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#जीवनसंवाद: मन की गिरह!

News18Hindi
Updated: October 7, 2019, 3:21 PM IST
#जीवनसंवाद: मन की गिरह!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: आंसू केवल मन का बोझ हल्का नहीं करते, आपके दर्द को भी हल्का करते हैं. हमारे समाज में बड़ा दुख आने पर रोने पर सबसे अधिक जोर दिया गया है.

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  • Last Updated: October 7, 2019, 3:21 PM IST
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थोड़ा याद करिए, आखिरी बार आपकी आंखों में नमी कब थी. किस बात पर थी. कोई गहरा दुख था. किसी का साथ छूटा. कोई प्यार भरा हाथ छूटा. हम अक्सर लड़कों से कहते हैं, क्या लड़कियों की तरह रोते हो. हम अक्सर उन्हें रोने से रोकते रहते हैं. हम उन्हें भावुक की जगह कठोर बनाने पर अधिक ध्यान देते हैं. हम अपने बड़े हिस्से को कुछ ऐसे तैयार करते हैं, मानों उन्हें किसी दूसरी दुनिया का हिस्सा बनना हो.



इसे सरलता से ऐसे समझिए, अगर हमारे लड़के लड़कियों की तरह रोना सीख लेते तो यह दुनिया कहीं अधिक खूबसूरत होती! आंसू केवल मन का बोझ हल्का नहीं करते, आपके दर्द को भी हल्का करते हैं. हमारे समाज में बड़ा दुख आने पर रोने पर सबसे अधिक जोर दिया गया है. बच्चे के जन्म के समय भी अगर वह रोता नहीं है तो डॉक्टर सबसे अधिक परेशान होते हैं. उसके रोने के तार मन और दिमाग की अनेक गुत्थियों से जुड़े होते हैं. उसके सहज रुदन से जीवन की प्रसन्नता के द्वार खुल जाते हैं.

प्रकृति की भाषा में इसका अर्थ हुआ, रोना हमारे सहज स्वभाव का हिस्सा है. हमें कोमल बनाता है, मन की गिरह (गांठ, बंधन) खोलने में मदद करता है. शरीर में कैंसर का कारण अनचाही गांठ ही तो होती है. वैसे ही मन की गांठें न खुलें तो मन को कुंठा, दुख का भंडार बना देती हैं.


जापान में इन दिनों एक रोचक प्रयोग चल रहा है. वहां कुछ विश्वविद्यालय मनोरोग, अवसाद से लड़ने के लिए रोने का अभ्यास करा रहे हैं. तकनीकी दुनिया में आगे बढ़ते हुए संभव है, वहां का समाज रिश्तों को सहेजने का हुनर भूल गया हो. वैसे भी हम आज जिन तकनीकों की बात कर रहे हैं जापान उनमें हमेशा से आगे रहा है. जापान की बात तो ठीक है, हमारे यहां मन में चल रही गहरी उदासी, अवसाद, उथल-पुथल का कारण क्या है!

एक समाज के रूप में एक दूसरे से कहीं अधिक गहरे से जुड़े हुए थे. फिर अचानक ऐसा क्या होने लगा कि हम सिमटने लगे. मनुष्य के तरक्की करने और आगे बढ़ने की चाहत नई नहीं है. गुफा से लेकर बुर्ज खलीफा तक के सफर में आगे बढ़ने की चाहत ही तो है.  इसलिए, संग्रह और आगे बढ़ने की लालसा मनुष्य के अकेले पढ़ने के इकलौते सूत्रधार नहीं है. इस प्रक्रिया में जो छूटा है, बदला है. वह है 'एकला चलो' की नीति. अपने हित और होने को जब हम दुनिया से काट कर आगे बढ़ाएंगे तो उसके बदले हम गहरी उदासी और मन की गिरह ही रचते चले जाएंगे.

हमें अपने बच्चों, स्वयं, परिवार, मित्रों में कोमलता का भाव प्रबल करने, मन की गिरह खोलने की जरूरत है. मन का पेंच जहां कहीं उलझा है, इसे सुलझाना होगा, गांठ बनने से पहले. एक दूसरे से स्नेह और आत्मीयता में बाधा क्या है!

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मन की बनी हुई गांठ, हमारे मनुष्य, सुखी बने रहने में सबसे बड़ी रुकावट है. रुकना नहीं, रोकना नहीं, खुद को वह सब साझा करने से, जिससे मन में पीड़ा होती है. कहना है, मुक्त हो जाना है. उस दर्द से जो आत्मा में ठहरकर, रोग का कारण बनता है. खुद को रोकिए नहीं, वह कहने से जिससे आप पीड़ा से मुक्त हो जाते हैं. कह दीजिए, सारा दर्द निकाल दीजिए. भावुक हो जाइए, थोड़ा रो लीजिए. इसमें कुछ भी अशोभनीय नहीं है. उल्टे ऐसा करते हुए, हम अपने मन को अधिक सुंदर, शोभायमान और आत्मीय बना रहे हैं. यह जीवन के ऐसे प्रयोग जो हम भूल बैठे हैं. यह इनके थोड़ा पास चलते हैं. खुद से थोड़ी सी मोहब्बत पढ़ा लेते हैं. आइए, मन की गिरह खोलकर थोड़ा हंसते रो लेते हैं रो लेते हैं!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
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First published: October 7, 2019, 10:48 AM IST
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