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#जीवनसंवाद: मन की काई!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: October 1, 2019, 10:05 PM IST
#जीवनसंवाद: मन की काई!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: मन के भीतर रिश्‍तों के उजाले, आत्‍मीयता, स्‍नेह की कमी ‘दलदल’ बनाती जाती है. हम अपने ही भीतर धंसते जाते हैं. मन की निर्मलता के लिए काई से मुक्ति जरूरी है.

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  • Last Updated: October 1, 2019, 10:05 PM IST
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हम अक्‍सर ही अनजाने में एक-दूसरे को लेकर अपनी राय बनाते रहते हैं. बिना मिले, जाने. छोटी सी मुलाकात के बाद. दूसरों के अनुभव को आधार बनाकर हम दिमाग में खास तरह की छव‍ि का निर्माण करते रहते हैं. इससे व्‍यक्ति विशेष के लिए अंतर्मन में कटुता की काई जमती रहती है. काई वैसे तो खतरनाक नहीं होती, लेकिन अगर उस पर थोड़ी भी असावधानी से पैर पड़ जाए तो गंभीर चोट से इनकार नहीं किया जा सकता. इसलिए, मन की सफाई करते रहना जरूरी है. ऐसा नहीं करने पर शरीर के साथ मन को गंभीर चोट लगने का खतरा बना रहता है.

हम जब भीतर ही भीतर कुछ बुनते रहते हैं, तो मन के भीतर काई जमना स्‍वाभाविक है. इसके सहज उदाहरण हमारे गली, मोहल्‍ले, घर, ऑफि‍स तक में मिल जाएंगे. हम लोगों को उनके गुण, व्‍यवहार के आधार पर नहीं चुनते, बल्कि अपनी पसंद के आधार पर उनका मूल्‍यांकन करते रहते हैं. इसका असर लोगों के लिए अपने मन में छवियां बना लेने के रूप में होता है. यह छव‍ि निर्माण हमारे अंतर्मन के लिए हानिकारक है, क्‍योंकि जब हम ऐसे लोगों से मिलते हैं तो उनके सामने हम कुछ कहते नहीं. बल्कि बाहर तो हम उनकी सराहना करते दिखते हैं. दिखना चाहते हैं. जबकि मन में सबकुछ इसके उलट चल रहा है. इसलिए भीतर घुटन, गुबार बढ़ता जाता है, क्‍योंकि ऐसी बातें आप दूसरों से साझा नहीं करते. इनका कोई ठोस उत्‍तर आपके पास नहीं होता. यह मन के भीतर घटने वाली इतनी धीमी प्रक्रिया है कि सहज ही पकड़ में नहीं आती.



मेरे जीवन में कम से कम तीन ऐसे लोग आए, जिन्‍होंने कई बरस बाद मुझसे कहा कि वह मेरे बारे में कुछ खास तरह की सोच रखते थे. इसका कारण उनके साथ मेरा व्‍यवहार न होकर, मेरे बारे में दूसरों से सुनी बातें थीं. अनजाने में वह लंबे समय तक मेरे पास रहते हुए भी दूर रहे. हमारे बीच एकतरफा ऊर्जा, स्‍नेह और प्रेम रहा. मुझे इस बात का अहसास लगभग पांच से सात बरस बाद हुआ, क्‍योंकि मेरे मन में उनके लिए किसी तरह की बाधा नहीं थी. वैसे मेरे लिए भी यह सरल नहीं था. इसे स्‍वीकर करने में समय लगा. इसके बाद जितना संभव था, मैंने उनके प्रति अपने दृष्टिकोण को प्रभावित नहीं होने देने का निर्णय किया. उनके और अपने बीच बाधा बनने वाली बातों को स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया. यह प्रक्रिया इसलिए मुश्किल है, क्‍योंकि इस पर संवाद को हम इतना अधिक टालते हैं कि वह धीरे-धीरे स्‍पष्‍ट होने की जग‍ह जमने लगता है. जंगल में दलदल कैसे बनते हैं!

मन के भीतर रिश्‍तों के उजाले, आत्‍मीयता, स्‍नेह की कमी ‘दलदल’ बनाती जाती है. हम अपने ही भीतर धंसते जाते हैं. मन की निर्मलता के लिए काई से मुक्ति जरूरी है.


मन में अगर किसी के प्रति कुछ ऐसा है, जो हमेशा आपके लिए परेशानी, गुस्‍से का कारण बनता है तो उसे टालिए नहीं. उससे बाहर आने की कोशिश कीजिए. मन को हमेशा भावुकता से नहीं, बल्कि कभी-कभी वैज्ञानिक नजरिए से भी संचालित करने की जरूरत होती है. खासकर, ऐसे अवसर पर जब हम केवल इस आधार पर चीज़ों को तय करते जाते है कि हमें यह पसंद नहीं. इसमें दूसरों की राय केवल ‘तड़के’ का काम करती है. इसलिए, जितना संभव हो धारणा बनाने से बचें.

अपना नजरिया, रवैया स्‍पष्‍ट, बहती नदी की तरह रखें. बहती नदी का पानी एकदम साफ, स्‍वादिष्‍ट होता है. संकट वहीं से आरंभ होता है, जब पानी बहना बंद हो जाए. जिंदगी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है!
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पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: October 1, 2019, 8:42 AM IST
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