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#जीवनसंवाद: सुनना और समझना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 14, 2019, 12:38 PM IST
#जीवनसंवाद: सुनना और समझना!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: बच्‍चे आगे चलकर हमारे साथ कैसा व्‍यवहार करेंगे. इसके बारे में हमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए. आज हम बच्‍चों को तनाव दे रहे हैं. अगर वह बचे रहे तो आगे चलकर हमें वही वापस करेंगे.

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  • Last Updated: October 14, 2019, 12:38 PM IST
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दस अक्टूबर का दिन मानसिक स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया गया. पहली बार आत्महत्या के खतरे को दुनिया इतनी गंभीरता के साथ समझने की ओर जाती दिख रही है. हम तकनीक के साथ अपने रिश्ते को बहुत अधिक महत्व देने की ओर बढ़ रहे हैं. मनुष्य के विकल्प के रूप में हमारे पास उपकरण आ गए हैं. हम एक ऐसी आभासी दुनिया रच रहे हैं, जहां हमें लगता तो यही है कि हमारे साथ बड़ी संख्या में लोग हैं, लेकिन जैसे ही हमारे चेहरे से मुस्कान गायब होती है यह सब भी धीरे-धीरे बिखरने लगते हैं.

आपके प्रिय कॉलम 'डियर जिंदगी जीवन संवाद' में हम निरंतर इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि  एक-दूसरे के साथ केवल रहना नहीं है, बल्कि एक दूसरे का साथ बेहद प्यार, स्नेह और सरलता से रिश्ता निभाना जरूरी है.


साथ रहते हुए 'अकेले' होना बेहद खतरनाक स्थिति है, हम इसी ओर बढ़ रहे हैं. हमारा जीवन बेहद चुनौतीपूर्ण होने के साथ रस से परिपूर्ण है. शर्त केवल इतनी सी है कि चुनौती से गुजरना है या नहीं.

पर्वतारोही हमें सिखाते हैं कि किसी पहाड़ को देखने समझने के लिए सबसे अच्छी जगह उसकी चोटी होती है. वहां खड़े होकर जो अनुभूति मिलती है, उसकी तुलना पहाड़ के नीचे, मध्य, दूसरी किसी जगह से संभव नहीं है. लेकिन पहाड़ की चोटी तक का सफर भी आसान नहीं है. यह बेहद दुर्गम, जानलेवा, विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के बाद ही संभव होता है.

आंधी, तूफान जैसे कितने ही अप्रत्याशित मोड़ अचानक आ जाते हैं. जीवन को अपने संघर्ष के लिए हर पल तैयार रहना होता है. हमारी जिंदगी भी पर्वतारोही के सफर जैसी ही है. पर्वतारोहियों में भी आपस में अनेक मतभेद होते हैं. उनके बीच में अनेक चीजें चल रही होती हैं. लेकिन अंततः एक-दूसरे का साथ वे पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हैं. इसके बिना सुरक्षित पर्वतारोहण संभव नहीं है.

पति-पत्नी, मित्र, ऑफिस के हमारे सहकर्मी इन सबके साथ भी हमारी यात्रा इससे बहुत अलग नहीं है. एक दूसरे को समझने सुनने की जगह दिए बिना, केवल आगे बढ़ते जाने से कुछ हासिल नहीं होगा. जिंदगी में कुछ भी हासिल करने जितना ही जरूरी है, दूसरे का साथ. प्रेम और आत्मीयता के पुलों के बिना हम जिंदगी में यात्राएं तो करते हैं लेकिन वह बेहद रूखी, कठोर और अकेली होती है.

हम समय के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां हमारे पास सबसे अच्‍छी तकनीक, सुविधा और इच्‍छा की पूर्ति के अवसर हैं. लेकिन एक चीज़ है, जो हमें निरंतर पीछे धकेल रही है. वह है स्‍नेह और प्रेम की कमी.

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एक-दूसरे को सुनने, समझने की कम होती क्षमता. हम हर चीज़ के लिए समय निकाल लेते हैं, लेकिन हमारे पास उनको सुनने, सुमझने का वक्‍त नहीं है, जिनसे जीवन की डोर जुड़ी है.

बच्‍चे अकेले हैं. स्‍कूल, माता-पिता की अपेक्षा का भार वह किसके सहारे उठाएं. अभिभावक कह रहे हैं कि हमने सब सुविधाएं दी, बदले में आप अच्‍छे नंबर लाओ. टॉपर का टैग लिए बिना घर मत आओ. बच्‍चों के रिपोर्ट कार्ड को हमने अपना स्‍टेटस बना लिया है. हम एक ऐसी मानसिकता को बल दे रहे हैं, जिसमें असफल, कमजोर बच्‍चे के लिए कोई जगह नहीं.



बच्‍चे आगे चलकर हमारे साथ कैसा व्‍यवहार करेंगे. इसके बारे में हमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए. आज हम बच्‍चों को तनाव दे रहे हैं. अगर वह बचे रहे तो आगे चलकर हमें वही वापस करेंगे.


नौकरी जाने पर. बि‍जनेस में घाटा होने पर. परिवार में निर्णय गलत होने पर हम एक-दूसरे का हाथ कितनी मजबूती से पकड़े रहते हैं. इससे ही परिवार के प्रेम, भावनात्‍मक गहराई का पता चलता है. यह हाथ जितने प्रेम से थामा जाएगा, तनाव और अवसाद के संकट से परिवार उतना ही दूर रहेगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 11, 2019, 11:34 AM IST
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