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#जीवनसंवाद: सबकुछ खोने के बाद!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 3:50 PM IST
#जीवनसंवाद: सबकुछ खोने के बाद!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जीवन, स्‍वयं में सबसे बड़ी संभावना है. दुनिया का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि जीते वही जो हारे नहीं. हम अपने मन को मुश्किल के लिए कैसे तैयार करते हैं, जीवन की दिशा इससे ही तय होती है. हमारे अपने सोचने, समझने, निर्णय लेने से ही हमारा मन तैयार होता है.

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  • Last Updated: November 6, 2019, 3:50 PM IST
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ऐसा क्‍या है, जिसे खोने का शोक इतना गहरा हो कि जीवन दांव पर लगा दिया जाए. सबके अपने-अपने नजरिए, संकट हो सकते हैं. इन सबके बीच यह तय होना जरूरी है कि ‘सबकुछ’ क्‍या है. इसकी सीमा क्‍या है. यह कहां जाकर ठहरेगा. अंतत: सबसे खास क्‍या है. जिसके लिए किसी भी दुख को बर्दाश्‍त करने की क्षमता हमें हासिल करनी होती है. हमारा समाज दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले कहीं अधिक परस्‍पर जुड़ाव वाला रहा है. हमारे यहां सामाजिक, सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ सब मतभेद भुलाकर खड़े होने की अनूठी शक्ति रही है. खेती आधारित समाज होने के कारण ऐसा सहजता से होता रहा, क्योंकि गांव एक-दूसरे के सहयोग के बिना अपने अस्तित्‍व को नहीं सहेज सकता.

पंद्रह से बीस बरस पहले जब हम अपने गांव से दूर शहरों की ओर आना शुरू हुए तो यह संकट गंभीर नहीं था. क्‍योंकि हम अपनी जड़ों से दूर नहीं थे. हमारे सामाजिक संबंध शहर की ओर बढ़ने के बाद भी गहरे थे. गांव हमारी सामजिकता के केंद्र में था. इसमें बदलाव तब से आरंभ हुआ जब से हम शहर में बसने लगे. वह युवा जो अब बुजुर्ग होने जा रहे हैं, गांव की सामाजिकता से दूर होने के कारण धीरे-धीरे पूरे शहरी होते गए. जो किसी शहर में बचपन से थे, वह शहर उनका गांव ही था, वह बेहतर अवसर की चाह में दूसरे शहरों की ओर बढ़े.

कुल मिलाकर समाज के रूप में हमारा पलायन जारी रहा. एक शहर से दूसरे शहर. हम अपने गांव, संयुक्‍त परिवार से दूर होते हुए अब कुल मिलाकर फ्लैट तक सिमट गए.

हमारे संकट जितने अधिक ‘निजी’ होते जाएंगे, हम उतने ही फंसते जाएंगे. एक-दूसरे के प्रति स्‍नेह, आत्‍मीयता, साथ खड़े होने का हुनर ही अंतत: हमें बचा पाएगा.

हमें अपने अंतर्मन में साथ रहने का भाव सजगता से रखना होगा. अकेलापन, तनाव और आत्‍महत्‍या की ओर जाने का सबसे बड़ा कारण हमारे भीतर इस भाव का गहराई से बैठते जाना है कि मैं ‘अकेला’ पड़ गया हूं. अब किसी को मेरी जरूरत नहीं. नौकरी जाने, रिश्‍ते टूटने का अर्थ यह नहीं कि सबकुछ समाप्‍त हो गया.

जीवन, स्‍वयं में सबसे बड़ी संभावना है. दुनिया का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि जीते वही जो हारे नहीं. हम अपने मन को मुश्किल के लिए कैसे तैयार करते हैं, जीवन की दिशा इससे ही तय होती है. हमारे अपने सोचने, समझने, निर्णय लेने से ही हमारा मन तैयार होता है.


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अगर, हम उसे हमेशा सफलता के रथ पर तैयार रहने का प्रशिक्षण देते रहेंगे तो वह कभी ऐसी चीज़ों के लिए तैयार नहीं हो पाएगा, जिसका सामना कभी भी करना पड़ सकता है. असुविधा, असहज मोड़ को हमें इतनी शक्ति नहीं देनी है कि वह हमारी आत्‍मा, अंतर्मन को प्रभावित कर सकें.

सबकुछ खत्‍म होने के बाद भी बहुत कुछ बचा रहता है. यही जीवन का नियम है. जिंदगी ऐसी ही चलती है. हम केवल इस चीज़ को ही खत्‍म करने की योग्‍यता रखते हैं, जिसे हमने बनाया हो. यह जो जिंदगी है, वह हमें मिली है, हमने बनाई नहीं. इसलिए, उसे यातना, कष्‍ट देने और खत्‍म करने के विचार को मन में आश्रय देने अपने, अपनों के प्रति सबसे बड़ा, क्रूर अपराध है.

जब भी कोई समझाए, सबकुछ खोने के बाद क्‍या करोगे. जिंदगी मुश्किल हो गई है, उसे याद दिलाएं कि आपने कहां से आरंभ किया था. अपनी जीवन यात्रा के प्रति आस्‍था हमें जीवन के तनाव, घुमावदार मोड़ से सहजता से निकाल सकती है. जीवन के प्रति सहज, आस्‍थावान बनें. याद रहे, सबकुछ खोने के बाद भी बहुत कुछ बचा रहता है!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
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First published: November 6, 2019, 1:34 PM IST
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