तेदार के साथ अपने अंतर्मन से ही दूर जाते हैं. यह अकड़ जीवनभर दुख देती है. इस चूहे के साथ ही यही हुआ. इसने हीरा निगल तो लिया, लेकिन उसके बाद इसी अहंकार में दूसरों से दूरी बना बैठा.’

यह एक बोध कथा है! लेकिन हमारी स्थिति कैसी है, इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल काम नहीं है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: January 17, 2020, 1:53 PM IST
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