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#जीवन संवाद : किसका फैसला!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: February 27, 2020, 11:26 AM IST
#जीवन संवाद : किसका फैसला!
जीवन संवाद

फैसला लेने की कला धीरे–धीरे मन में उतरती है. अगर एक बार आपको दूसरे का फैसला स्‍वीकार करने की आदत हो गई तो पूरी जिंदगी आप अपने फैसले नहीं कर पाएंगे.

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  • Last Updated: February 27, 2020, 11:26 AM IST
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हम सब अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले करते हैं. यह सहज, स्‍वाभाविक प्रक्रिया है. हर दिन हमें फैसले करने होते हैं. हम करते भी हैं. लेकिन ठहकर सोचिए, क्‍या हम अपने फैसले खुद करते हैं. हमें इस तरह से तैयार ही किया गया है कि हम फैसले न कर सकें. मैं अब तक जितने लोगों से संवाद की प्रकिया में गया हूं, उसका सारांश यही है कि अधिकांश लोग फैसले करने से डरते हैं.

फैसला लेने की कला धीरे-धीरे मन में उतरती है. अगर एक बार आपको दूसरे का फैसला स्‍वीकार करने की आदत हो गई तो पूरी जिंदगी आप अपने फैसले नहीं कर पाएंगे. इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आपकी उम्र क्‍या है. आप बच्‍चे, जवान और बुजुर्ग कुछ भी हो सकते हैं. किसी भी नौकरी, प्रोफेशन में हो सकते हैं. संयुक्‍त, छोटे परिवार का हिस्‍सा हो सकते हैं. कुल मिलाकर यह हमारी उम्र और काम से अलग हमारे स्‍वभाव का हिस्‍सा है.


फैसले करने की आदत इतनी बड़ी योग्‍यता है कि अगर हमारे दस मित्र हैं तो उनमें से यह अधिकतम दो लोगों में ही पाई जाने की संभावना होती है. इसका हमारे बचपन से बहुत गहरा रिश्‍ता है. बचपन में आपके माता-पिता ने आपको फैसले लेने की आदत किस तरह से सिखाई उससे ही तय होता है कि आप फैसले कैसे करते हैं.




हम अक्‍सर अपने बच्‍चों को लाड़, प्‍यार, दुलार और स्‍नेह के नाम पर फैसले करने से रोकते हैं. वह फैसला करने को ही होते हैं कि हम उनको टोक देते हैं. अरे! मुझसे तो पूछा नहीं. मुझे तो बताया नहीं. पूछना और बताना स्‍नेह का हिस्‍सा होता है, जिसे हम जबरन फैसले में शामिल कर लेते हैं.


इसकी बड़ी वजह यही होती है कि बचपन से हमारे साथ भी यही किया गया है. हम पढ़ना विज्ञान चाहते थे, लेकिन हमें पढ़ाया गणित गया. क्‍योंकि खानदान में सब वही पढ़ते आए हैं. हमारी कोशिकाओं में जो बह रहा था, वही हम अपने बच्‍चे की ओर बढ़ा देते हैं.

उदयपुर से गीतिका शर्मा ने लिखा है कि मैं अपने बच्‍चे को फैसले लेने में मदद करना चाहती हूं. इस आदत को कैसे बनाया जाए. मैंने जो उनको लिखा वह साझा करता हूं, ‘बच्‍चे से कहिए वह अपनी पसंद के कपड़े चुने. (अगर वह उस उम्र में है तो) उसे बजट दीजिए. लेकिन रंग का फैसला उसे ही करने दीजिए. वह क्‍या पढ़े, उसे क्‍या पढ़ना चाहिए, इसमें उसकी मदद कीजिए लेकिन फैसला उसका होना चाहिए कि कौन सा विषय उसका पसंदीदा होगा.’

बच्‍चे को फैसले करने में मदद का एक और सरल तरीका उसके मनोरंजन में शामिल होकर किया जा सकता है. बच्‍चे को सभी तरह के संगीत, खेल और किताबों से परिचित करवाइए लेकिन ध्‍यान रहे कि जब वह पूछे कि उसे क्‍या सुनना, पढ़ना और खेलना है तो निर्णय उसे करने दीजिए. यह आपका नहीं, उसका काम है.

बच्‍चों को क्‍या बनना है, यह सवाल उन्‍हें मत रटाइए. उनके मन में अपने सपने मत बुनिए. यह काम बच्‍चों को करने दीजिए. इससे उनको फैसले लेने की कला सीखने में आसानी होगी!


आपने यह भी देखा होगा कि कुछ लोग हमेशा चीज़ों को टालते रहते हैं. आज नहीं कल. यह वही होते हैं, जिनने कभी अपने फैसले नहीं किए. ऐसे लोग आपके मित्र, सहयोगी और शुभचिंतक हो सकते हैं, लेकिन इनके सुझाव से अपनी जीवन प्रक्रिया को हमेशा बचाकर रखिए. यह जीवन की आस्‍था और उसके सुख से जुड़ी कला है, जिसका ख्‍याल आपको ही रखना है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: February 18, 2020, 7:46 PM IST
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