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#जीवनसंवाद: अपने को सुनना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 18, 2019, 12:17 PM IST
#जीवनसंवाद: अपने को सुनना!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जैसे-जैसे हमारा संवाद कम होता जाता है , हम लोगों से दूर होते जाते हैं. नजरों से दूर होने पर 'नजर' से दूर होते देर नहीं लगती. इसलिए, जब कभी हमें किसी तरह के आर्थिक सहयोग की जरूरत होती है तो हम किसी की ओर देखने की हिम्मत नहीं करते.

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  • Last Updated: October 18, 2019, 12:17 PM IST
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हम सबको सुनने, समझने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी ओर से हमारा ध्यान ही हट जाता है. स्वयं को सुनना भी दूसरों को समझने, सुनने जितना जरूरी है. हम इतने शोर के बीच रहते हैं कि अपनी ओर से लगभग कटते जाते हैं. हम अपने सपने, महत्वाकांक्षा और कुछ बनने की प्रक्रिया में अपने से ही दूर होते जाते हैं. यह कुछ ऐसा है कि बचपन से आप किसी बड़े मेले को देखने का अरमान पाले रहते हैं, जैसे ही मेले में पहुंचते हैं, खुद को सबसे अकेला महसूस करने लगते हैं. क्योंकि वहां पहुंचने तक की यात्रा में आप अकेले पड़ते गए.

अपना ख्याल रखना एक बहुत ही जरूरी चीज है. असल में हमने ख्याल रखने को केवल शारीरिक मान लिया है. खुद को बीमारियों से बचाना, अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े यही हमारे खयाल की परिभाषा हैं. यह हमारी परिभाषा तो हो सकते हैं लेकिन पोषण नहीं. अपने मन का पोषण करने की तकनीक कुछ दूसरी है. हमारा मन, अपना ख्याल रखने से बहुत बारीकी से जुड़ा हुआ है.

हमारे दिमाग, आत्मा पर बहुत सारा कबाड़, कचरा इकट्ठा होता रहता है. दूसरों से ईर्ष्या, अपने से प्रेम की कमी और मनुष्यता में विश्वास की अनदेखी से हम मन पर बहुत सारा दबाव डालते रहते हैं.


छोटी सी मिसाल से समझते हैं. दो मित्र हैं. पहला, सब की खुशी में अपनी खुशी तलाशता है. सबके आगे बढ़ने में वह अपने को देखता रहता है. खुद भी आगे बढ़ता है लेकिन उसके भीतर दूसरों से पीछे रह जाने का भाव नहीं है. वह अपना खयाल रखता है, क्योंकि वह अपने मन में अपने साथियों के लिए ईर्ष्या, कटुता और वैमनस्य को जगह नहीं देता. दूसरा, पहले का ही साथी है. उसके मन में दूसरों के लिए गहरी ईर्ष्या है. एक स्वाभाविक ईर्ष्या होती है, दूसरे को प्रगति करते देख मन में उपजती है. यह एक सहज, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, जो हमें आगे की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है.



अगर ईर्ष्या का भाव, जलन की ओर चला जाता है तो वह सबका साथ हासिल नहीं कर सकता. सबके साथ चलने के लिए दूसरों के लिए मन बड़ा करना होता है. मन को खुला और हवादार बनाना होता है. दूसरों के लिए स्नेह, सरलता रखनी होती है. क्षमा चाहने से अधिक जरूरी है, क्षमा करने का अभ्यास. इससे ही हमारा मन बड़ा होता है. छोटे मन से जैसे कोई बड़ा नहीं होता, वैसे ही ईर्ष्या का भाव रखने से आपका भला नहीं होता.


अपना खयाल रखने का मतलब, अपने को सुनते रहने से है. इसका अर्थ स्वयं से सहमति, आत्ममुग्धता नहीं बल्कि स्वयं से गहरे संवाद से है. सजग अवलोकन से है. अपने से संवाद बनाए रखना, अपने को जानने समझने और अनेक संकटों से बचाए रखने में मददगार है. यह आपको दूसरों की नकल से बचाने वाला, अपने को पहचानकर, अपने रास्ते चलने में मदद करता है. जीवन का आनंद केवल इस बात में नहीं है कि हम दौड़ में कहीं पीछे न रह जाएं, बल्कि इससे अधिक इस बात में है कि हम जो होना चाहते हैं, उसके कितने नजदीक हैं. इस समय हम सब जिस गहरी उदासी और अकेलेपन की ओर बढ़ रहे हैं, उसका मुकाबला करने के लिए दूसरों से संवाद से जरूरी खुद से संवाद, प्रेम करना है.
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 17, 2019, 11:50 AM IST
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