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#जीवनसंवाद: बंटा हुआ मन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 3, 2019, 5:49 PM IST
#जीवनसंवाद: बंटा हुआ मन!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: सुख के समय मन को पंख लगे होते हैं. वह इतनी तेजी से उड़ जाता है कि सुख पलक झपकते ही बीत जाता है. दुख का सामना करना हम भूलते जा रहे हैं. इसलिए वह हमें भारी लगने लगा है.

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  • Last Updated: October 3, 2019, 5:49 PM IST
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जीवन में जब भी हमारे ऊपर दुख की छाया बढ़ती है, यही प्रश्न सबसे पहले आंखों के सामने उतर आता है, मैं ही क्यों. ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है. संतोष और सरलता भारतीय लोक जीवन का अटूट हिस्सा रहे हैं. लेकिन धीरे-धीरे हम अपनी प्राचीन, गहरी जीवन दृष्टि से दूर जा रहे हैं.
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हम दुख-सुख का सामना विभाजित मन के साथ करने की ओर बढ़ गए हैं. दोनों में समभाव रहने का अभ्यास छूटता जा रहा है. यह सरल तो नहीं, लेकिन इसे पाना बहुत मुश्किल भी नहीं. हम जरूरतों को अपने नहीं, बल्कि बाजार के हिसाब से बढ़ाते रहते हैं. हमारा नियंत्रण हमसे छिटककर किसी दूसरे के हाथ में चला गया. इसलिए जैसे ही हम किसी मुश्किल में पड़ते हैं, हमारा व्यवहार भी वैसा ही होता जाता है, जैसा हमें सिखाया जा रहा है.

थोड़ा पीछे लौटते हैं. हिंदी फिल्मों की ओर चलते हैं. हमारे नायक को जब भी गुस्सा आता, वह तोड़फोड़ करने लगता. शराब पीने लगता. जब भी उसके हाथ से स्थितियां बाहर जाती दिखतीं, उसका व्यवहार भी विचित्र हो जाता. स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार की चर्चा जितनी कम की जाए, उतना अच्छा है. यह बेहद ही अपमानजनक होता था.




उस समय जो छोटे थे, आज बड़े हैं. उनके व्यवहार का ठीक से अध्ययन करने पर उस समय के सिनेमा की झलक बहुत हद तक मिलती है. इनके सोचने, दुखी होने का तरीका काफी कुछ एक जैसा है. हमारे मन को विभाजित करने में हिंदी सिनेमा ने खासतौर पर बड़ी भूमिका निभाई है. इसने भारतीय समाज, पुरुषों को सहज सरलता और सहजता से दूर रखा है. सिनेमा में दुख, गुस्से और संकट में अतिवादी आचरण जनमानस में गहरे बैठा हुआ है. ‌हमारे समाज में नाटकों के प्रति गहरी दिलचस्पी नहीं है. कई नाटक मनुष्य की मन:स्थिति को कहीं अधिक गहराई से पकड़ते हैं.

सुख के समय मन को पंख लगे होते हैं. वह इतनी तेजी से उड़ जाता है कि सुख पलक झपकते ही बीत जाता है. दुख का सामना करना हम भूलते जा रहे हैं. इसलिए वह हमें भारी लगने लगा है. भारी चीज़ का बोझ उठाना, वैसे भी सरल नहीं होता इसलिए दुख के समय हम अत्यधिक विचलित हो जाते हैं. महात्मा बुद्ध से लेकर नेल्सन मंडेला, महात्‍मा गांधी तक हमें इसका सामना करने लिए उपाय बता गए हैं. सबका सार वर्तमान में जीने से लेकर जीवन को सार्थक बनाने के बीच है. इसमें अहिंसा और प्रेम की कड़ी सबसे बड़ी, जरूरी है.
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अब यह हम पर है कि हम अपने जीवन को किस दृष्टि से देखते हैं. जो कुछ मेरी तरफ आ रहा है, वह मेरी ही तरफ क्यों आ रहा है. ऐसे प्रश्नों के हल गणितीय बुद्धि से हासिल नहीं किए जा सकते. इनके लिए हमारे शरीर, मन की गतिविधि, गहनता और विचार सबसे महत्वपूर्ण हैं.


सुख और दुख को एक जैसा महत्व देने का अभ्यास हमें एक ऐसी मानसिक अवस्था में ले जाता है, जहां हर चीज का सामना किया जा सकता है. हम अपने अहंकार, कुछ होने के भाव को इतना बड़ा बना लेते हैं कि जीवन के प्रति सहजता खो बैठते हैं. हमें अपने मन को विभाजित करने से बचाना चाहिए, उसे समभाव में रखने का अभ्यास हमें जीवन के अनेक संकटों से उबार सकता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 3, 2019, 12:50 PM IST
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